
देवप्रिय अवस्थी-
मेरी पत्रकारिता यात्रा -3
जनवरी 1980 में आम चुनाव में जीत के बाद कांग्रेस में संजय गांधी का दबदबा कायम हो गया. ज्यादातर बड़े फैसले उनकी मर्जी से होने लगे. मई के मध्य में इंदिरा गांधी ने उन्हें महज 33 साल की उम्र में कांग्रेस का महासचिव बना दिया. उन्हें इंदिरा गांधी के उत्तराधिकारी के रूप में देखा जाने लगा, लेकिन नियति में कुछ और लिखा था. 23 जून को एक छोटा विमान उड़ाते समय संजय उस पर नियंत्रण खो बैठे. विमान सफदरजंग हवाई अड्डे के पास गिरकर ध्वस्त हो गया और संजय की मृत्यु हो गई.
संजय के निधन के बाद इंदिरा गांधी ने अपने बड़े बेटे राजीव को राजनीति में उतारा. वे राजनीति के लिए बने ही नहीं थे, हालांकि बाद में धीरे-धीरे उसमें रमने लगे. इस घटनाक्रम का मेरी पत्रकारिता यात्रा से कोई सीधा ताल्लुक नहीं है, फिर भी इसका उल्लेख मुझे इसलिए जरूरी लगा कि इस घटनाक्रम ने देश की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया. संजय जीवित रहते तो बहुत संभव था कि वे एकाधिकारवादी राजनीति के रास्ते पर चलते और देश बहुत पहले अंधी सुरंग में प्रवेश कर गया होता.
जैसा कि पहले बता चुका हूं, नवभारत टाइम्स की नौकरी बेहद आराम की थी. वहां काम करने वाले साथियों के पास काफी इफरात समय होता था. इसलिए ज्यादातर साथी कुछ और काम भी करते थे. इनमें अनुवाद मुख्य था. यह काम अच्छे संपर्कों से हासिल होता था. चूंकि मैं संपर्क कला में शून्य था इसलिए मुझे ऐसे काम सीधे नहीं मिलते थे. कभी-कभार कुछ सीनियर अनुवाद के काम में मेरी मदद लेते थे और उसके मेहनताना का कुछ अंश मुझे देते थे. इस राशि का बड़ा हिस्सा मैं पत्र-पत्रिकाएं खरीदने में खर्च कर देता था.
प्रायोजित यात्राएं
नवभारत टाइम्स के संपादक के पास अक्सर सरकारी विभागों और निजी संस्थानों द्वारा प्रायोजित यात्राओं के निमंत्रण आते रहते थे. इन यात्राओं पर डेस्क पर कार्यरत साथियों को बारी-बारी से भेजा जाता था. ऐसी कुछ यात्राओं पर जाने का मौका मुझे भी मिला. पहली एक दिनी यात्रा लेह की थी जो सेना के एएन-12 मालवाहक विमान की 1000वीं उड़ान के उपलक्ष्य में थी. दूसरी हफ्ते भर की यात्रा कालिम्पोंग-दार्जिलिंग-गांतोक की थी.आर्मी सप्लाई कोर (ASC) के कामकाज से परिचित कराने के उद्देश्य से प्रायोजित इस यात्रा में शामिल 15-16 पत्रकारों में तीन-चार महिलाएं भी थीं. इस यात्रा में रात्रि भोजन के पहले पीने-पिलाने का कार्यक्रम होता था. साथ गई महिला पत्रकार भी इस कार्यक्रम में शामिल रहती थीं. मैं शराब नहीं पीने वाला अकेला था. बहुत आग्रह-दबाव के बावजूद मैंने पीने से मना कर दिया. उसकी जगह नींबू-पानी का आनंद लेता रहा. प्रायोजित यात्राओं के क्रम में दो-तीन और यात्रा की भी थीं.
राजेंद्र माथुर का आगमन
सितंबर 1982 में अचानक एक दिन आनंद जैन नवभारत टाइम्स के प्रधान संपादक पद से विदाई हो गई. प्रिंटलाइन में रामपाल सिंह का नाम बतौर कार्यकारी संपादक छपने लगा. नए प्रधान संपादक को लेकर कुछ दिन अटकलों का दौर चला. जल्द ही पता चला कि नईदुनिया, इंदौर के संपादक राजेंद्र माथुर नवभारत टाइम्स के नए प्रधान संपादक होंगे. उनके आने की खबर से अखबार के युवा पत्रकार उत्साह से भर गए, लेकिन सीनियर पत्रकारों में मायूसी छा गई. उनमें से कुछ तो प्रधान संपादक की कुर्सी पर खुद बैठने का सपना संजोए थे. राजेंद्र माथुर ने अक्टूबर 1982 के शुरुआती दिनों में नई जिम्मेदारी संभाल ली. उनके आने से संपादकीय विभाग का माहौल बदलने लगा. बाबूनुमा तरीके से अखबार निकालने वाले चेहरों पर कुंठा साफ झलकती थी. कुछ नया सोचने-करने वाले उत्साह से भरे थे. माथुर साहब सबसे मिलते-जुलते और बतियाते थे. वे युवा सहकर्मियों को खूब प्रोत्साहित करते.
