देवप्रिय अवस्थी-
मेरी पत्रकारिता यात्रा -4 (जनसत्ता वाले पड़ाव की यादें कुछ ज्यादा ही विस्तृत हो गई हैं इसलिए इन्हें दो किस्तों में शेयर कर रहा हूं. पढ़िए पहली किस्त)
जनसत्ता के लिए चुनी गई संपादकीय टीम के ज्यादातर सदस्यों ने अगस्त -सितंबर 1983 में एक्सप्रेस बिल्डिंग के बेसमेंट में नियत स्थान पर बैठना शुरू कर दिया था. शुरू में प्रभाष जी नए अखबार के स्वरूप के बारे में सभी साथियों से खूब चर्चा करते. संयोग ही था कि इस टीम में मैं अकेला था जिसे दिल्ली के किसी हिंदी दैनिक अखबार में काम करने का अनुभव था. अन्य सभी सहयोगी क्षेत्रीय अखबारों से आए थे या किसी पत्रिका से जुड़े थे. इस वजह से जनसत्ता के न्यूजरूम में मुझे कुछ ज्यादा ही जिम्मेदारियां मिलीं जिन्हें मैं ठीक-ठाक तरीके से निभा सका.
बोलचाल की भाषा के मुताबिक, स्टाइल शीट, वर्तनी नियमावली बनाना और छह कालम के ले-आउट में पेज डिजाइन करना ऐसे काम थे जो हिंदी के किसी बड़े अखबार में जनसत्ता से पहले शायद ही हुए हों. स्टाइल शीट और वर्तनी नियमावली तैयार करने में बनवारी और अनुपम मिश्र के साथ मेरी भूमिका प्रमुख थी. मैं दोनों से उम्र और अनुभव में कमतर था, पर उन्होंने मुझे इसका किंचित भी आभास नहीं होने दिया. हम तीनों ने जिस स्टाइल शीट और वर्तनी नियमावली को अंतिम रूप दिया वह कमोबेश आज भी कायम है. बाद में कई दूसरे अखबारों ने भी उसे अपनाया या अपनाने की कोशिश की. उल्लेखनीय है कि वर्तनी नियमावली बनाने वाले तीनों साथियों का पारंपरिक व्याकरण का ज्ञान लगभग शून्य था. भाषा का व्यावहारिक पक्ष जरूर समृद्ध था.
यहां याद दिलाना प्रासंगिक होगा कि अनुपम मिश्र जनसत्ता की संपादकीय टीम में औपचारिक रूप से भले ही न शामिल हुए हों, लेकिन अनौपचारिक रूप से वे उसका अभिन्न अंग थे. पर्यावरण के क्षेत्र में अपने नाम के अनुरूप काम करने वाले अनुपम मिश्र के साथ मेरी ज्यादा अंतरंगता नहीं रही, फिर भी उन जैसे धुनी और सहज-सरल व्यक्ति का थोड़े दिनों का साथ मुझे आज भी गर्वान्वित करता है.
इसी तरह जनसत्ता के मास्टहेड, डिजाइन और ले-आउट को आकार देने में दिलीप चिंचालकर की भूमिका अहम थी. इंदौर के ख्यात कलागुरु विष्णु चिंचालकर के बेटे दिलीप भी औपचारिक तौर पर जनसत्ता परिवार से नहीं जुड़े थे मगर उन्होंने नवोन्मेषी प्रयोगों से जनसत्ता को भिन्न और आकर्षक स्वरूप देने में खासी मशक्कत की.
नई भाषा, नए तेवर
जनसत्ता को नई भाषा और नए तेवर का अखबार बनाया जा सका, इसके पीछे प्रभाष जोशी की यह सोच बहुत कारगर रही कि इसके लिए चुनी गई कोर संपादकीय टीम अखबार निकलने से दो-तीन महीने पहले से काम शुरू कर दे. इस दौरान सभी साथियों में अखबार की भाषा, खबरों के स्वरूप आदि पर खूब चर्चा और बहस होती और नए-नए विचार-सुझाव सामने आते. यह वही प्रक्रिया थी जिसे आज मैनेजमेंट की भाषा में ब्रेन स्टार्मिंग कहा जाता है. खबरें-आलेख बोलचाल की भाषा में लिखे जाने चाहिए, यह सूत्र वाक्य तो मैंने पत्रकारिता में प्रवेश करने के बाद अनेक बार सुना था, लेकिन बोलचाल की भाषा क्या और कैसी होती है, यह जनसत्ता में आने और प्रभाष जी के साथ काम करने के बाद ही जान-समझ सका.
