देवप्रिय अवस्थी-
जनसत्ता की रिपोर्टिंग टीम भले ही छोटी थी पर उसे इंडियन एक्सप्रेस के रिपोर्टरों की खबरें भी उपलब्ध रहतीं थीं. एक्सप्रेस के ब्यूरो के सीनियर रिपोर्टर तक जनसत्ता में अपनी खबरें और बाईलाइन देखने के लिए उत्सुक रहते थे. यह याद करके मन बाग-बाग कर उठता है कि कभी हरिकृष्ण दुआ, एनके रेड्डी, पी रमन, ए सूर्यप्रकाश, उषा राय, अश्विनी सरीन, संजय सूरी, शशि मेहता, पुष्पा गिरिमाजी सरीखे जाने-माने पत्रकार या फिर एस पाल और एसके शर्मा जैसे नामी फोटोग्राफर मेरी टेबल पर आकर अपनी खबरें और फोटो छापने का आग्रह करते थे. कई बार तो एक्सप्रेस के रिपोर्टरों की खबरों को जनसत्ता में एक्स्प्रेस से बेहतर ट्रीटमेंट मिलता और चर्चा भी ज्यादा होती.
जनसत्ता का प्रकाशन शुरू होने के पहले एक-डेढ़ महीने मैं दोपहर बारह-साढ़े बारह बजे से रात ढाई बजे तक दफ्तर में रहता था. उन दिनों पहला डाक संस्करण दोपहर ढाई बजे और लेट डाक संस्करण रात ढाई बजे फाइनल होता था. प्रभात संस्करण रात साढ़े नौ बजे और नगर संस्करण रात डेढ़ बजे फाइनल होते थे. इन सभी संस्करणों को रिलाज करने की अंतिम जिम्मेदारी मेरी रहती थी.
प्रभाष जी दिन में 11 दफ्तर आ जाते और शाम सात बजे घर लौटते. वे रोजाना रात करीब 10 बजे फोन करके मुझसे प्रमुख खबरों की जानकारी लेते और अपने निर्देश देते. वे खबरों के मेरे चयन और प्राथमिकताओ को लेकर प्रायः संतुष्ट रहते.
स्वर्णिम काल
जनसत्ता के शुरुआती दो-ढाई साल उसका स्वर्णिम काल था. इस दौरान छह बड़ी घटनाएं हुईं.
- ब्लू स्टार ऑपरेशन (3 जून 1984),
- इंदिरा गांधी की हत्या और सिख विरोधी दंगे (31 अक्तूबर 1984 और नवंबर 1984 का पहला हफ्ता),
- लोकसभा के मध्यावधि चुनाव (24, 27 और 28 दिसंबर 1984),
- भोपाल गैस त्रासदी (2-3 दिसंबर 1984),
- विश्व क्रिकेट चैंपियनशिप (17 फरवरी से 10 मार्च 1985),
- राजीव-लोंगोवाल समझौता (24 जुलाई 1985).
इन घटनाओं का जनसत्ता में हुआ कवरेज उसकी साख बनाने और प्रसार बढ़ाने में बहुत मददगार साबित हुआ. आस्ट्रेलिया में हुई विश्व क्रिकेट चैंपियनशिप की रिपोर्टिंग खुद प्रभाष जी ने की थी. फिर वह मौका भी आया जब हमें पाठकों से अनुग्रह करना पड़ा कि जनसत्ता को मिल-बांटकर पढ़ें क्योंकि हमारी प्रिंटिग मशीन की क्षमता मांग के मुताबिक प्रतियां नहीं छाप सकती है. उस दौर में पटना में पाठक लाइन लगाकर जनसत्ता खरीदते थे.