एशियाड कवरेज
माथुर साहब के आने के कुछ दिन बाद ही दिल्ली में एशियाड (19 नवंबर-14 दिसंबर 1982) का आयोजन था. खेल डेस्क के प्रमुख सुशील जैन चाहते थे कि खेल डेस्क पर रिलीवर की भूमिका निभानेवाले मैं और मधुरेंद्र एशियाड के दौरान डेस्क का काम संभालें और डेस्क पर नियमित रूप से काम करनेवाले साथी एशियाड की रिपोर्टिंग करें. मुझे और मधुरेंद्र को यह योजना बिलकुल नहीं जमी. हम दोनों ने माथुर साहब से मिलकर आपत्ति जताई. हमारा तर्क था कि इतने सारे इवेंट्स में कुछ इवेंट्स कवर करने का मौका हमें भी मिलना चाहिए. बड़ा मौका है इसलिए हम लोग डेस्क और फील्ड के काम के लिए कुछ अतिरिक्त समय दे सकते हैं. काफी ना-नुकुर और राजेंद्र माथुर के हस्तक्षेप के बाद सुशील जैन मुझे और मधुरेंद्र को कुछ इवेंट्स की रिपोर्टिंग देने के लिए तैयार हुए. मुझे तैराकी और मुक्केबाजी प्रतियोगिताएं कवर करने की जिम्मेदारी मिली और मधुरेंद्र को नौकायन की जो जयपुर के पास रामगढ़ झील में हुई थी. खेल डेस्क के नियमित साथियों ने अपेक्षाकृत ज्यादा महत्वपूर्ण इवेंट आपस में बांट लिए थे. एशियाड के वे दिन काफी दौड़-धूप वाले, लेकिन आनंददायक थे.
मई 1983 में इंडियन एक्सप्रेस में एक नए हिंदी अखबार जनसत्ता के लिए संपादकीय स्टाफ की भर्ती वास्ते विज्ञापन निकला. पता चला कि नए अखबार के संपादक प्रभाष जोशी होंगे. चूंकि मुझे पत्रकारिता करने का सुझाव सबसे पहले प्रभाष जी ने ही दिया था, इसलिए जनसत्ता में अवसर मिलने की उम्मीद से मैं उनसे मिला. उन्होंने कहा कि सारी नियुक्तियां लिखित परीक्षा और साक्षात्कार से होंगी. तुम भी आवेदन दे दो. मैंने ऐसा ही किया. टेस्ट और साक्षात्कार में पास होने पर मैंने राजेंद्र माथुर को अपना इस्तीफा सौंपा तो उन्होंने मुझ से इस्तीफे पर पुनर्विचार करने को कहा और नभाटा के शीघ्र प्रकाश्य लखनऊ संस्करण भेजने का प्रस्ताव किया. चूंकि मैं प्रभाष जी के साथ काम करने का फैसला कर चुका था, इसलिए मैंने लखनऊ जाने से मना कर दिया और जुलाई 1983 में जनसत्ता में काम शुरू कर दिया. चूंकि टाइम्स हाउस और एक्सप्रेस बिल्डिंग एक-दूसरे के बहुत करीब हैं इसलिए नवभारत टाइम्स से रिलीव होने से पहले कुछ दिन दोनों दफ्तरों में जाता रहा.
नवभारत टाइम्स से रिलीव होने पर वहां के संपादकीय विभाग के कुछ साथियों ने मेरी विदाई के लिए एक संक्षिप्त कार्यक्रम का आयोजन किया. यह आयोजन एक तरह से अजूबा था. कारण, टाइम्स समूह में कार्यरत बहुत कम लोग वहां से इस्तीफा देते थे और जो इक्का-दुक्का लोग इस्तीफा देते भी थे, उनके लिए विदाई कार्यक्रम की कोई परंपरा नहीं थी.
प्रभाष जी ने 1974 में अपनी एक कानपुर यात्रा से लौटते समय कानपुर सेंट्रल स्टेशन पर बातचीत के दौरान मुझे पत्रकारिता करने के लिए दिल्ली आने को कहा था. तब मैं एमए की पढ़ाई कर रहा था और प्रभाष जी मुख्य धारा की पत्रकारिता से दूर ख्यात कवि भवानी प्रसाद मिश्र के संपादन में निकलने वाले साप्ताहिक पत्र सर्वोदय जगत में उनके सहायक की भूमिका में थे. मैं कभी-कभार कानपुर में तरुण शांति सेना की गतिविधियों की रिपोर्ट सर्वोदय जगत में प्रकाशनार्थ भेजता था. इन्हीं में से एक रिपोर्ट सर्वोदय जगत में पूरे पेज में मेरी बाइलाइन के साथ छपी थी. यह किसी भी पत्र-पत्रिका में मेरी पहली बाइलाइन थी.
संभवतः प्रभाष जी को मेरी रिपोर्ट की भाषा -शैली पसंद आई थी.
पिछले भाग…
मेरी पत्रकारिता यात्रा (2) : दैनिक जागरण छोड़कर मैं टाइम्स समूह आ गया, दोनों की कार्यशैली में बड़ा फर्क था, जिसका मुझे नुकसान-लाभ दोनों हुआ!