जनसत्ता से पहले मैं जागरण, कानपुर और नवभारत टाइम्स, दिल्ली में करीब सात साल काम कर चुका था. इन अखबारों में मेरी लिखी खबरों की भाषा-शैली पर शायद ही किसी वरिष्ठ ने कभी कोई टोका-टाकी की हो या फेरबदल किया हो. प्रभाष जी पहले संपादक थे जो मेरी लिखी खबरों में सुधार-संशोधन की खासी गुंजाइश निकाल लेते. उनके बालपेन से ख़बरों में होने वाले छोटे-मोटे फेरबदल उन्हें और प्रभावी तथा पठनीय बना देते.
शीर्षक लगाने का प्रभाष जी का तरीका भी अनूठा था. वे अक्सर शाम के समय न्यूज डेस्क पर आकर बैठ जाते और दिन की बड़ी खबरों के लिए सभी सहयोगियों से शीर्षक सुझाने को कहते. इस प्रक्रिया में अंततः लीक से हटकर एक से एक बढ़िया शीर्षक निकल आते. हरेक पेज पर दो-तीन ऐसे शीर्षक अखबार को अलग पहचान देने में खासी भूमिका निभाते. शीर्षकों में खड़ी बोली से इतर आंचलिक बोलियों और दूसरी भाषाओं के शब्द भी इस्तेमाल किए जाते. नए शब्द और फ्रेज गढ़ने में भी प्रभाष जी बेजोड़ थे. एक दिवसीय क्रिकेट को ‘फटाफट क्रिकेट’ और स्वर्गीय चंद्रशेखर को ‘भोंडसी के बाबा’ नाम प्रभाष जी ने ही दिए थे.
शुरुआती टीम
जनसत्ता में शुरू में तीन सहायक संपादक सह विशेष संवाददाता थे- बनवारी, हरिशंकर व्यास और सतीश झा. बनवारी जी बेहद परिपक्व समाजशास्त्री, चिंतक और विचारक थे. वे पहले दिनमान में काम कर चुके थे. उन पर ख्यात समाजशास्त्री धर्मपाल की गहरी छाप थी.
पांचजञ्य से जनसत्ता में आए हरिशंकर व्यास विदेश मामलों में अच्छे जानकार होने के साथ राजनीतिक गहमागहमी पर भी पकड़ रखते थे. वे नेटवर्किंग में माहिर थे. सतीश झा वित्तीय मामलों के जानकार थे पर कुछ हद तक सुपीरियरिटी कम्पलेक्स से ग्रस्त थे. तीनों सहायक संपादकों के लिखे संपादकीय अग्रलेखों को प्रभाष जी स्वयं अंतिम रूप देते. व्यास जी की कापियों में प्रभाष जी को सबसे ज्यादा मशक्कत करनी पड़ती. हालांकि उनका लिखा रविवारीय कॉलम गपशप जनसत्ता का सबसे पठनीय और लोकप्रिय था. सतीश झा कुछ समय बाद संपादक बनकर दिनमान चले गए. उनकी जगह जितेंद्र बजाज ने ली. वे भी बनवारी की तरह धर्मपाल के चेले थे. उनका लेखन-चिंतन कमोबेश हिंदूत्ववादी था, लेकिन न तो वे अच्छे न्यूजमैन थे, न ही अच्छे टीम लीडर. वे बाद में चंडीगढ़ संस्करण के स्थानीय संपादक बने और जनसत्ता में मेरी दूसरी पारी के असमय अंत का सबब भी।
संपादकीय पेज के संयोजन की जिम्मेदारी शंभूनाथ शुक्ल के पास थी. उनका उल्लेख मैं जागरण वाले पड़ाव में कर चुका हूं. वे तब भी बेहद विनम्र और मिलनसार थे और आज भी हैं. मेरी तरह उन्होंने भी पत्रकारिता की एक-एक सीढ़ी बड़ी मेहनत से चढ़ी है. रविवारीय जनसत्ता मंगलेश डबराल देखते थे. मंगलेश जी जनसत्ता में आने से पहले नई पीढ़ी के कवियों में पहचान बना चुके थे. वे इलाहाबाद में अमृत प्रभात भोपाल में भारत भवन की पत्रिका कला वार्ता में भी काम कर चुके थे. काक जनसत्ता के पहले कार्टूनिस्ट थे. उनका असली नाम हरिश्चंद्र शुक्ल था. वे कानपुर के एक रक्षा कारखाने में सुपरवाइजर पद से समय पूर्व सेवानिवृत्ति लेकर जनसत्ता में आए थे. काक के धारदार कार्टून जनसत्ता के तेवरों के अनुरूप होते. वे बाद में नवभारत टाइम्स चले गए पर वहां उन्हें वह ख्याति और पहचान नहीं मिली जो जनसत्ता में मिली थी. फिल्मी पन्ना मनमोहन तल्ख के जिम्मे था जो उम्र के लिहाज से जनसत्ता की टीम में सबसे बुजुर्ग थे.