प्रभाष जी की टिप्पणी में बदलाव
प्रभाष जी की विशेष टिप्पणियां, जो अमूमन अखबार में एंकर के रूप में छपतीं, बड़े चाव से पढ़ी जाती थीं. वे अक्सर ये टिप्पणियां देर रात में लिखते और उनके लिए पेज का स्थान छोड़ने को पहले से कह देते. बहुधा इन टिप्पणियों का पहला पाठक मैं होता और फाइनल प्रूफ भी मैं ही पढ़ता. प्रभाष जी की बेहद साफ-सुथरी और करीने से लिखी कापी में शायद ही कभी कोई चूक होती हो, लेकिन एक मौका ऐसा भी आया जब मेरे आग्रह पर उन्होंने अपनी टिप्पणी की थीम को पूरी तरह बदल दिया.
ब्लू स्टार आपरेशन के फौरन बाद प्रभाष जी ने अपनी टिप्पणी अकाली दल की राजनीति पर हल्ला-बोल के अंदाज में शुरू की. चंडीगढ़ में इडियन एक्सप्रेस के स्थानीय संपादक रहने के दौरान उन्होंने अकालियों की राजनीति को करीब से देखा था. उसके प्रति प्रभाष जी के मन में एक तरह से वितृष्णा के भाव थे. उनकी टिप्पणी की शुरुआत में यही वितृष्णा झलक रही थी. मुझे लगा कि यह मौका सिख समुदाय को धिक्कारने का न होकर उनकी आहत भावनाओं पर मरहम लगाने का है. मैंने यह बात प्रभाष जी से कहीं तो उन्होंने अपनी कलम रोक दी.
फिर कुछ देर सोच-विचार के बाद नए सिरे से टिप्पणी लिखी. इसमें सिखों की आहत भावनाओं पर मरहम लगाने की बात को प्रमुखता से उकेरा गया. बाद में लगभग पूरे मीडिया ने मरहम लगाने या हीलिंग टच की बात को बहुत शिद्दत के साथ उठाया. यह प्रभाष जी का बड़प्पन था कि उन्होंने मेरी बात मानकर अपनी टिप्पणी की थीम बदल दी. बताता चलूं कि बाद में मेरा कुछ ऐसे संपादकों से भी पाला पड़ा जो अपने लिखे गलत शब्दों-वाक्यांशों और तथ्यों को जस का तस रखने पर अड़े रहते थे।
सबकुछ मीठा ही नहीं
जनसत्ता की मेरी यादों में सबकुछ मीठा मीठा ही नहीं रहा. बहुत कुछ ऐसा भी है जो उससे अलग होने के 40 साल बाद भी मन को बहुत गहरे तक सालता है. मैंने जनसत्ता में बतौर उपसंपादक काम शुरू किया था. परिस्थितिवश मुझे शुरू से ही न्यूजरूम की वे सारी जिम्मेदारियां संभालनी पड़ीं जो किसी समाचार संपादक की होती हैं. गोपाल मिश्र की जगह कोई सक्षम समाचार संपादक या उप समाचार संपादक होता तो न ही ये जिम्मेदारियां मुझ पर आतीं और न ही मेरी महत्त्वाकांक्षाओं को पर लगते. प्रभाष जी ने मुझे एक साल बाद मुख्य उपसंपादक और दो साल बाद उप समाचार संपादक बना दिया, लेकिन समाचार संपादक बनाने में ठिठक गए.
गोपाल मिश्र को विदा करने के बाद उन्होंने पहले श्याम आचार्य को और फिर अच्युतानंद मिश्र को समाचार संपादक बनाया. उम्र और अनुभव ज्यादा होने को छोड़कर दोनों में ऐसी कोई खूबी नहीं थी जो उन्हें इस कुर्सी स्वाभाविक पात्र बनाती. श्याम जी बहुत भले व्यक्ति थे. उनके आचार-व्यवहार में गजब की शालीनता थी. इस कारण मैं उनके साथ निभा पाया, लेकिन अच्युता जी के मामले में ऐसा नहीं कर पाया. मुझे यह बात और भी अखरी कि प्रभाष जी ने अच्युता जी के जनसत्ता से जुड़ने की बात मुझे आखिरी वक्त तक नहीं बताई. संभव है कि प्रभाष जी के ऐसा करने के पीछे कोई प्रशासनिक कारण या दूसरे दबाव रहे हों, मगर मेरी नजर में उनके ऐसा करने की वजह मुझ पर उनका भरोसा टूटना था.
