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मध्य प्रदेश

पत्रकारिता की आड़ में वसूलीबाजी नहीं चलेगी : मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

Madhya Pradesh High Court ने धोखाधड़ी और ज़बरदस्ती वसूली के आरोपी एक पत्रकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि प्रेस की आज़ादी लोकतंत्र की बुनियादी ताकत है, लेकिन इसे लोगों से गैर-कानूनी फायदा उठाने के औज़ार में नहीं बदला जा सकता।

जस्टिस हिमांशु जोशी की बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि पत्रकार समाज के वॉचडॉग की भूमिका निभाते हैं और जनता से जुड़े मुद्दों की जानकारी सामने लाना उनका अहम कर्तव्य है। सार्वजनिक जमीन, सरकारी कामकाज और कानूनों के पालन से जुड़े मामलों पर रिपोर्टिंग करना पत्रकारिता की वैध जांच के दायरे में आता है। हालांकि अदालत ने साफ कहा कि प्रेस की स्वतंत्रता की ढाल का इस्तेमाल गैर-कानूनी लाभ लेने के लिए नहीं किया जा सकता।

क्या है मामला?

मामले में एक पत्रकार ने अपने खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करने की मांग की थी। यह FIR 5 अगस्त 2023 को कोकलाल यादव की शिकायत पर दर्ज हुई थी, जो खुद को यादव समुदाय का जिला अध्यक्ष बताते हैं। शिकायत में आरोप लगाया गया कि 18 जुलाई 2023 को ग्वालियर के यादव लाउंज में पत्रकार उनसे और भरत यादव, बद्री यादव, रामस्वरूप यादव तथा राजेश यादव से मिले।

शिकायत के अनुसार पत्रकार ने खुद को मीडिया से जुड़ा बताते हुए कहा कि राजस्व निरीक्षक कार्यालय के पास हो रहा निर्माण अवैध है। आरोप है कि उन्होंने कहा कि यह निर्माण कथित तौर पर गौठान की जमीन पर बिना आवश्यक भूमि उपयोग परिवर्तन और Panchayats (Extension to Scheduled Areas) Act, 1996 (PESA Act) के तहत अनुमति लिए बिना किया जा रहा है।

FIR के मुताबिक पत्रकार ने कथित तौर पर शिकायतकर्ता से 10 हजार रुपये की मांग की और कहा कि अगर पैसे नहीं दिए गए तो वह इस निर्माण और उसमें शामिल लोगों के बारे में नकारात्मक खबर प्रकाशित कर देगा। शिकायतकर्ता ने पैसे देने से इनकार कर दिया।

इसके बाद आरोप है कि “प्रदेश टुडे” में एक खबर प्रकाशित हुई, जिसमें गोंडवाना गणतंत्र पार्टी से जुड़े कुछ लोगों की तस्वीरों के साथ मेमोरियल निर्माण में गड़बड़ी का आरोप लगाया गया। इसी के आधार पर लिखित शिकायत दी गई और पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया।

अदालत की टिप्पणी

अदालत ने Indian Penal Code की धारा 420 (धोखाधड़ी) के तत्वों पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि धोखाधड़ी का मूल तत्व “धोखा” है, जो इस मामले के तथ्यों से स्पष्ट नहीं होता। इसलिए अदालत ने माना कि धारा 420 की आवश्यक शर्तें पूरी नहीं होतीं।

हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि पहली नजर में धारा 384 (जबरन वसूली) के तत्व इस मामले में मौजूद दिखाई देते हैं, इसलिए उस धारणा के तहत कार्रवाई जारी रह सकती है।

प्रेस की आज़ादी पर सख्त टिप्पणी

मामले को निपटाते हुए अदालत ने कहा कि पत्रकारिता लोकतंत्र के मूल स्तंभों में से एक है और उसका उद्देश्य सार्वजनिक हित से जुड़े तथ्यों को सामने लाना है। लेकिन यदि कोई पत्रकार खबर छापने की धमकी देकर निजी लाभ लेने की कोशिश करता है, तो वह पेशेवर जिम्मेदारी की आड़ में सुरक्षा का दावा नहीं कर सकता।

अदालत ने कहा कि न्यायालय को ईमानदार पत्रकारिता को दबाने के लिए की गई आपराधिक कार्रवाई से बचाना चाहिए, लेकिन पत्रकारिता की आड़ में किए जा रहे ऐसे कृत्यों को भी संरक्षण नहीं दिया जा सकता जो पहली नजर में जबरन वसूली जैसे अपराध की श्रेणी में आते हों।

आंशिक राहत

अंततः हाईकोर्ट ने याचिका को आंशिक रूप से मंजूरी देते हुए धारा 420 से जुड़ी कार्रवाई को रद्द कर दिया, जबकि धारा 384 के तहत चल रही कार्रवाई को जारी रखने की अनुमति दे दी।

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