विकास मिश्रा-
मेरे साथ तस्वीर में ठहाका मारता हुआ जो इंसान दिखाई दे रहा है, अब वह इस दुनिया में नहीं है। मेरा यह मित्र राहुल कैंसर से लड़ रहा था, लेकिन जिंदगी की जंग हार गया। उम्र 50 से ज्यादा और 55 साल से कम। आईआईएमसी में मेरा साथी रहा राहुल यूं अपने बीच से उठकर चला जाएगा, कभी सोचा ही नहीं था।
अभी सवा साल पहले की बात है, जब हमारी पूरी मंडली मिली थी जयपुर में। ऐसे ही बात चल रही थी कि साल में एक बार मिलने की इस परंपरा को हम कायम रखेंगे। साल में हम लोग एक बार मिलेंगे जरूर। ऐसे दिन भी आएंगे जब मित्र बिछड़ना भी शुरू कर देंगे, लेकिन सिलसिला जारी रहेगा। तब कयास लगाया गया कि सबसे आखिर में कौन दो लोग बचेंगे, जो मिलेंगे। उसमें नाम आया था राहुल का, लेकिन राहुल तो पहले ही चला गया।
बहुत मस्त किस्म का इंसान था राहुल। 1994 में आईआईएमसी में जब मैं पढ़ने आया था, तब शुरुआत में ही राहुल से घनिष्ठता हो गई थी। उसे आश्चर्य हो रहा था कि मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय का छात्र था तो आईआईएमसी क्यों आ गया। गाहे बगाहे पूछता- अरे महाराज, इलाहाबाद से पढ़ने वाला या तो खाकी पहनता है या फिर खादी। आप यहां क्यों आ गए..? उसने एक ऐसा संबोधन दिया, जिसे मैं सख्त नापसंद करता हूं, लेकिन क्या करूं वह किसी के मनाए मानने वाला नहीं। उसने मुझे संबोधन दिया था-पंडित जी। फोन पर बात होती थी तो कहता था-पंडित जी प्रणाम।
इतना साफगोई वाला इंसान.. जो मुंह में है, वह कह देने वाला था राहुल। हमारे एक मित्र कहते थे- बहुत खचड़ा है राहुल। आईआईएमसी के दिनों की बात है, हम लोग सूरजकुंड मेला देखने गए थे। वहां एक संपेरा दो मुंहा सांप दिखा रहा था। हमारा एक साथी बहुत ध्यान से देख रहा था। राहुल बोला- क्या ध्यान से देख रहे हो, तुम्हारा ही भाई है।
शुरुआती दिनों में मैं दिल्ली में काम करने के बाद लखनऊ आ गया था। विचार मीमांसा पत्रिका का यूपी ब्यूरो चीफ था। राहुल तब कानपुर में था। अक्सर छुट्टी वाले दिन मोटरसाइकिल से लखनऊ आ जाता था। फिर रात भर बतकही चलती थी। अगले दिन वापस जाता था। दिल्ली में ऐसा संयोग हुआ कि महुआ चैनल में हम दोनों ने साथ काम किया। रोजाना मुलाकात होती रहती थी। पांच-छह साल पहले राहुल यहां से नौकरी छोड़कर गांव चला गया था। गांव में अच्छी खासी जमीन है। पटना में घर है। गांव का आनंद ले रहा था, गांव में रम गया था। हम लोगों को अपने गांव बुलाता रहता था, लेकिन कभी जाना नहीं हो पाया।
जब राहुल को कैंसर होने का पता चला तो हम सब हक्के-बक्के थे। उससे कई बार बात भी हुई। उसे लग रहा था कि वह बच जाएगा। साथियों ने हौसला भी काफी दिया था, पैसों का भी इंतजाम किया था, लेकिन परिणाम सबको पता था। कैंसर की बीमारी भी ऐसी है कि अक्सर आखिरी स्टेज में ही पता चलती है।

इंटरमीडिएट के साथी हों या विश्वविद्यालय के या फिर आईआईएमसी के मित्र। सभी 55 साल के आसपास के हैं। हमारे विकेट गिरने शुरू हो गए हैं। आईआईएमसी का ही हमारा साथी नलिन चौहान पिछले कुछ सालों से लापता है। उसके जीवित होने की बस क्षीण सी आस बची हुई है। इंटरमीडिएट में हमारे सहपाठी और मित्र संजय श्रीवास्तव का पिछले साल निधन हो गया। वह बीपी और शुगर से पीड़ित था। आज हम जीवित हैं, कल किसी का भी नहीं पता।
