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सुख-दुख

पत्रकार अब पहरेदार कुत्ता नहीं रहे, कटाहा कुत्ता हो गए हैं!

संजय सिन्हा-

पहरेदार कुत्ता NOW कटाहा कुत्ता…. खबरों की दुनिया में पहले ये मुहावरा प्रचलित था कि कुत्ता आदमी को काट ले तो खबर नहीं है, लेकिन आदमी कुत्ते को काट ले तो खबर है। उन्हीं दिनों हमें यह भी पढ़ाया गया था कि पत्रकार एक तरह से समाज के लिए पहरेदार कुत्ता (वाच डॉग) होता है।

एक दशक में पत्रकारिता में दो बदलाव हुए हैं।

  1. अब पत्रकार आदमी को काटने लगे हैं।
  2. पत्रकार अब पहरेदार कुत्ता नहीं रहे, कटाहा कुत्ता हो गए हैं।

जिन दिनों संजय सिन्हा पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे थे उन्हें पढ़ाया गया था कि किसी खबर पर किसी की टिप्पणी या प्रतिक्रिया चाहिए, तो वह पत्रकार दूसरे पक्ष से संपर्क करता था। सामने सवाल रखता था। सामने वाले ने मना कर दिया कि कोई जवाब नहीं देंगे, तो बात खत्म। पत्रकार की जिम्मेदारी थी कि वह उसे बार-बार परेशान न करे।

इसके बाद पत्रकार आजाद होता था अपनी रिपोर्ट लिखने के लिए और साथ में यह प्रतिक्रिया जोड़ने के लिए कि उसने दूसरे पक्ष से उनका जवाब चाहा था, लेकिन उन्होंने जवाब देने से मना कर दिया। यही पत्रकारीय सौम्यता थी। यही पत्रकारिता का संस्कार था।

मैंने 1988 में जब दिल्ली के भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) में पत्रकारिता की पढ़ाई के लिए दाखिला लिया, उससे पहले ही मुझे जनसत्ता में नौकरी मिल चुकी थी। प्रभाष जोशी संपादक थे। उन्होंने पत्रकारिता के जो नियम गढ़े थे, उनमें सबसे बड़ा नियम यही था कि आप अपनी बात कह सकते हैं, लेकिन किसी के मुंह में कलम नहीं घुसेड़ सकते। पत्रकारिता सवाल पूछने का पेशा है, जवाब ठूंसने का नहीं।

आईआईएमसी में भी हमें यह पढ़ाया गया कि मीडिया में हम क्या परोस सकते हैं, उससे ज्यादा जरूरी यह समझना है कि क्या नहीं परोस सकते। उसके बाद संसद की रिपोर्टिंग का पाठ हमें लोकसभा सचिवालय के पाठ्यक्रम में पढ़ाया गया। नियम, औपचारिकता, गरिमा और अनुशासन। हमें पढ़ाने वालों में शंकर दयाल शर्मा, नजमा हेपतुल्ला और सुभाष कश्यप जैसे लोग शामिल रहे। उस दौर में पत्रकारिता को पेशा नहीं, एक जिम्मेदारी माना जाता था। प्रभाष जोशी तो कहते थे कि ये मिशन है, नौकरी नहीं।

आप सोचेंगे आज अचानक पत्रकारिता का यह पाठ क्यों? वजह बहुत छोटी है, संकेत बहुत बड़ा।

मशहूर अभिनेता नसीरुद्दीन शाह एयरपोर्ट पर उतरे। एक माइकधारी रिपोर्टर उनके पीछे लग गया। “आपने यह कहा, क्यों कहा? अब क्या कहेंगे? आपकी प्रतिक्रिया क्या है?”

(प्रंसगवश बता दूं कि नसीरुद्दीन शाह को किसी कार्यक्रम में बुलाया गया था और फिर उन्हें वहां आने से मना कर दिया गया था, इस पर उन्होंने एक अखबार में लेख लिखा था, अपनी बात उन्होंने कही थी कि क्या हुआ, क्यों हुआ।)

रिपोर्टर ने नसीरुद्दीन शाह के मुंह में जब माइक घुसेड़ा तो उन्होंने ने सादगी से कहा, “मैं इस विषय पर कुछ नहीं कहना चाहता।”

यह एक स्पष्ट जवाब था। इससे अधिक शालीनता क्या हो सकती थी। लेकिन रिपोर्टर पीछे ही पड़ गया। जैसे कोई कटाहा कुत्ता एक राहगीर के पीछे पड़ जाए। “क्यों नहीं बोलेंगे? आपको बोलना होगा, आप चुप कैसे रह सकते हैं?”

