Connect with us

Hi, what are you looking for?

सियासत

खोजी पत्रकारिता की नसबंदी के लिए काला कानून लाने जा रही मोदी सरकार पर सुप्रीम कोर्ट की तल्ख प्रतिक्रिया, केंद्र से जवाब तलब!

डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन ने डेटा संरक्षण कानून को दी चुनौती, कहा—पत्रकारों को खबरों के लिए सहमति लेने को मजबूर किया गया तो बंद हो जाएंगे न्यूजरूम; सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब…

Blue glowing padlock over a digital circuit board, symbolizing online privacy.

नई दिल्ली। क्या किसी व्यक्ति के बारे में खबर प्रकाशित करने से पहले पत्रकार को उसी व्यक्ति की अनुमति लेनी पड़ेगी, जिसके कामकाज या गतिविधियों की वह पड़ताल कर रहा है? क्या भ्रष्टाचार, अनियमितताओं और सत्ता के दुरुपयोग से जुड़े मामलों की खोजी पत्रकारिता के लिए भी संबंधित व्यक्ति की सहमति जरूरी हो जाएगी? भारत के डिजिटल मीडिया जगत में इन सवालों को लेकर गंभीर चिंता सामने आई है।

डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) ने डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 और इससे जुड़े नियमों के कुछ प्रावधानों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। एसोसिएशन का कहना है कि कानून में पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट नहीं होने से समाचार संस्थानों के कामकाज और खोजी पत्रकारिता पर गंभीर असर पड़ सकता है। एसोसिएशन की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी गोराडिया दिवान ने अदालत में कहा कि यदि पत्रकारों को किसी व्यक्ति के बारे में खबर करने से पहले उसकी सहमति लेनी पड़ेगी, तो न्यूजरूम बंद होने की नौबत आ जाएगी।

खास बात यह है कि इस कानूनी लड़ाई में देश के बड़े मीडिया समूह भी शामिल हैं। DNPA के सदस्य संस्थानों में अडानी समूह का NDTV, मुकेश अंबानी का Network18, द इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स समूह और दूसरे बड़े मीडिया संस्थानों के डिजिटल प्लेटफॉर्म शामिल हैं। इस तरह सरकार के डेटा संरक्षण कानून को चुनौती देने वालों में ऐसे मीडिया संस्थान भी हैं, जिनका स्वामित्व देश के बड़े उद्योगपतियों के पास है।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को नोटिस दिया, अंतरिम रोक से इनकार

27 अक्टूबर 2026 को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने DNPA की याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन भी शामिल हैं।

DNPA ने विवादित प्रावधानों पर अंतरिम रोक लगाने की मांग भी की थी। हालांकि, अदालत ने केंद्र का पक्ष सुने बिना रोक लगाने से इनकार कर दिया। मामले में केंद्र सरकार से जवाब मांगा गया है और अगली सुनवाई 17 नवंबर को निर्धारित की गई है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी कहा कि मीडिया की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और आम नागरिकों की निजता के अधिकार के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है। अदालत ने याचिकाकर्ताओं से यह सुझाव देने को कहा कि मीडिया की स्वतंत्रता का दुरुपयोग रोकते हुए नागरिकों की निजता की रक्षा कैसे की जा सकती है।

पत्रकारिता के लिए अलग छूट क्यों मांग रहा है DNPA?

विवाद की जड़ डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 और डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण नियम, 2025 में है। यह कानून व्यक्तिगत डिजिटल डेटा के संग्रह, इस्तेमाल और प्रसंस्करण को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया है।

DNPA का तर्क है कि कानून में पत्रकारिता के लिए स्पष्ट और व्यापक छूट नहीं होने के कारण समाचार संस्थानों पर भी ऐसे नियम लागू हो सकते हैं, जो सामान्य व्यावसायिक गतिविधियों के लिए बनाए गए हैं। एसोसिएशन ने कानून की विभिन्न धाराओं और नियमों को चुनौती देते हुए कहा है कि इनके कारण पत्रकारों के लिए सूचनाएं जुटाना, उनका विश्लेषण करना और जनहित में खबरें प्रकाशित करना मुश्किल हो सकता है।

माधवी दिवान ने अदालत में दलील दी कि पहले कानून के कुछ प्रस्तावित संस्करणों में पत्रकारिता को छूट देने का प्रावधान था, लेकिन अंतिम कानून में ऐसी छूट नहीं रखी गई। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि किसी व्यक्ति के बारे में खबर करने से पहले उसी की सहमति लेनी पड़ेगी, तो खबरों का मूल उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा।

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि कानून में हर खबर प्रकाशित करने से पहले संबंधित व्यक्ति की अनुमति लेने का कोई सीधा, सार्वभौमिक आदेश नहीं लिखा है। यह DNPA की दलील है कि व्यक्तिगत डेटा के इस्तेमाल और प्रसंस्करण पर लागू सहमति संबंधी प्रावधान, पत्रकारिता के लिए छूट नहीं होने के कारण, व्यवहार में ऐसी बाधा पैदा कर सकते हैं। इसी आशंका को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है।

खोजी पत्रकारिता पर क्या पड़ सकता है असर?