जिस वातावरण में हम रह रहे हैं, जो खा-पी रहे हैं, उसमें यह अपेक्षा करना कि हम अपने बुजुर्गों जैसी उम्र पाकर दुनिया छोड़ेंगे, यह बेमानी है। किसी का भी टिकट कभी भी कट सकता है। हमारे एक साथी कहीं प्लाट और जमीन में इन्वेस्टमेंट की बात कर रहे थे। मैंने कहा कि भाई यह समय फैलाने का नहीं, समेटने का है। गाजियाबाद में मेरे दो फ्लैट थे, एक बिल्डर फ्लोर का टू बीएचके और दूसरा सोसाइटी में 3 बीएचके। करीब डेढ़ साल पहले मैंने अपना टू बीएचके फ्लैट बेच दिया। दूसरे वाले का लोन चुकाया। कार लोन चुकाया। कर्जों का बोझ खत्म किया। डर यह भी था कि न जाने कब बुलावा आ जाए और अगली पीढ़ी के लिए बैंक के कर्जे छोड़कर जाना पड़ जाए।
अगर आपकी उम्र भी 55 साल के आसपास है तो मान लीजिए कि जिंदगी के क्रिकेट मैच के स्लॉग ओवर चल रहे हैं। वक्त काटना नहीं है, स्कोर करना है। मेरे बनारस के सहपाठी मित्र प्रभाकांत ने यही कहा था कि दोस्त क्या पता कब वहां से बुलावा आ जाए, इससे पहले मित्रों के बुलावे पर आ जाया करो। मैं भागा हुआ प्रयागराज गया था उससे मिलने। आपसे भी कहता हूं वक्त दोस्ती में, रिश्तों में आनंद लेने का है, गिले शिकवे करने का नहीं है। सब कुछ यहीं छूट जाएगा। दो मित्रों के बीच अगर एक कोई सह रहा है, चुप रह जा रहा है तो उसका मतलब सिर्फ यही है कि वह रिश्ता निभा रहा है। हमारे भी कुछ ऐसे प्रियजन हैं, जिनके साथ रिश्तों की मिठाई में खटाई पड़ गई है। हमारी सदाओं में कोई कमी नहीं है, देखते हैं कि सजदा कबूल कब होगा। कहीं ऐसा न हो कि सजदा कबूल करने में उनसे देर हो जाए।
मित्रों में जब मैं देखता हूं कि प्यार-मुहब्बत-अपनेपन की जगह अपेक्षाएं बढ़ रही हैं, जलन बढ़ रही है, सात पुश्तों के इंतजाम की होड़ बढ़ रही है, बातें नहीं हो रही हैं, मनमुटाव हो जा रहा है, अनबन हो जा रही है, तब बहुत तकलीफ होती है। क्या धरती पर यही छोड़कर या फिर यहां से यही लेकर हम जाएंगे.? आज राहुल के लिए मन भारी है। ईश्वर उसकी आत्मा को शांति दें। परिवार को दुखों का यह भार वहन करने की क्षमता भी दें। जहां राहुल पहुंचा है, वही जिंदगी की आखिरी मंजिल है। हम सब वहीं पहुंचेंगे। राहुल वहां अगवानी के लिए पहले ही पहुंच चुका है। मित्रों का आखिरी समागम तो वहीं होगा।
अमरेंद्र किशोर-
मौत के उस पार बैठा मित्र
राहुल चला गया। ढेर सारी यादों के साथ। न जाने कितने सबक देकर। अनेक सवाल छोड़ गया। उसका जाना पीड़ा भरी रिक्तता नहीं है, वह टीस है जो आसाध्य होकर बनी रहेगी, हमारे जहन में, रूह में और हमारी तकरीरों में।
इधर तीन सालों से उससे नजदीकियां बढ़ गयी थीं, अबूझ वजहों से। उसकी समझदारी बेहद तपी हुई थी, जो नम्रता की आंच पर पगी हुई थी, मगहिया गँवईपान के छौक के साथ। उसका ठेठ अंदाज मासूमियत से भरा होता था। मित्रता में ऐसी मासूमियत मिलती कहाँ है।