शाह बार-बार मना करते रहे। रुक कर कहते रहे कि मुझे कुछ नहीं कहना है। मैं अभी बाहर से आया हूं। मुझे घर जाने दीजिए। इतने पर पत्रकार आराम से अपनी रिपोर्ट बना सकता था कि अमुक मामले पर नसीरुद्दीन शाह से प्रतिक्रिया मांगी गई, लेकिन उन्होंने टिप्पणी से इंकार कर दिया। खबर पूरी हो जाती। गरिमा बची रहती।

पत्रकार का काम समाज की रक्षा करना है, सत्ता से सवाल पूछना है, सच की निगरानी करना है। लेकिन वॉचडॉग अब ‘कटाहा कुत्ता’ बन चले हैं। पत्रकार को अब सच से ज्यादा शिकार की तलाश रहती है।

कैमरा ऑन हुआ नहीं कि किसी के मुंह पर माइक ठूंस देना ही पत्रकारिता समझ लिया गया। यह बदलाव धीरे धीरे आया है। खबर की जगह बाइट ने ले ली। रिपोर्टिंग की जगह प्रतिक्रिया ने। तथ्य की जगह शोर ने। और शोर ही खबर बन गया।

हालत यह है कि अब लोग कैमरा देखकर लोग डर जाते हैं। उन्हें लगता है कि अब कोई माइक उनके मुंह तक पहुंचेगा और उनसे कुछ कहलवा कर टीवी पर चला दिया जाएगा। वह बोलना चाहें या नहीं। मुंह से कुछ भी निकला, खबर।

मीडिया अपने क्रूरतम दौर में पहुंच गया है। जबलपुर में मेरे एक डॉक्टर मित्र हैं। पहले रोज सुबह सड़क पर टहलने जाते थे। अब नहीं जाते। मैंने पूछा था क्या हुआ?

उन्होंने कहा कि इन दिनों सड़क पर आवारा कुत्तों की टोली ने उत्पात मचा रखा है। किसी आते जाते को काट लेते हैं। कई बार शिकायत की, लेकिन कोई सुनता नहीं। पर कुत्ते तो पहले भी थे!

हां, संजय जी, पहले यूं ही किसी को नहीं काटते थे। इन दिनों पता नहीं क्या हुआ है…? मुझे लगा, यह बदलाव सिर्फ कुत्तों में नहीं आया है। आदमी में आया है। आदमी भी काटने लगा है।

खैर, क्योंकि मैं कानून की दुनिया में प्रवेश कर चुका हूं तो मैं अब जो अनुरोध करना होता है, कानून से करने लगा हूं। यह कानून की जिम्मेदारी है कि वह सीमाएं तय करे। कब, कहां, किससे और कितना पूछना है, यह तय होना चाहिए।

किसी को प्रताड़ित करना पत्रकारिता नहीं है। पत्रकार का काम जन तक सूचना पहुंचाना है। सरकार से सवाल पूछना है। समाज को जोड़ना है। किसी को डराना या परेशान करना नहीं है। दुर्भाग्य से अपने ही जीवनकाल में हमने पत्रकारिता का शिखर भी देखा और उसका पतन भी।

अब सवाल यही है कि अगली पीढ़ी को हम कौन सा चेहरा सौंप कर जाएंगे? गाय को एलियन उठा कर ले जाते हैं, बिना ड्राइवर के चलने वाली झूठी खबर और नाग-नागिन के बाद पत्रकारिता धीरे-धीरे अपने निम्नतर स्तर पर पहुंच गई है।

यकीन मानिए, यही हाल रहा तो एक भविष्यवाणी झूठी साबित हो जाएगी। आप पूछेंगे कि संजय सिन्हा किस भविष्यवाणी की बात कर रहे हैं?

यह कहा जा रहा था कि अगले कुछ वर्षों में प्रिंट मीडिया मर जाएगा। पर मुझे लगता है कि प्रिंट शायद फिर से जी उठे, लेकिन टीवी न्यूज का संसार मर जाएगा।

  1. लोग टीवी पर न्यूज चैनल देखना छोड़ रहे हैं।
  2. माइकधारी पत्रकार पूरे पेशे को शर्मसार करके छोड़ेंगे।

नोट- तस्वीर मेरी है (भुज भूकम्प के समय की रिपोर्टिंग की)। मैं हमेशा पहरेदार कुत्ता रहा। दूसरे की तस्वीर मैंने लगाई नहीं। क्यों लगाना? सब तो आप जानते ही हैं।

नसीरुद्दीन शाह से रिलेटेड न्यूज यहां पढ़ें….

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1 Comment

1 Comment

  1. भाई साहब आपने जो बात लिखी हैं वह 100 परसेंट साही हैं। यही हाल हो रहा है इलेक्ट्रोनिक मीडिया का लोगों को कितना भी समझाओ लेकिन नहीं मानते

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