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सियासत

ज़ुकरबर्ग की माफी : लोकतंत्र में नियम प्रधानमंत्री के वीडियो से शुरू होकर प्रधानमंत्री के वीडियो पर समाप्त नहीं हो सकते!

शीतल पी सिंह-

ज़ुकरबर्ग की माफी..

कल परसों से प्रचारित किया गया है कि फेसबुक के मालिक मार्क ज़ुकरबर्ग ने भारत सरकार से माफी मांगी है। हर मामले की तरह प्रचारक इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महाबली होने की इमेज में जोड़ रहे हैं जिसमें इधर काकरोचों ने काफ़ी गहरी ख़रोंच मार दी है। घटना पूरी तरह काल्पनिक नहीं है, लेकिन जिस तरह इसे पेश किया जा रहा है, उसमें कथा कहानी बहुत अधिक और सच्चाई बहुत कम है।

भारत मेटा के लिए कितना महत्वपूर्ण है? फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप चलाने वाली मेटा दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियों में है। उसकी कमाई विज्ञापनों से होती है। वर्ष 2025 में मेटा की वैश्विक आय लगभग 201 अरब डॉलर थी।

भारत में फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप के उपयोगकर्ताओं की संख्या दुनिया में सबसे अधिक है जिसके अलग-अलग ऐप्स के संयुक्त मासिक उपयोगकर्ताओं की संख्या एक अरब से अधिक बताई जाती है। इसका अर्थ एक अरब अलग-अलग लोग नहीं है, क्योंकि एक ही व्यक्ति फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप तीनों इस्तेमाल कर सकता है। फिर भी भारत का आकार असाधारण है।

वित्तीय वर्ष 2024-25 में मेटा इंडिया का शुद्ध लाभ लगभग 648 करोड़ रुपये और परिचालन आय लगभग 3,793 करोड़ रुपये रही। लेकिन भारत में उसके प्लेटफॉर्मों से जुड़ा सकल विज्ञापन कारोबार लगभग 29 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच चुका था। ये दोनों आंकड़े अलग हैं, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय कंपनियों की आय, विज्ञापन बिक्री और समूह कंपनियों के बीच भुगतान अलग-अलग खातों में दर्ज होते हैं।

भारत से मेटा को प्रति उपयोगकर्ता अमेरिका या यूरोप जितनी कमाई नहीं होती। लेकिन यहां करोड़ों नए इंटरनेट उपयोगकर्ता, छोटे व्यापारी, राजनीतिक दल, मीडिया संस्थान, फिल्म उद्योग, धार्मिक संगठन और सरकारी विभाग उसके प्लेटफॉर्मों पर निर्भर हैं। विकसित देशों में बाजार काफी हद तक भर चुका है, जबकि भारत में डिजिटल विज्ञापन और इंटरनेट कारोबार अभी बढ़ रहा है। इसीलिए भारत मेटा की आज की कमाई से अधिक उसके भविष्य के लिए महत्वपूर्ण है।

ऐसे विशाल बाजार में सरकार से टकराना किसी भी कंपनी के लिए आसान नहीं है। सरकार नोटिस भेज सकती है, सामग्री हटाने को कह सकती है, अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर सकती है और कंपनी की कानूनी सुरक्षा पर सवाल उठा सकती है। इसलिए मेटा भारत सरकार की नाराजगी को हल्के में नहीं ले सकता।

अब हाल की माफी का मामला समझिए। जुलाई 2026 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक वीडियो फेसबुक पर कुछ समय के लिए सीमित हो गया था। मेटा ने इसे अपनी प्रक्रिया से जुड़ी गलती बताया। इस पर भाजपा सांसद और संचार और सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी संसदीय स्थायी समिति अध्यक्ष निशिकांत दुबे ने मांग की कि मेटा के भारतीय अधिकारियों की ओर से दिया गया स्पष्टीकरण पर्याप्त नहीं है और मार्क ज़ुकरबर्ग स्वयं माफी मांगें। उन्होंने मेटा की कानूनी सुरक्षा वापस लेने की चेतावनी दे दी।

इसके बाद भारत सरकार और मेटा के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच बैठक हुई। चर्चा केवल प्रधानमंत्री के वीडियो तक सीमित नहीं थी। बाल यौन शोषण से जुड़ी सामग्री, डीपफेक, आपत्तिजनक विज्ञापन, बॉट्स और सत्यापित खातों की सुरक्षा जैसे प्रश्न भी उठे। सरकारी सूत्रों के अनुसार मेटा अधिकारियों ने प्रधानमंत्री का वीडियो हटाए जाने पर खेद व्यक्त किया और ज़ुकरबर्ग की ओर से भी माफी का संदेश दिया गया।