वह बेलौस था, बेलाग था, बेधड़क था। मित्रता में मस्ती उसका स्वाभाव था और रिश्तों को निभाने का बोध उसका संस्कार था। उसकी दुविधा भी मैंने देखी है, उस दुविधा की ज़मीन पर उपजी हुई वह लिहाज भी देखा है जब मित्रता के निर्वाह में वह करबद्ध होकर खुद को नाचीज मान लेता था।
लेकिन मित्रता की बैठकी उसका दुर्गुण था। व्यसन था जो बाद में व्याधि बना। उस व्याधि के गुनाहगार उसके हमराही वे लोग थे जिन लोगों ने उसकी ज़िन्दगी के आखिरी दिनों में उससे किनाराकशी कर ली। राहुल जिस रोग से लड़ रहा था, वह उसकी ज़िन्दगी की आखिरी लड़ाई थी। हम मित्रों में कुछ लोगों ने अपनी हिम्मत से आगे बढ़ कर उसे आर्थिक मदद की थी। कुछ गुप्त सहयोग मिला, सहपाठियों से। राहुल मुझे सब कुछ बताता था।
उसे कुछ मित्रों की बेरुखी का मलाल भी था। लेकिन जिंदगी और मौत के बफर जोन में मलाल भी दीर्घायु नहीं होती। वैसे जीव परम्परा में दीर्घायु शब्द मायने नहीं रखता। लेकिन इस सच्चाई को समझकर साहनुभूटी भरी थपकी कुछ क्षण के लिए मरते इंसान को ज़िन्दगी में ताल और राग जरूर भर देती है।
राहुल अपने बैच का एक ऐसा शरारती बच्चा था जिसे सभी चाहते थे। उसकी बीमारी में दी गयी आर्थिक मदद कोई घंटे में इकठ्ठा की गयी। मित्र की सलामती सबकी सदिच्छा थी। लेकिन एक जिद्दी रोग और निर्मोही मौत का साथ किसी को नहीं छोड़ती। राहुल इस बात को समझता था।
आज तुम्हारी याद में मन भर आया है। मुझे वह दृश्य भूलता नहीं, माँ की तेरहवी में उस हॉल में मेरे सगे संबंधियों, गोतिया से लेकर अपने गाँव के भाईयों के साथ बैठकर भोजन करता राहुल– आज उसी राहुल के श्राद्ध की तैयारी चल रही है। क्या इससे भी बड़ा कोई दुख होता है?
मृत्यु का सत्य कितना निर्विकार होता है—वह न रिश्तों की गर्माहट देखती है, न अधूरी इच्छाओं की थरथराहट। वह बस आकर जीवन के वाक्य पर अंतिम पूर्ण विराम लगा देती है। मनुष्य योजनाएँ बनाता है, स्मृतियाँ संजोता है, भविष्य के सपनों में घर बसाता है, पर मृत्यु उसे याद दिलाती है कि हम सब समय के उधार पर जी रहे हैं–मित्रता दरअसल रक्त से नहीं, संवेदना से बनता हुआ एक अदृश्य संबंध है।
कुछ लोग जीवन में देर से आते हैं, पर आत्मा में बहुत भीतर तक जगह बना लेते हैं। राहुल ऐसा ही मित्र था—जिसकी उपस्थिति साधारण दिनों को भी उत्सव बना देती थी। आज वही मित्र स्मृतियों में बदल गया है, पर स्मृतियाँ भी क्या कम जीवित होती हैं? वे सांस नहीं लेतीं, फिर भी हमारे भीतर धड़कती रहती हैं।
कहा जाता है कि मनुष्य मरता है, पर संबंध नहीं मरते। वे रूप बदल लेते हैं—सामने बैठकर हँसने से लेकर भीतर बैठकर रुलाने तक। शायद यही जीवन का शाश्वत द्वंद्व है—मिलन और वियोग का। और इसी द्वंद्व के बीच मित्रता अपनी सबसे सच्ची पहचान पाती है।
राहुल अब दृश्य में नहीं है, पर वह हमारी भाषा में रहेगा, हमारी बैठकों में रहेगा, हमारे किस्सों में रहेगा। कुछ लोग चले जाने के बाद भी समाप्त नहीं होते—वे हमारी चेतना का हिस्सा बन जाते हैं। और शायद यही मृत्यु पर मनुष्य की सबसे गहरी विजय है।


