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मार्क टली: जब एक आवाज़ ने बीबीसी का माइक्रोफ़ोन छोड़ा, लेकिन भारत नहीं!

जेय सुशील-

पत्रकारिता करते हुए कभी किसी बड़े पत्रकार के साथ तस्वीर खिंचवाने की इच्छा नहीं हुई। मार्क टली दफ्तर आते थे तो उन्हें दूर से देखता था। वह हिंदी अंग्रेज़ी में लोगों की बातों का जवाब देते थे। रुकते थे मिलते थे। एक बार हिंदी में उन्हें कुछ रिकार्ड करना था तो मुझे यह काम दिया गया। रिकार्डिंग हो गई तो उन्होंने कहा- एक प्याली चाय मिल सकती है क्या।

मैंने पैंट्री में फोन किया और कहा टली जी की चाय। पैंट्री को पता था टली जी कैसी चाय पीते हैं। मैंने उनसे इतना ही पूछा कि आपके कुछ कॉलम आते थे हिंदी में किसी अख़बार में वह अब क्यों नहीं आते तो उन्होंने मज़ेदार जवाब दिया।

वह बोले कि कॉलम लिखना एक कठिन काम तो है ही लेकिन संपादक पहले कॉलम लिखने के लिए कहता है तो अपनी मर्ज़ी का लिखने देता है लेकिन धीरे धीरे सुझाने लगता है कि इस विषय पर लिखें, उस विषय पर लिखें। मुझे यह पसंद नहीं है। हर हफ्ते लिखना भी मुश्किल काम है इसलिए लिखना बंद कर दिया। अब जब मन होता है लिखता हूं। वह बीबीसी के लिए कभी कभार लिखा करते थे और अगर चुनाव या किसी अन्य इवेंट के लिए दिल्ली से बाहर जाते तो एक प्रोग्राम रिकार्ड करते जिसे बीबीसी में फूक यानि From our own correspondent (FOOC) कहा जाता था. इसमें वह वही बताते जो उन्होंने देखा होता।

दो तीन बार मुलाक़ात के बाद मैंने उनसे एक तस्वीर के लिए आग्रह किया था। डिजिटल होते हुए भी मैंने वह तस्वीर रोल कैमरा से ली ताकि अल्बम में रख सकूं। यहां यह कहना भी ठीक होगा कि ब्रितानी होते हुए भी मार्क टली ने बीबीसी से इस्तीफा दिया था 1994 में। इस्तीफ़े का आधिकारिक कारण था बीबीसी के बडे़ अधिकारियों से रिपोर्टिंग को लेकर उनके मतभेद। उन्हें अपनी रिपोर्टिंग पर किसी तरह का दबाव पसंद नहीं था। इस्तीफे के बाद भी दिल्ली दफ्तर में उन्हें वैसा ही सम्मान लोगों ने दिया जिसके वह हकदार थे।

उनकी रिपोर्टिंग मैंने नहीं सुनी लेकिन उनकी लिखी किताबें लगभग सभी पढ़ी हैं। शुरुआती किताबें मसलन नो फुल स्टॉप्स इन इंडिया तो बिल्कुल रिपोर्टिंग है। एक कहानियों की किताब The Heart of India भी कमोबेश रिपोर्टिंग आधारित है। इंडिया इन स्लो मोशन में आते आते वह आध्यात्मिक होते चले जाते हैं और यह दिखता है कि अब वह रिपोर्टिंग से अधिक विचार लिख रहे हैं।

नो फुल स्टॉप्स एक ठीक-ठाक किताब है जो बाबरी मस्जिद विध्वंस के एक साल पहले आई थी। इसमें ग्लोब्लाइजेशन से पहले का भारत है। मार्क टली एक अच्छे पत्रकार रहे जिन्होंने भारत से सीखने का भाव रखा न कि अपने विचार थोपने का जो कई विदेशी पत्रकार करते रहे हैं। बाकी विदेशी पत्रकारों में और मार्क टली में यह अंतर था। और यह एक बड़ा अंतर है।


उदय प्रकाश-

यह बहुत दुखद ख़बर है। भारत में बीबीसी के पर्याय बन चुके मार्क टली का जाना। यह पत्रकारिता के एक युग का जैसे अंत है। 1982 में जब जेएनयू और भोपाल से होता हुआ जब मैं दिनमान पहुँचा था, उसके कुछ ही अरसे के बाद सतीश जैकब और मार्क टली से परिचय हुआ था।

