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वेब-सिनेमा

ब्राजील के राष्ट्रपति ‘लूला’ ने न सिर्फ अपने विपक्ष को बल्कि FB, इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप को भी चुनाव हराया है!

Person seated at a desk viewing two large monitors filled with social feeds and news articles; a Brazilian flag is visible in the background.

दिलीप खान-

हमेशा की तरह ब्राज़ील में इस बार भी अमेरिका चुनाव लड़ रहा था। लैटिन अमेरिका के हर मुल्क में एक पार्टी अमेरिका होता है। ब्राज़ील में इस बार यह नंगा नाच मेटा (फ़ेसबुक) ने किया। सितंबर में मेटा ने लूला के कैंपेन पेज से राजनीतिक विज्ञापन चलाने की सुविधा बंद कर दी। दक्षिणपंथी अधिनायकवादी बोलसोनैरो के लिए कोई पाबंदी नहीं थी। लूला की पार्टी का आरोप है कि 9 अक्टूबर को लूला के ऑफ़िशियल इंस्टाग्राम अकाउंट से पोस्ट बूस्ट करने की सुविधा भी बंद कर दी गई। ऐसे कई आरोप हैं।

इस बात का स्केल समझने के लिए आपको यह समझना पड़ेगा कि गूगल 2024 में ही ब्राज़ील में राजनीतिक विज्ञापन का कारोबार समेट चुका है। यानी ऑनलाइन राजनीतिक विज्ञापन का बाज़ार लगभग पूरी तरह मेटा के हाथ में है। यानी, उसके तीन प्रॉडक्ट फ़ेसबुक, इंस्टाग्राम, और व्हाट्सऐप के पास। वही रिंगमास्टर है। दुकान का अकेला मालिक। उसने लूला के लिए शटर डाउन कर दिया।

ख़बरें यह भी आईं कि इंस्टाग्राम पर लूला का पूरा नाम टाइप करने पर भी उनकी प्रोफ़ाइल नहीं दिखती थी, जबकि फ़्लावियो बोलसोनैरो के मामले में सबकुछ चकाचक था। मेटा ने बाद में सफ़ाई में एक हास्यास्पद दलील दी कि लूला का नाम बहुत लंबा है।

मेटा एआई से ‘फ़्लावियो’ और उनके चुनावी नंबर ‘22’ के साथ तस्वीर मांगी जाती, तो उसकी असली फ़ोटो लगाकर तस्वीर बन जाती। लूला की तस्वीर मांगने पर एआई मना कर देता। आरोप सिर्फ़ लूला या उनकी पार्टी की तरफ़ से नहीं लगे, बल्कि पत्रकार यूनियन, छात्र संगठन, और अन्य लोगों ने भी चुनाव के बीच यही आरोप लगाए।

फिर मेटा की चोरी पकड़ी कैसे गई? 16 अक्टूबर को पत्रकार पात्रीसिया कैम्पोस मेलो ने मेटा के इंटरनल मैसेज अख़बार में छाप दिए। उनमें कर्मचारी ख़ुद मान रहे थे कि फ़्लावियो के मुक़ाबले लूला का अकाउंट रिस्ट्रिक्टेड था। वे यह भी मान रहे थे कि प्लैटफ़ॉर्म फ़्लावियो की प्रोफ़ाइल और उनके व्हाट्सऐप चैनल को रिकमंड कर रहा था, जबकि ब्राज़ील का क़ानून कहता है कि उम्मीदवारों के अकाउंट का ऐल्गोरिदम आधारित रिकमंडेशन ग़ैर-क़ानूनी है।

मेटा ने पहले 7 अक्टूबर के ‘ग्लोबल आउटेज’ का बहाना बनाया था। इंटरनल मैसेज से पता चला कि वह आउटेज क़रीब पांच घंटे का था, जबकि लूला पर रोक कई-कई घंटे, कई-कई दिन तक चली। एआई वाली गड़बड़ी को एक कॉलमनिस्ट ने ख़ुद मेटा एआई को टेस्ट करके पकड़ी।

अब बात यह है कि पकड़े जाने के बाद क्या हुआ? मेटा का पहला जवाब था कि ‘मामूली तकनीकी दिक़्क़तों को राजनीतिक नैरेटिव की तरह पेश किया जा रहा है। उसने यह भी कहा कि मेटा के किसी एक पक्ष की तरफ़दारी करने की हर बात झूठी है। उसने स्वतंत्र ऑडिट करने वाली संस्था CTRL+Z के आंकड़ों को गुमराह करने वाला बताया।

15 अक्टूबर को अदालत ने मेटा को दोनों उम्मीदवारों के साथ बराबरी का बर्ताव करने का आदेश दिया।