कमजोर न्यूजरूम प्रमुख
जनसत्ता की शुरुआती टीम में न्यूजरूम के इंचार्ज गोपाल मिश्र थे. उनकी नियुक्ति उप समाचार संपादक पद पर की गई थी. मगर वे प्रभाष जी के पैमानों पर खरे नहीं उतरे. न्यूजरूम में गोपाल मिश्र के बाद मुझ समेत सभी साथियों की नियुक्ति उप संपादक फिर ट्रेनी के पद पर की गई थी. उन सब में सीनियर होने के कारण न्यूजरूम को लीड करने का मौका मुझे अनायास ही मिल गया.
जनसत्ता की डेस्क कहीं का ईंट, कहीं का रोड़ा की कहावत को चरितार्थ करती थी. इसमें प्रभाष जी के मालवा को छोड़कर प्रायः सभी हिंदी भाषी राज्यों-क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व था. इसमें वामपंथी थे, हिंदुत्ववादी थे, समाजवादी थे और सर्वोदयी भी थे. दीगर है कि मुस्लिम या सिख समुदाय का कोई प्रतिनिधि नहीं था. शिफ्ट इंचार्ज की जिम्मेदारी सत्यप्रकाश त्रिपाठी, अमित प्रकाश सिंह और परमानंद पांडेय बारी-बारी से संभालते थे. त्रिपाठी जी और मैंने जागरण, कानपुर में एक साथ काम शुरू किया था. वे बहुत संतुलित सोच वाले गंभीर साथी थे.
अमित ख्यात कवि त्रिलोचन के पुत्र थे. उनकी भाषा की पृष्ठभूमि समृद्ध थी. परमानंद पांडेय खबरों की समझ और सामान्य ज्ञान के लिहाज से हमारी टीम के सबसे प्रखर सदस्य थे, लेकिन वे बात-बात में उत्तेजित हो जाते थे. बाद में यूनियनबाजी के फेर में उन्हें जनसत्ता से हटना भी पड़ा.
मेन डेस्क के अन्य साथियों मे अशोक कुमार, जगदीश उपासने, राजीव शुक्ल, श्रीशचंद्र मिश्र, कुमार आनंद, सुधांशु भूषण मिश्र, प्रताप सिंह, सतीश पेंडनेकर, अच्छेलाल प्रजापति प्रमुख थे. अरविंद मिश्र, सुरेश शर्मा, सुशील कुमार सिंह, पारुल शर्मा, दयानंद पांडेय, असीम चक्रवर्ती, राकेश त्रिपाठी, रमेश ऋषिकल्प, राजेश नायक और बाला सुब्रह्मण्यम गिरि ने जनसत्ता में ट्रेनी के रूप में केरियर शुरू किया था. इनमें से कई आज पत्रकारिता के बड़े सितारे हैं. खेल डेस्क सुरेश कौशिक, ब्रजेंद्र पांडेय और मनोज चतुर्वेदी के जिम्मे थी तो कामर्स डेस्क पर उमेश जोशी और श्रीभगवान सुजानपुरिया तैनात थे.