1982 वह वर्ष था जिसके बाद लगातार वे घटनाएँ घटती रहीं, जिन्होंने आने वाले भविष्य के वर्षों का इतिहास पहले से लिख डाला था। एशियाई खेलों का आयोजन, सुलगता हुआ पंजाब, ततकालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या, भोपाल गैस त्रासदी, ऑपरेशन ब्लू स्टार आदि।

मार्क टली और सतीश जैकब ने इसी दौर में उस समय की चर्चित किताब लिखी। और इसके अनुवाद की ज़िम्मेदारी मुझे सौंपी गयी। उस समय राधाकृष्ण प्रकाशन के निर्देशक अरविंद कुमार थे, जो बाद में नेशनल बुक ट्रस्ट के निर्देशक हुए। उस समय यह योजना थी कि यह किताब हिंदी और अंग्रेज़ी में एक साथ प्रकाशित हो और लंदन तथा दिल्ली में दोनों का लोकार्पण हो।

तस्वीर में सतीश जेकब ब्लैक शर्ट और मार्क टली

हर रोज़ लगभग सात से नौ पृष्ठ दिनमान के दफ़्तर में, रात में पहुँचते थे और दिनमान का कार्यालय बंद होने के बाद मैं उसका अनुवाद करता था। आनंद सिंह नेगी हमारे टाइपिस्ट होते थे और स्वर्गीय जसविंदर, जो स्वयं आगे चलकर बीबीसी का संवाददाता और दक्षिण एशियाई ब्यूरो का प्रमुख हुआ, वह ओरिजिनल और अनुवाद के बीच की कड़ी था। दिनमान में संवाददाता के बतौर उसकी नियुक्ति की पृष्ठभूमि में मेरी अनुशंसा थी, जिसे तत्कालीन संपादक स्वर्गीय कन्हैयालाल नंदन ने स्वीकार किया था। उनका स्नेह और विश्वास सदा बना रहा आया। “अमृतसर: इंदिरा गांधी की आख़िरी लड़ाई” अपने अंग्रेज़ी मूल की तरह ही बहुचर्चित और लोकप्रिय रही।

मार्क टली की स्मृति को हार्दिक श्रद्धांजलि देते हुए इस पुस्तक की भूमिका का यह हिस्सा यहाँ उद्धृत कर रहा हूँ, जिससे यह पता चल सके कि इसको लिखे जाने के पीछे क्या उद्देश्य था :

“श्रीमती गांधी की हत्या होने के पहले से ही हमने इस किताब पर काम शुरू कर दिया था। क्योंकि हमें पूरा अहसास था कि अगर यह नहीं समझा गया कि ऑपरेशन ब्लूस्टार की ज़िम्मेदारी सिख नेतृत्व पर भी उतनी ही है, जितनी भारत सरकार पर, तो भारत की एकता के संदर्भ में इस दुर्घटना के बहुत गंभीर नतीजे होंगे। श्रीमती गांधी की हत्या की त्रासदी ने हमारे विचारों को सच ही साबित किया।

… अगर इस किताब से हिंदुओं और सिखों के सक्रिय रहे हिस्सों के बीच कोई बड़ी पारस्परिक समझदारी और विश्वास पैदा होता है, तो निश्चय ही इससे उनके बीच सद्भाव की उम्मीदें और मज़बूत होंगी।

हमने यह सच बताने की कोशिश की है कि वास्तव में दोनों में से कोई भी पक्ष इस आख़िरी टकराहट को चाहता नहीं था।” आज गणतंत्र दिवस है। भारत की लोकतांत्रिक और गणतांत्रिक एकता की गहराई से चिंता रखने वाले मार्क टली को अंतिम प्रणाम। सलाम !


त्रिभुवन-

मार्क टुल्ली: जब एक आवाज़ ने माइक्रोफ़ोन छोड़ा, लेकिन भारत नहीं छोड़ा… यह ख़बरों के महानायक की कहानी है, जो आज खबरों के अनश्वर संसार से सदा के लिए जीवित रहते हुए चला गया।

25 जनवरी 2026 को जब दिल्ली में ख़ामोशी कुछ ज़्यादा ही सलीके से फैली थी; जैसे शहर ने जानबूझकर अपनी आवाज़ धीमी कर ली हो। किसी परिचित स्वर का अचानक ग़ायब हो जाना, वैसा ही एहसास था। सर विलियम मार्क टुल्ली नहीं रहे। लेकिन यह वाक्य अधूरा है। सच यह है कि मार्क टुल्ली बहुत पहले यानी जुलाई 1994 में ही ख़बरों के लोक से परे हो गए थे, उस दिन, जब उन्होंने बीबीसी से बहुत क्षुब्ध होकर त्यागपत्र दे दिया था; लेकिन उसी क्षण उन्होंने एक नया ही जन्म लिया।