आदेश न मानने पर हर दिन पांच लाख रियाल का ज़ुर्माना तय हुआ। इसके बाद मेटा ने कहा कि राष्ट्रपति उम्मीदवारों के विज्ञापन अकाउंट पर अगर कोई रिस्ट्रिक्शन लगता है, तो दो घंटे के भीतर उसे मैन्युअली ठीक किया जाएगा। साथ ही उसने अदालत से ज़ुर्माना न लगाने की अपील की। सरकार ने दीवानी मुक़दमा दायर किया और मेटा के एल्गोरिदम का स्वतंत्र ऑडिट मांगा। बदले में मेटा ने कहा कि कई बार फ़्लावियो के विज्ञापन पर भी रोक लगे थे।

तो कुल बात यह है कि लूला ने जो चुनाव जीता, वह अमेरिकी हस्तक्षेप के बावजूद जीता। आपको लग रहा होगा कि फ़ेसबुक-व्हाट्सऐप का इतना असर थोड़ी होता है? अगर आपको सच में ऐसा लग रहा है, तो ब्राज़ील के इस चुनाव में सोशल मीडिया की भूमिका को पलटकर देख आइएगा।

बाक़ी, मेरा क्या है, मेरा तो पीएचडी का विषय ही यही है। आदतन देखता रहता हूं।


संजय श्रीवास्तव-

लूला ने ब्राजील में वही किया जो भारत ने खोया

Watercolor portrait of a smiling older man with a gray beard in a dark suit and red tie, with a Brazilian flag behind.

ब्राजील में 80 साल के लूला दा सिल्वा चौथी बार चुनावों में जीत गए हैं. भारत में रहने वालों के लिए लूला की जीत के पीछे की वजहों को जानना इसलिए जरूरी है कि क्योंकि भारत ने पिछले 30 सालों में जो खोया या गंवाया है, उसे लूला ने अपने 19 सालों के अब तक टर्म में बनाया या संवारा है. मेरे मित्र पारिवारिक परिजन और पत्रकार शोभन सक्सेना कई सालों से ब्राजील में रह रहे हैं. वह ब्राजील में सक्रिय रहते हैं. वहां मीडिया में लिखते और बोलते रहते हैं. भारत में भी हिंदू समेत कई अखबारों के साथ जुड़े हुए हैं.

उनसे आज सुबह बात हुई तो लगा कि भारत ने तीस सालों में जो गंवाया उसे वाकई लूला ने शिद्दत से संवारा, संभाला और बनाया. पहली बार वह 2003 में वर्कर्स पार्टी की ओर से चुनाव जीतकर प्रेसीडेंट बने. उसके बाद उन्होंने देश में शिक्षा का मजबूत संजाल फैलाने का काम किया. देशभर में पहली बार कितनी ही सेंट्रल यूनिवर्सिटी बना दीं. जहां मास्टर्स तक क्वालिटी एजुकेशन फ्री है. यूनिवर्सिटी बहुत अच्छी तरह चलाई जाती हैं. स्कूल ज्यादा बने और बेहतर भी. वहां इनमें पढ़ाई फ्री है, साथ में यहां बच्चों का खाना भी.

हेल्थ पर बहुत खर्च किया. आमतौर पर सरकारी अस्पतालों की संरचना और संजाल कहीं ज्यादा बेहतर और मजबूत हुआ. हेल्थकेयर फ्री है. ब्राजील की आबादी 25 करोड़ है. ये देश अपनी जीडीपी का 5 फीसदी शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च कर रहा है. कह सकते हैं कि लूला ने वेलफेयर में जो काम किया उसने ब्राजील को अगर अंदरूनी तौर पर बदला तो आर्थिक ताकत भी बना दिया.

आर्थिक उदारीकरण के दौर से पहले भारत में ये सब बखूबी हो रहा था लेकिन 90 के दशक के मध्य के बाद वो पटरी से उतरने लगा. पता नहीं कितने लोगों को याद वो जमाना सरकारी स्कूलों और सरकारी अस्पताओं का था, जो आमतौर पर फ्री या बहुत सस्ते थे. तब लोगों के जेहन में प्राइवेट स्कूल या प्राइवेट हास्पिटल नहीं आते थे, वो सरकारी अस्पताओं और स्कूलों पर ज्यादा भरोसा करते थे.

तो अब सवाल ये है कि भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य और शिक्षा की सेवाएं कमज़ोर क्यों हुईं, जबकि प्राइवेट सेक्टर महंगा होता गया. इसका जवाब केवल “निजीकरण” नहीं है – इसमें कम सरकारी ख़र्च, राज्यों की बजट सीमाएं, नौकरियों इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी और मध्यम वर्ग की प्राइवेट सेवाओं की ओर बढ़ती निर्भरता सभी कुछ है. मैं बेहिचक कह सकता हूं कि 90 के दशक से बाद से सरकारी अस्पतालों और स्कूलों ही नहीं बल्कि सारे ही सरकारी उपक्रमों को खोखला और बर्बाद करने का काम शुरू कर दिया गया.