इसलिए यह कहना गलत नहीं है कि मेटा या ज़ुकरबर्ग की ओर से भारत सरकार के सामने खेद प्रकट किया गया। लेकिन यह भी सच है कि ज़ुकरबर्ग ने किसी सार्वजनिक मंच पर आकर भारतीय नागरिकों या संसद के सामने विस्तृत माफी नहीं मांगी। कोई विस्तृत सार्वजनिक पत्र भी सामने नहीं आया, जिसमें साफ लिखा हो कि कंपनी कौन-सी जिम्मेदारी स्वीकार कर रही है और भविष्य में क्या बदलाव करेगी।

यही वह जगह है जहां भारत और दूसरे देशों में मेटा की जवाबदेही का अंतर दिखाई देता है।

अमेरिका में कैम्ब्रिज एनालिटिका मामले के सामने आने के बाद ज़ुकरबर्ग को संसद के सामने घंटों बैठकर सवालों का जवाब देना पड़ा था। करोड़ों लोगों का डेटा बिना उचित सहमति के राजनीतिक प्रचार में इस्तेमाल किए जाने का मामला सामने आया था। अमेरिकी नियामक ने फेसबुक पर पांच अरब डॉलर का जुर्माना लगाया। कंपनी को अपनी निजता और निगरानी व्यवस्था बदलनी पड़ी।

अमेरिका में ज़ुकरबर्ग से चुनावों में हस्तक्षेप, डेटा चोरी, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप के अधिग्रहण, बाजार पर एकाधिकार और बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य जैसे सवालों पर भी पूछताछ हुई। वर्ष 2024 में सोशल मीडिया से नुकसान झेलने वाले बच्चों के माता-पिता के सामने भी ज़ुकरबर्ग ने खेद व्यक्त किया था।

यूरोपीय संघ ने मेटा पर डेटा सुरक्षा उल्लंघनों के लिए अरबों यूरो के जुर्माने लगाए हैं। यूरोपीय नागरिकों का डेटा अमेरिका भेजने के मामले में अकेले 1.2 अरब यूरो का जुर्माना लगाया गया। पासवर्ड असुरक्षित तरीके से रखने, लोगों की निजी जानकारी का गलत उपयोग करने और डेटा उल्लंघनों पर भी अलग-अलग दंड दिए गए।

ब्रिटेन में मेटा को Giphy नाम की कंपनी का अधिग्रहण वापस करने का आदेश दिया गया, क्योंकि उससे बाजार में प्रतिस्पर्धा कमजोर होने का खतरा था। ऑस्ट्रेलिया में समाचार संस्थानों को उनकी सामग्री के लिए भुगतान करने के मुद्दे पर सरकार और फेसबुक के बीच तीखा टकराव हुआ। म्यांमार में फेसबुक पर रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ नफरत और हिंसा फैलाने वाली सामग्री को बढ़ाने के गंभीर आरोप लगे। संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार संगठनों ने कहा कि फेसबुक के एल्गोरिदम और कमजोर स्थानीय मॉडरेशन ने हिंसा के वातावरण को बढ़ाया।

अर्थात दुनिया के कई देशों में मेटा को केवल माफी नहीं, बल्कि संसद में गवाही, लिखित जांच, अरबों के जुर्माने, कंपनी बेचने के आदेश और मानवाधिकार उल्लंघनों की जवाबदेही का सामना करना पड़ा है। भारत में फिलहाल मामला बंद कमरे की बैठक, सरकारी बयान और खेद तक सीमित दिखाई देता है।

मेटा के भारत में नियुक्त अधिकारियों के भाजपा / आरएसएस से संबंधों का प्रश्न भी उठता रहा है। सबसे अधिक विवाद मेटा की पूर्व सार्वजनिक नीति प्रमुख अंखी दास को लेकर हुआ था। वर्ष 2020 में अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों में आरोप लगाया गया कि फेसबुक ने भाजपा के कुछ नेताओं की भड़काऊ पोस्ट पर अपने नियम लागू करने में नरमी दिखाई। यह भी आरोप लगा कि अंखी दास ने कंपनी के भीतर कहा था कि सत्तारूढ़ दल के नेताओं पर कार्रवाई करने से भारत में फेसबुक के व्यावसायिक हितों को नुकसान हो सकता है। उनकी कुछ पुरानी टिप्पणियों और पोस्टों को भी भाजपा तथा नरेंद्र मोदी के समर्थन के रूप में देखा गया। विवाद बढ़ने के बाद उन्होंने कंपनी छोड़ दी। दूसरा नाम शिवनाथ ठुकराल का है, जो मेटा इंडिया में सार्वजनिक नीति से जुड़े महत्वपूर्ण पद पर रहे। उनके बारे में भाजपा और नरेंद्र मोदी के राजनीतिक संचार से जुड़ी एक कंपनी के साथ पेशेवर संबंधों की रिपोर्टें सामने आईं।

