कमाई करते मीडिया हाऊसेस, हिस्सा लेते हैं मार्केटिंग वाले और मुंह ताकते हैं एडीटोरियल वाले!

मीडिया सबकी सुनता आ रहा है लेकिन मीडिया वालों की सुनने वाला कोई नहीँ है। मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारशें मानने की बात हो या फिर विशेष सप्लीमेंट्स के दौरान होने वाला पत्रकारों का शोषण हो- भुगतता एडीटोरियल ही है। इन दिनों फेस्टिवल सीजन चल रहा है। डबल एडीशन छप रहे हैं। यानी एडीटोरियल वाले डबल मेहनत कर रहे हैं। मीडिया हाऊसेस गाढ़ी कमाई कर रहे हैं। इसमें से मार्केटिंग वालों को तो इंसेंटिव के रूप में उनका हिस्सा मिल जाता है, लेकिन एडीटोरियल वाले मेहनत करने के बावजूद मुंह ताकते रह जाते हैं।

ऊपर से इस कारण छुट्टी नहीं मिलती और घरवालों से जो सुनना पड़ता है सो अलग। मीडिया की रीढ़ माना जाता एडीटोरियल कार्पोरेट्स ने दोयम दर्जे का बना कर रख दिया है। जो मीडिया दूसरे विभागों की सेलेरी के बारे में बेबाक बात करने की बात करता है, उसके कर्मचारियों को अपने वेज बोर्ड के बारे में सूचना तक नहीं मिल रही।

(एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.)



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