भारत में बेशक सरकारी स्वास्थ्य ख़र्च बढ़ा है लेकिन अब भी राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के 2.5% GDP लक्ष्य से काफ़ी नीचे है. सरकारी ख़र्च 2014-15 में GDP का 1.13% था, जो 2021-22 में 1.84% हुआ; फिर भी यह लक्ष्य से कम है. इसका सीधा असर यह है कि लोगों को इलाज के लिए अपनी जेब से पैसा देना पड़ता है. 2021-22 में कुल स्वास्थ्य ख़र्च का 39.4% घरों की जेब से आया. 2022-23 के आकलन में यह अनुपात लगभग 43.4% बताया गया है.

सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर, नर्स, दवाइयां, बिस्तर और डायग्नोस्टिक सुविधाएं अमूमन लचर या नाकाफी हो चुकी हैं. इसलिए मरीज़ प्राइवेट क्लिनिक, लैब और अस्पतालों की ओर जाते हैं. प्राइवेट अस्पताल बाज़ार में काम करते हैं: वे बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर, तकनीक और सुविधा देते हैं, पर इसकी लागत मरीज़ से कई गुना ज्यादा वसूलते हैं, लोगों की जमापूंजी और घर तक बिक जाते हैं.

आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं में भी बड़ा हिस्सा प्राइवेट अस्पतालों को भुगतान के रूप में जाता है, जबकि सरकारी अस्पतालों की क्षमता बढ़ाने पर उतना ज़ोर नहीं रहता.
मैं मानता हूं कि सरकारी ख़र्च बढ़ा होगा लेकिन वो इतना कम और असमान रहा कि ज़रूरतमंद लोगों के लिए मुफ़्त, गुणवत्तापूर्ण और आसान उपलब्ध इलाज की जगह प्राइवेट बाज़ार विस्तारित हो गया. हमें ये सोचना चाहिए कैसे फ्री हेल्थ और फ्री शिक्षा कॉलेज तक 80 के दशक तक आमतौर पर सुलभ थी, जो अब दुर्लभ हो चुकी है.

शिक्षा में क्या हुआ?
शिक्षा में भी वही मूल समस्या है – सार्वजनिक ख़र्च राष्ट्रीय शिक्षा नीति के 6% GDP लक्ष्य से बहुत पीछे है. केंद्र और राज्य मिलकर लगभग 4.1% GDP शिक्षा पर ख़र्च कर रहे हैं, जबकि NEP 2020 ने 6% की सिफ़ारिश की है.नतीजा यह है कि सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी, बुनियादी सुविधाओं की कमी और गुणवत्ता में अंतर दिखता है. हाल ही में कॉकरोच जनता पार्टी ने देश के कई राज्यों में प्राथमिक स्कूलों की जर्जर हालत को जिस तरह उजागर किया, उसे क्या कहेंगे. जिनके पास थोड़ी भी क्षमता हो, वे प्राइवेट स्कूलों की ओर जाते हैं और प्राइवेट शिक्षा की लागत लगातार बढ़ी है. 2025 के सर्वे के अनुसार प्राइवेट स्कूल में पढ़ाई की लागत सरकारी स्कूल से लगभग 10 गुना ज़्यादा है.

2019-20 में सार्वजनिक शिक्षा ख़र्च GDP का लगभग 4% था, जबकि घरों से होने वाला निजी ख़र्च 2.8% था; यानी परिवार शिक्षा का बड़ा हिस्सा ख़ुद चुका रहे हैं. पिछले तीन दशकों में निजी शिक्षा-ख़र्च सार्वजनिक ख़र्च से तेज़ी से बढ़ा है, जो शिक्षा के निजीकरण का संकेत है.

होना तो ये चाहिए कि स्वास्थ्य पर सार्वजनिक ख़र्च को कम से कम 2.5% GDP तक ले जाएं, उसका बड़ा हिस्सा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, ज़िला अस्पतालों, दवाइयों तथा मानव संसाधन पर ख़र्च करें. शिक्षा में 6% GDP का लक्ष्य को पूरा किया जाए. खासतौर पर सरकारी स्कूलों में स्थायी शिक्षक भर्ती, डिजिटल लैब सुविधाएं और मिड-डे मील को बेहतर किया जाए.

ब्राजील में मिडिल क्लास को लगातार मजबूत किया जा रहा है. भारत में मिडिल क्लास आमतौर पर अपनी जेब से कितना और कहां कहां लूटा रहा है – कहने की बात नहीं है.

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