वर्तमान मेटा इंडिया प्रमुख अरुण श्रीनिवास के भाजपा या आरएसएस की औपचारिक सदस्यता का कोई विश्वसनीय प्रमाण सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है। लेकिन कुछ सामग्री संबंधी फैसलों में भाजपा नेताओं के प्रति नरमी के आरोप जरूर लगे हैं।

पक्षपात का मतलब हमेशा यह नहीं होता कि ज़ुकरबर्ग खुद किसी पार्टी को जिताने का आदेश देते हैं। मेटा का पक्षपात उसके एल्गोरिदम, विज्ञापन प्रणाली, कर्मचारियों के फैसलों और सरकारी दबाव से पैदा हो सकता है।

फेसबुक और इंस्टाग्राम ऐसी सामग्री को आगे बढ़ाते हैं जिस पर ज्यादा प्रतिक्रिया आती है। गुस्सा, डर, नफरत, धार्मिक तनाव और व्यक्तिगत अपमान अक्सर तथ्यपूर्ण और शांत सामग्री से ज्यादा प्रतिक्रिया पैदा करते हैं। एल्गोरिदम भले किसी राजनीतिक दल का नाम न जानता हो, लेकिन वह उस राजनीति को लाभ पहुंचाता है जो समाज में सबसे अधिक उत्तेजना और ध्रुवीकरण पैदा करती है।

दूसरा बड़ा रास्ता राजनीतिक विज्ञापन है। जिसके पास ज्यादा पैसा, बेहतर डेटा और मजबूत डिजिटल टीम है, वह अपने संदेश को विशेष आयु, जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा और रुचि वाले लोगों तक पहुंचा सकता है। इस व्यवस्था में आर्थिक और राजनीतिक रूप से शक्तिशाली दल को स्वाभाविक लाभ मिलता है।

तीसरा कारण भारत की भाषाई विविधता है। अंग्रेजी के लिए तैयार तकनीक हिंदी, बांग्ला, तमिल, मराठी, तेलुगू या स्थानीय बोलियों के सांप्रदायिक संकेत, जातिगत गालियां और व्यंग्य ठीक से नहीं समझ पाती। इसलिए कई बार असली नफरत बच जाती है और राजनीतिक आलोचना या व्यंग्य हटा दिया जाता है।

चौथा कारण सरकारी दबाव है। जिस सरकार के पास कंपनी के अधिकारियों पर मुकदमा दर्ज करने, कानूनी सुरक्षा छीनने और प्लेटफॉर्म पर रोक लगाने की शक्ति हो, उसकी नाराजगी को कंपनी साधारण नागरिक की शिकायत से ज्यादा गंभीरता से ले सकती है।

सबसे बड़ा सवाल यही है। प्रधानमंत्री का वीडियो गलती से हटे तो संसद, मंत्रालय और मेटा का शीर्ष नेतृत्व तुरंत सक्रिय हो जाता है। लेकिन किसी दलित, अल्पसंख्यक, पत्रकार, महिला या सामान्य नागरिक को हजारों गालियां, बलात्कार की धमकी और जान से मारने की धमकी मिले तो क्या मेटा उतनी ही तेजी से कार्रवाई करता है?

भारत सरकार का मेटा से बाल यौन शोषण सामग्री, डीपफेक, हिंसा और फर्जी विज्ञापनों पर जवाब मांगना बिल्कुल सही है। मेटा भारत से कमाता है तो उसे भारतीय नागरिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी उठानी होगी। लेकिन जवाबदेही केवल प्रधानमंत्री और सत्तारूढ़ दल की प्रतिष्ठा तक सीमित नहीं हो सकती।

सवाल यह होना चाहिए कि क्या एक निजी विदेशी कंपनी को हमारी राजनीति, सामाजिक बहस और सूचना व्यवस्था पर इतना बड़ा, अदृश्य और लगभग अनियंत्रित प्रभाव रखने दिया जा सकता है?

लोकतंत्र में नियम प्रधानमंत्री के वीडियो से शुरू होकर प्रधानमंत्री के वीडियो पर समाप्त नहीं हो सकते।

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