मुझे लगा कि जनसत्ता में मेरे दिन पूरे हो गए हैं और अब मुझे यहां से मुक्त हो जाना चाहिए.
मैंने 1 मई 1986 को तीन महीने के नोटिस के साथ प्रभाष जी को से इस्तीफा दे दिया. मेरे पत्रकार जीवन का यह सबसे अहम और सबसे पीड़ाजनक फैसला था. मैंने शुरू के कई दिन अपने साथियों से इस्तीफे के बारे में कोई चर्चा नहीं की. इरादा तो पूरे नोटिस पीरियड में इस बाबत चर्चा नहीं करने का था, लेकिन इतने बड़े निर्णय को लंबे समय तक खुद तक सीमित रखने के लिए जितने धैर्य की जरूरत होती है, वह मुझ में नहीं था. जल्द ही साथियों को मेरे इस्तीफे की बात पता चल गई. पूरे नोटिस पीरियड में प्रभाष जी और मेरे बीच इस्तीफे पर कोई बात नहीं हुई.
हालांकि न्यूजरूम के कामकाज को लेकर हमारी बातचीत लगभग रोजाना होती थी. नोटिस पीरियड पूरा होने की शाम 31 जुलाई 1986 को जब मैं प्रभाष जी से विदा लेने उनके कमरे में गया तो वे घर जा चुके थे. उनके पीए रामबाबू ने सहज ही पूछा कि कोई खास बात है क्या?
मैंने उन्हें बताया कि मेरा नोटिस पीरियड पूरा हो गया है. कल से मैं जनसत्ता से मुक्त हो रहा हूं इसलिए प्रभाष जी से मिलकर जाना चाहता था. संभवतः रामबाबू ने यह बात टेलीफोन पर प्रभाष जी को बता दी. कुछ देर बाद रामबाबू ने न्यूजरूम में आकर प्रभाष जी का संदेश दिया कि मैं अगले दिन दफ्तर आकर उनसे मिलूं।
वह भावुक मुलाकात
अगले दिन 1 अगस्त 1986 को जब नियत समय पर प्रभाष जी से मिलने पहुंचा तो उन्होंने कहा कि तुम्हारा इस्तीफा तो मैंने उसी दिन फाड़कर डस्टबिन में डाल दिया था. उन्होंने समझाया भी कि ऐसे फैसले आवेश में नहीं लिए जाते हैं, मगर मैं अपने फैसले पर दृढ़ था. मैंने कहा कि मुझ पर आपका भरोसा टूटा है. ऐसे में मेरा मन मुझे अपना फैसला बदलने की इजाजत नहीं देता है. इस पर प्रभाष जी ने पूछा कि आगे क्या करने का इरादा है तो मैंने कहा कि आपने जांच-परख कर काबिल पाया है इसलिए नया काम तलाशना ज्यादा मुश्किल नहीं होगा.
इसके बाद प्रभाष जी ने मुझे नई तारीख में नए सिरे से इस्तीफा लिखने को कहा और तीन महीने के सवेतन अवकाश का आवेदन भी लिखवाया. यह मुलाकात बेहद भावुक थी. इधर मैं अपने रोने पर बामुश्किल काबू रख पा रहा था, उधर प्रभाष जी की आंखें भी भर आई थीं. नए सिरे से लिखे इस्तीफे का नोटिस पीरियड 31 अक्तूबर 1986 को पूरा हुआ, साथ ही जनसत्ता में मेरी पहली पारी भी.
पिछला भाग…
मेरी पत्रकारिता यात्रा (4) : जनसत्ता में प्रभाष जी पहले संपादक थे जो मेरी लिखी खबरों में सुधार-संशोधन की खासी गुंजाइश निकाल लेते!