वे जेएलएफ में कई बार जयपुर आए तो बिना किसी मित्रता और बिना किसी पहचान के इतनी आत्मीयता से कोई घंटा भर बतियाते रहे। मार्क टुल्ली से उस मुलाकात ने साबित किया कि पत्रकार के भीतर का इनसान बड़ा होता है, सितारा छवि नहीं।

मार्क टुल्ली की मृत्यु कोई ब्रेकिंग न्यूज़ नहीं है; वह एक विराम है—एक ऐसा विराम, जिसे उन्होंने अपनी ज़िंदगी में स्वयं बहुत पहले लगा दिया था। और जैसा कि उन्होंने “नो फुलस्टॉप्स इन इंडिया” में लिखा था, भारत में पूर्ण विराम होते ही नहीं। उनकी मृत्यु भी एक अपूर्ण वाक्य की तरह है, जो अब स्मृतियों में अपनी अनुगूंज बनाए रहेगा।

मैं बीबीसी का दीवाना रहा हूँ और सन् 1975 से, जब मैं पांचवीं कक्षा में पढ़ता था। 1994। लंदन में बीबीसी के दफ़्तरों में चमकती हुई चुप्पियाँ थीं। जॉन बर्ट का युग, जहाँ प्रबंधन की भाषा में भय एक तकनीक था और गोपनीयता एक नीति। टुल्ली के लिए यह असहनीय था। वे उस पत्रकारिता से आए थे, जिसमें सवाल आदेश से ज़्यादा पवित्र होता है। उन्होंने कहा था, बीबीसी एक “गुप्त मोनोलिथ” बनती जा रही है, जहाँ रेटिंग्स की पूजा है और आत्मा निर्वासित। पत्रकारिता में आत्मा के निर्वासन का यह सिलसिला पत्रकारिता के महानतम शिखर से शुरू हुआ था और आज हम पूरी दुनिया में बिना आत्मा वाली देहें देख रहे हैं, जो प्रेत बन चुकी हैं।

उस इस्तीफ़े में कोई नाटकीयता नहीं थी, बस एक गहरी नैतिक थकान थी। यह वह क्षण था जब लेखक ने अपनी कलम नहीं, मेज़ छोड़ दी। माइक्रोफ़ोन से हटते हुए भी टुल्ली आवाज़ बने रहे।

भारत उनके लिए कोई पोस्टिंग नहीं था; वह एक स्मृति थी, जो बचपन से चली आ रही थी। कलकत्ता का टॉलीगंज, दार्जिलिंग का बोर्डिंग स्कूल, फिर इंग्लैंड, जहाँ भारत से दूर रखकर भारत सिखाया गया। यह इतिहास की विडंबना थी कि जिस देश से उन्हें सामाजिक दूरी पर रखा गया, उसी देश ने उन्हें सबसे निकट से अपनाया।

वे कहते थे, “इस देश के लिए यह बहुत शर्म की बात है कि जब मैं हिंदी में बात करता हूँ तो लोग अंगरेज़ी में जवाब देते हैं।” यह शिकायत नहीं थी, यह पीड़ा थी, एक ऐसे व्यक्ति की, जिसने भारत को भाषा से नहीं, संवेदना से सीखा था। और मैंने जब-जब उनसे बातचीत की थी, उसमें उनकी भाषा सुकून देती थी।

टुल्ली भारत को घटना की तरह नहीं, प्रक्रिया की तरह देखते थे। भोपाल गैस त्रासदी, ऑपरेशन ब्लू स्टार, इंदिरा गांधी की हत्या, सिख-विरोधी दंगे, बाबरी मस्जिद का विध्वंस, ये उनके लिए समाचार नहीं, सभ्यता की दरारें थीं। 1992 में अयोध्या में जब भीड़ “डेथ टू मार्क टुल्ली” के नारे लगा रही थी, तब वे एक कमरे में बंद थे, न केवल शारीरिक रूप से, उस भारत के भीतर भी, जो स्वयं को बंद कर रहा था।

उन्होंने बाद में कहा था—बाबरी मस्जिद का गिरना स्वतंत्र भारत के धर्मनिरपेक्ष स्वप्न की सबसे बड़ी पराजय थी। यह विश्लेषण नहीं था, यह एक शोक-वाक्य था। हम देख रहे हैं कि आज की पत्रकारिता में धर्म निरपेक्षता की वही पराजय एक नए विजयनाथ के रूप में प्रस्तुत की जाती है। आत्महीना पत्रकारिता इसके अलावा और करे भी क्या?