जोशी और सुजानपुरिया में पटरी नहीं बैठ पाने के कारण सुजानपुरिया को बाद में मेन डेस्क पर कर दिया गया था.
जनसत्ता की शुरुआती रिपोर्टिंग टीम में कुल पांच साथी-रामबहादुर राय, आलोक तोमर, महादेव चौहान, राकेश कोहरवाल और दयाकृष्ण जोशी थे. बीएचयू छात्रसंघ के अध्यक्ष और जेपी आंदोलन में सक्रिय रहे राय साहब का संपर्क बहुत व्यापक और विविधतापूर्ण था. वे बहुत सीधी-सपाट भाषा और छोटे वाक्यों में खबरें लिखते. वे तथ्यों के प्रति काफी सजग रहते. इसके उलट आलोक तोमर लालित्यपूर्ण भाषा के जरिए हर खबर में चमत्कार पैदा करने की कोशिश में रहते. वे तथ्यों के साथ लिबर्टी लेने में भी नहीं हिचकते, लेकिन पठनीयता के मामले में उनका कोई सानी नहीं था. बाकी तीनों के बारे में कुछ उल्लेखनीय याद नहीं पड़ता. उनमें से राकेश कोहरवाल जल्दी ही एक अन्य अखबार में स्थानीय संपादक बनकर चले गए थे.
प्रमुख हिंदी भाषी राज्यों में भी जनसत्ता का छोटा-मोटा नेटवर्क बनाया गया. लखनऊ में जयप्रकाश शाही, पटना में सुरेंद्र किशोर और जयपुर में रियाजुद्दीन शेख राज्य संवाददाता नियुक्त किए गए. बाद में भोपाल में महेश पांडेय की भी नियुक्ति हुई. शाही तेज-तर्रार रिपोर्टर थे. जनसत्ता छोड़ने के बाद एक रिपोर्टिंग एसाइनमेंट के दौरान हुए सड़क हादसे में उनकी असमय मृत्यु हो गई. सुरेंद्र किशोर को मैं समकालीन हिंदी पत्रकारिता के श्रेष्ठ रिपोर्टरों में शुमार करता हूं. उनकी बेबाकी, ईमानदारी और खबर सूंघने की क्षमता अद्भुत थी. वे बिहार का चलता-फिरता संदर्भ थे. उनका छोटा-सा घर तरह-तरह की संदर्भ सामग्री से पटा रहता था. रियाजुद्दीन शेख पीआरओ नुमा पत्रकार थे. वे जल्द ही अखबार छोड़कर राजनीति में चले गए. वहां भी उनके नाम के साथ कोई उपलब्धि नहीं जुड़ी. विज्ञापन की दुनिया से पत्रकारिता में आए महेश पांडेय ने अपनी खबरों और संपर्कों से भोपाल में खासी धाक जमाई.
अक्टूबर 1983 खत्म होते-होते नए अखबार का स्वरूप आकार लेने लगा था और हमारी टीम डमी निकालने की तैयारी में जुटी थी. चूंकि जनसत्ता फोटो- कंपोजिंग तकनीक से निकलने वाला पहला हिंदी अखबार था और किसी भी साथी को इस तकनीक का कोई अनुभव नहीं था इसलिए शुरुआत में पेज बनाने में बहुत मुश्किलें आईं. अखबार का नियमित प्रकाशन शुरू होने की तारीख 17 नवंबर जैसे-जैसे करीब आ रही थी, हम सबके हाथ-पैर फूलने लगे थे. 10 नवंबर तक हम पूरी डमी नहीं निकाल पाए थे. सब एक तरह के जुनून में काम कर रहे थे कि तय तारीख किसी भी हालत में मिस नहीं होनी चाहिए. हुआ भी ऐसा ही. 17 नवंबर 1983 को लगभग 50 हजार प्रतियों के प्रिंट आर्डर के साथ जनसत्ता ने बाजार में दस्तक दे दी.
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मेरी पत्रकारिता यात्रा (3) : जल्द ही पता चला नईदुनिया इंदौर के संपादक राजेंद्र माथुर NBT के नए प्रधान संपादक होंगे; युवा पत्रकारों में उत्साह और सीनियरों में मायूसी छा गई!