मान लीजिए किसी पत्रकार को किसी सरकारी अधिकारी की संपत्ति, किसी कंपनी के संदिग्ध लेनदेन, सरकारी ठेके में अनियमितता या किसी सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति के हितों के टकराव से जुड़े दस्तावेज मिलते हैं। इन दस्तावेजों की जांच और खबर तैयार करने के लिए पत्रकार को संबंधित व्यक्ति की व्यक्तिगत जानकारी का इस्तेमाल करना पड़ सकता है।

यदि ऐसी परिस्थितियों में डेटा संरक्षण कानून की सहमति संबंधी शर्तें पत्रकारिता पर लागू होती हैं और कोई स्पष्ट छूट उपलब्ध नहीं होती, तो संबंधित व्यक्ति की सहमति, डेटा के इस्तेमाल और उसे सुरक्षित रखने की शर्तें रिपोर्टिंग को जटिल बना सकती हैं।

DNPA का कहना है कि इससे पत्रकारों को उन लोगों पर निर्भर होना पड़ेगा, जिनके कामकाज की वे जांच कर रहे हैं। एसोसिएशन ने यह आशंका भी जताई है कि कानून के कुछ प्रावधान सरकारी एजेंसियों को समाचार संस्थानों से जानकारी मांगने का अधिकार देते हैं, जिससे पत्रकारों के गोपनीय सूत्रों की पहचान उजागर होने का जोखिम पैदा हो सकता है।

हालांकि, इन आशंकाओं पर अंतिम न्यायिक फैसला अभी नहीं आया है। सुप्रीम कोर्ट को यह तय करना है कि कानून के विवादित प्रावधानों का पत्रकारिता पर क्या प्रभाव पड़ता है और नागरिकों की निजता की रक्षा करते हुए प्रेस की स्वतंत्रता को किस तरह सुरक्षित रखा जा सकता है।

अडानी और अंबानी के मीडिया समूह भी हैं पक्षकार

इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू याचिकाकर्ताओं का स्वरूप है। DNPA देश के 21 प्रमुख समाचार संस्थानों के डिजिटल प्रकाशन व्यवसायों का प्रतिनिधित्व करता है। इसके सदस्य संस्थानों में NDTV और Network18 जैसे मीडिया समूह भी शामिल हैं।

इसका मतलब है कि इस विवाद को केवल छोटे डिजिटल पोर्टल या स्वतंत्र पत्रकारों की समस्या के रूप में नहीं देखा जा सकता। देश के बड़े मीडिया संस्थानों को भी आशंका है कि कानून के मौजूदा स्वरूप से खबरें जुटाने, प्रकाशित करने और पत्रकारिता के स्रोतों की गोपनीयता बनाए रखने में कठिनाई हो सकती है।

हालांकि, इस याचिका में शामिल होने का अर्थ यह नहीं है कि सभी याचिकाकर्ताओं के विचार, व्यावसायिक हित या पत्रकारिता संबंधी नीतियां एक जैसी हैं। उनका साझा कानूनी सवाल यह है कि डेटा संरक्षण के नियमों और प्रेस की स्वतंत्रता के बीच सीमा कहां तय होनी चाहिए।”

डेटा संरक्षण कानून का उद्देश्य नागरिकों की निजी जानकारी की रक्षा करना है। इस उद्देश्य की अहमियत से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन सवाल यह भी है कि निजता की रक्षा के नाम पर जनहित से जुड़ी सूचनाओं की जांच और प्रकाशन में ऐसी बाधाएं तो नहीं खड़ी हो जाएंगी, जिनका असर लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका पर पड़े।

अभी सुप्रीम कोर्ट ने कानून पर रोक नहीं लगाई है और न ही यह फैसला दिया है कि पत्रकारों को हर खबर के लिए संबंधित व्यक्ति की सहमति लेनी होगी। अदालत ने केंद्र से जवाब मांगा है और मामले की सुनवाई जारी है।

17 नवंबर को होने वाली अगली सुनवाई महत्वपूर्ण होगी। उससे यह स्पष्ट होने की दिशा में प्रगति हो सकती है कि व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा और खोजी पत्रकारिता की स्वतंत्रता के बीच संतुलन किस तरह बनाया जाए। फिलहाल, सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या किसी व्यक्ति की निजता की रक्षा करते हुए पत्रकारों को उसी व्यक्ति के खिलाफ संभावित अनियमितताओं की जांच करने की स्वतंत्रता भी मिल पाएगी?


Exterior view of the Indian Supreme Court building with a white dome and red-brick accents, flanked by trees

दैनिक जागरण की ख़बर पढ़िए।
डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि न्यूज रूम के बंद होने की नौबत आ जाएगी।
सरकार जो नया नियम लेकर आ रही है।
इस नियम के मुताबिक पत्रकार उस व्यक्ति से पहले अनुमति लेंगे, जिसके बारे में खबर कर रहे हैं,
तब जाकर खबर कर सकेंगे।
खोजी पत्रकारिता को खत्म करने के लिए इससे अधिक प्रभावी तरीका और क्या होगा।
खास बात ये है कि सुप्रीम कोर्ट में की गई इस याचिका में अडानी और अंबानी भी पक्षकार हैं। वे भी सरकार के इस नए कानून से पीड़ित हैं।
राहत इंदौरी लिख गए हैं-
“लगेगी आग तो आएँगे घर कई ज़द में,
यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है।”

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन