अमिताभ श्रीवास्तव-
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की खोजी पत्रकार रितिका चोपड़ा ने चुनाव आयोग की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे पर कई सवाल उठाए हैं।
रितिका ने अखबार में फाइल की गई अपनी एक रिपोर्ट में चुनाव आयोग के हलफनामे का बिन्दुवार विश्लेषण करते हुए एक तरह से अपनी पत्रकारिता पर बीजेपी की तरफ से लगाए जा रहे आरोपों पर प्रतिक्रिया दी है और अपनी पहली रिपोर्ट, जिसमें चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेदों की बात कही गई थी, को सही ठहराया है क्योंकि चुनाव आयोग ने अपने हलफनामे में उस रिपोर्ट का कोई खंडन नहीं किया है।
सुप्रीम कोर्ट में आज सुनवाई से पहले रितिका ने चुनाव आयोग के हलफनामे के हर बिंदु का जवाब दिया है। उन्होंने आज इंडियन एक्सप्रेस में छपी अपनी रिपोर्ट के हिस्से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर सिलसिलेवार पोस्ट के जरिए साझा करते हुए हलफनामे का विश्लेषण किया। उनका विश्लेषण यहाँ प्रस्तुत है-
(नीचे रितिका चोपड़ा की टिप्पणियों को हिंदी में अनुवाद करके यहां लिखा गया है।)
चुनाव आयोग ने तीन सदस्यीय आयोग के कामकाज के तरीके को लेकर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में अपना जवाब दाखिल कर दिया है।
27 पन्नों का यह हलफनामा तीनों सदस्यों की मंजूरी से दाखिल किया गया है। आयोग का तर्क है कि उसके हर फैसले पर सर्वसम्मति थी और किसी चुनाव आयुक्त की ओर से दर्ज की गई टिप्पणी महज एक ‘सुझाव’ होती है, फैसला नहीं।
आइए, देखते हैं कि हलफनामे में किन मुद्दों को संबोधित किया गया है और किन सवालों का जवाब नहीं दिया गया है।
सबसे पहले, पूरे मामले की पृष्ठभूमि।
यह याचिका ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की उस पड़ताल पर आधारित है, जिसमें खुलासा किया गया था कि चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने 10 महीनों के दौरान 14 बार आपत्तियाँ दर्ज की थीं। इन आपत्तियों में कहा गया था कि आयोग के नाम पर ऐसे फैसले लिए जा रहे थे, जिनकी जानकारी तक उन्हें नहीं थी।
हलफनामे में इन टिप्पणियों में से किसी एक का भी खंडन नहीं किया गया है। इसमें केवल इतना कहा गया है कि आयोग ने इन टिप्पणियों को न तो सार्वजनिक किया है और न ही इन्हें सार्वजनिक करने की अनुमति दी है।
फॉर्म-6 के मामले में, आयोग का कहना है कि SIR से संबंधित घोषणा-पत्र एक अलग दस्तावेज था, न कि वैधानिक फॉर्म में किया गया कोई संशोधन।
लेकिन आयोग यह स्वीकार करता है कि ऑनलाइन फॉर्म में इसे जिस तरह दिखाया गया, उससे ऐसा लग सकता था कि फॉर्म-6 में संशोधन कर दिया गया है। आयोग यह भी मानता है कि अधिकारियों द्वारा उठाए गए ‘कुछ कदमों’ को ‘सुधारने की जरूरत’ थी और 21 अक्टूबर को इस फॉर्म को फिर से दो अलग-अलग हिस्सों में बाँट दिया गया।
लेकिन हलफनामा यह नहीं बताता कि जुलाई में ऑनलाइन फॉर्म में यह घोषणा-पत्र किसने जोड़ा था—उसके दो महीने बाद, जब तीन में से दो सदस्य लिखित रूप में दर्ज कर चुके थे कि ऐसा नहीं किया जा सकता।
पश्चिम बंगाल के मामले में, आयोग का कहना है कि मतदाता सूची में नाम शामिल किए जाने के खिलाफ अपीलें राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) के कार्यालय के अधिकारियों ने दाखिल की थीं और ‘इन मामलों को आयोग के सामने नहीं लाया गया।’
लेकिन हलफनामा यह नहीं बताता कि इस दावे का संधू की अगस्त में दर्ज टिप्पणी से क्या मेल बैठता है। संधू की टिप्पणी के मुताबिक, राज्य की मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने उनसे कहा था कि उन्हें ‘इस मामले के विवरण के बारे में कोई जानकारी नहीं है।’
गोवा के मामले में, आयोग का कहना है कि मतदाता सूची से बाहर रह गए 97 मतदाताओं में से 88 ने बाद में फॉर्म-6 के जरिए आवेदन कर दिया है।
लेकिन हलफनामा यह नहीं बताता कि फरवरी में सॉफ्टवेयर ने ERO के फैसलों को लागू होने से क्यों रोक दिया था। ऐसा तब हुआ, जब सात दिनों में आठ बार अनुरोध किए गए थे और आयोग के अपने उप निर्वाचन आयुक्त ने भी लिखित रूप में कहा था कि ‘आईटी सिस्टम आवश्यक कार्रवाई को रोक नहीं सकता।’
हलफनामा इस बात की पुष्टि करता है कि आयोग की जानकारी या मंजूरी के बिना एक वरिष्ठ अधिकारी ने कामकाज का पुनर्वितरण किया था। यह भी पुष्टि की गई है कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव को पत्र लिखा था और उनके संयुक्त निर्देश के बाद उस आदेश को ‘कभी लागू नहीं किया गया।’
लेकिन हलफनामा यह नहीं बताता कि वह आदेश जारी ही क्यों किया गया था, विवेक जोशी को एक अधिकारी ने फाइल देखने से क्यों रोक दिया था और उस अधिकारी—मनीष गर्ग—का बाद में क्या हुआ। हलफनामे में उनका नाम तक नहीं लिया गया है। दरअसल, हलफनामे में किसी भी अधिकारी का नाम नहीं है।
तो तस्वीर क्या उभरती है?
ऑनलाइन फॉर्म बदला गया, न्यायाधिकरणों के समक्ष अपीलें दाखिल की गईं और एक आदेश जारी किया गया।
चुनाव आयोग का हलफनामा शपथपूर्वक इन सभी घटनाओं की पुष्टि करता है।
लेकिन इनमें से किसी को भी गलत नहीं बताता। किसी का नाम नहीं लेता। और उस सवाल का जवाब तो बिल्कुल नहीं देता, जिसे दोनों चुनाव आयुक्त बार-बार उठाते रहे।
उनका सवाल यह नहीं था कि उनकी टिप्पणियाँ फैसले थीं या नहीं।
उनका असली सवाल यह था कि उन्हें इन फैसलों के बारे में पता तब क्यों चल रहा था, जब वे लिए जा चुके थे।
मूल खबर…



