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उत्तर प्रदेश

‘सीक्रेट डिटेक्टिव’ की तरह स्वतंत्र पत्रकारों की ‘जासूसी’ कर रही गोरखपुर पुलिस!

सत्येंद्र कुमार-

गर आपको लगता है कि गोरखपुर पुलिस का काम सिर्फ अपराधियों को पकड़ना और कानून-व्यवस्था बनाए रखना है, तो शायद आप गलत हैं। अब उनके पास एक और नया और क्रांतिकारी कार्यक्षेत्र है: स्वतंत्र पत्रकारों की जासूसी! जी हां, आपने सही सुना। अब पुलिस पत्रकारों से उनका ब्यौरा मांग रही है, जैसे वो अपनी रिपोर्ट नहीं, बल्कि पुलिस के लिए सीक्रेट डिटेक्टिव बनें।

सोचिए, अब तक पत्रकारों का काम था सिर्फ खबरें लाना, लोगों की आवाज बनना, और सत्ता की आलोचना करना। लेकिन अब उन्हें भी ये साबित करना होगा कि उनका उद्देश्य महज एक सच्चाई की खोज है, न कि किसी राजनैतिक चाल का हिस्सा। क्या पुलिस को ये अधिकार है? शायद नहीं, लेकिन शायद हमें इसे लोकतंत्र का एक नया ‘क़ानूनी’ पहलू मान लेना चाहिए।

पत्रकारों से उनका ब्यौरा मांगने का प्रस्ताव अगर आप हंसी में उड़ा रहे हैं, तो आप गलत हैं। यह तो एक प्रकार का आधुनिक ‘क्लियरेंस’ है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि पत्रकारों का झुकाव या काम सरकार के खिलाफ न हो। क्या गोरखपुर पुलिस को लगता है कि पत्रकारों के पास कोई रॉकेट साइंस या जासूसी योजना है? शायद नहीं, परंतु किसी भी रिपोर्टर का नाम, पता और बैकग्राउंड जानना पुलिस के लिए उनके ‘जनकल्याण’ का हिस्सा बन गया है।

चलिए, मान लीजिए यह सब ‘पारदर्शिता’ के नाम पर हो रहा है। तो फिर क्या अगला कदम होगा? क्या पुलिस कभी किसी नेता से उनके फॉलोवर्स का ब्यौरा भी मांगेगी? या फिर क्या किसी डॉक्टर से मरीजों की मेडिकल हिस्ट्री? क्यों न हम पूरी व्यवस्था को ‘हमें आपके बारे में सब कुछ जानना है’ के नारे के तहत चला लें!

लेकिन अगर हम थोड़ी गंभीरता से सोचें, तो यह सवाल उठता है कि क्या वास्तव में पुलिस को यह अधिकार मिलना चाहिए? पत्रकारिता का मुख्य उद्देश्य समाज में स्वतंत्रता और न्याय की आवाज उठाना होता है, न कि किसी की गिरफ्त में आकर काम करना। अगर पुलिस इस स्थिति का फायदा उठाकर पत्रकारिता की स्वतंत्रता को ही संदेहास्पद बना देगी, तो क्या हमारे लोकतंत्र में स्वतंत्र प्रेस का अस्तित्व बच पाएगा?

हालांकि, इस स्थिति को देखकर लगता है कि पुलिस का उद्देश्य पत्रकारों से उनका ब्यौरा मांगकर कुछ और नहीं, बल्कि अपने निगरानी तंत्र को सुदृढ़ करना है। अब सवाल यह उठता है, क्या यह लोकतंत्र की हत्या नहीं होगी ?

इसी क्रम मे जब पुलिस ने गोरखपुर के स्वतंत्र पत्रकार सत्येंद्र से उनकी पत्रकारिता का ब्यौरा मांगा तो पुलिस की आवश्यकता के कहीं अधिक विवरण पत्रकार सत्येंद्र ने पुलिस को चेंप दिया है ।

पढ़ें पत्र……

निष्कर्ष: इस ‘ब्यौरा मांगने’ के खेल को लोकतंत्र की बुनियादी मान्यताओं से दूर जाना माना जा सकता है। अगर यह परंपरा जारी रही, तो शायद गोरखपुर पुलिस को अगले साल ‘कागज की सैलरी’ भी मिलनी चाहिए, क्योंकि उन लोगों को न सिर्फ समाज, बल्कि प्रेस की छानबीन भी करनी होगी!

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