1994 के बाद उन्होंने बीबीसी छोड़ा, लेकिन भारत नहीं। वे दिल्ली में रहे, रेलगाड़ियों में भटके, गाँवों में रुके, रेडियो पर बोले, किताबों में साँस ली। “इन इंडिया इन स्लो मोशन” जैसे शीर्षक दरअसल उनके जीवन-दर्शन थे—भारत को जल्दी में समझा ही नहीं जा सकता। उनकी दोस्ती चौधरी देवीलाल से महान् ज़मीनी नेता से थी और उस दोस्ती में भारतीय राजनीति का एक अनोखा हास्य छिपा था। एक बार चुनाव के दौरान देवीलाल ने उनसे कहा, “मैं बहुत बोर हो गया हूँ।” टुल्ली ने कहा—घोषणापत्र तो अच्छा है। देवीलाल हँसे, “बेवकूफ़, मैंने एक भी घोषणापत्र नहीं पढ़ा।” फिर जोड़ा, “लेकिन गाँव का हर आदमी मुझे जानता है।” टुल्ली इस वाक्य को लोकतंत्र की सबसे सटीक परिभाषा मानते थे।

उन्हें राजीव गांधी बेहद पसंद थे। उनका मानना था : अगर राजीव गांधी की हत्या न होती तो भारत कहीं आगे होता। “उन्हें पता था कि क्या करना है,” टुल्ली कहते थे—और उस वाक्य में अफ़सोस भी था, उम्मीद भी।

वे क्रिकेट में भारतीय टीम के समर्थक थे, बिना किसी औपचारिकता के। महेंद्र सिंह धोनी को उन्होंने पहली नज़र में पहचान लिया था। “मैंने तभी कह दिया था, यह लड़का बहुत आगे जाएगा।” यह कथन किसी क्रिकेट विश्लेषक का नहीं, किसी कथाकार का था, जो चरित्र पढ़ लेता है।

हिंदी फ़िल्मों से उनका प्रेम लगभग घरेलू था—ओंकारा, तारे ज़मीं पर, नया दौर। अमरीश पुरी, नसीरुद्दीन शाह, सैफ़ अली ख़ान, बोमन ईरानी—वे कलाकारों को उनके अभिनय से पहले उनकी आत्मा से देखते थे। अमरीश पुरी से जुड़ा एक सपना था—नाइटहुड मिलने पर उन्होंने कहा था कि वे किसी हिंदी फ़िल्म में छोटी भूमिका करना चाहते हैं, बस अमरीश पुरी हों। कुछ दिन बाद अमरीश का फ़ोन आया—और कुछ समय बाद उनका निधन। वह सपना अधूरा रह गया—जैसे टुल्ली की बहुत-सी इच्छाएँ।

उन्हें जाने कितने ही फिल्मी गीत याद थे। टुल्ली साहब को दक्षिणपंथी माना जाता था; लेकिन उनका पसंदीदा गीत था—सारे जहाँ से अच्छा, घनन घनन, धीमे-धीमे, आज रंग है—जैसे ये गीत नहीं, उनके निजी डायरी के पन्ने हों।

मार्क टुल्ली को “भारत को समझने वाला विदेशी” कहा गया। यह वाक्य उनके साथ अन्याय करता है। वे भारत को समझते नहीं थे—वे भारत में रहते थे। समझना दूरी माँगता है; रहना जोखिम।

1994 में उन्होंने बीबीसी को वैसे का वैसे बिना शोरशराबे छोड़ दिया और आज 2026 में उन्होंने अपने शरीर को जस की तस धर दीनी चदरिया। बीच के वर्षों में उन्होंने हमें यह सिखाया कि पत्रकारिता संस्था से नहीं, विवेक से चलती है।

मार्क टुल्ली चले गए। लेकिन भारत में—आज भी—कोई पूर्ण विराम नहीं लगा। मार्क टुल्ली दैहिक रूप से ज़रूर चले गए हैं; लेकिन उनकी आत्मा हमारी पत्रकारिता को सदैव समृद्ध करती रहेगी।

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