एक प्रेस-कांफ्रेंस के आयोजन के बाद राहुल गांधी ट्रोल हो रहे हैं. दरअसल राहुल गांधी ने आज तक की महिला पत्रकार मौसमी सिंह के एक सवाल पर उन्हें बीजेपी वाली लाईन न बोलने की हिदायत दी. राहुल ने मौसमी का यह कहकर मखौल उड़ाया कि हमारी टी-शर्ट पहने लो, या फिर बीजेपी का बैज लगा लो. नीचे देखें राहुल के इस बयान पर कुछ प्रतिक्रियाएं और उसके बाद ‘पीसी’ का वीडियो…
राजदीप सरदेसाई-
यह देखकर बहुत निराशा हुई कि राहुल गांधी ने दावा किया है कि मौसमी सिंह ने ‘बीजेपी बैज/टी शर्ट’ सिर्फ इसलिए पहनी है क्योंकि उन्होंने उनसे बिल्कुल जायज सवाल पूछा था। मैं मौसमी सिंह को लंबे समय से जानता हूं और वह एक निडर पत्रकार हैं जो ईमानदारी के साथ रिपोर्ट करती हैं। नेताओं को उन पत्रकारों को निशाना बनाना बंद करना चाहिए जो केवल अपना काम कर रहे हैं। श्री गांधी किसी प्रश्न का उत्तर न देने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन प्रेस कॉन्फ्रेंस में पत्रकारों को ‘पार्टी एजेंट’ कहकर उन पर हमला करने का यह रवैया बंद होना चाहिए। हां, ऐसे कई लोग हैं जिन्होंने अपनी बुनियादी ईमानदारी को त्याग दिया है, हां विपक्ष के साथ अक्सर गलत व्यवहार किया गया है, लेकिन गुस्से में हर पत्रकार को कोसना बंद करें। जैसे ‘सब नेता’ चोर नहीं हैं, वैसे ही हर पत्रकार समझौता नहीं करता। और हमें आपके प्रमाणपत्रों की भी आवश्यकता नहीं है। मौसमी के साथ पूरी एकजुटता।
श्याम मीरा सिंह-
पत्रकारों के लिए सवाल पूछना मुश्किल हो चुका है। कोई नेता या पार्टी नहीं चाहते कि जिन पत्रकारों की “निस्पक्षता” की वे ख़ुद प्रशंसा करते हैं। वे पत्रकार भी उनसे सवाल न पूछ लें। सवालों का जवाब देना राजनीति का हिस्सा है। इतना सहनशील और सहज होना चाहिए कि आपको हर तरह के प्रश्न मिलेंगे।
स्वाति मिश्रा-
मौसमी सिंह के सवाल पर राहुल गांधी का ‘ये बीजेपी की लाइन है, उनके सिंबल वाली टीशर्ट पहन लो’ कह देना मुझे नहीं जंचा. आज ही कुछ घंटे पहले आज तक पर हिंदी और इंडिया टुडे पर इंग्लिश में मौसमी का एक आर्टिकल छपा है, जिसमें उन्होंने राहुल गांधी की मेहनत की काफी तारीफ की है. उस आर्टिकल को ट्वीट करते हुए मौसमी ने उसी आर्टिकल में से एक पैरा कोट किया, उसमें भी राहुल गांधी की तारीफ ही है. एक नेता को हर तरह के सवाल का जवाब देना आना चाहिए, बजाय पत्रकार को दूसरी पार्टी की लाइन का बता देने के. मौसमी लंबे समय से कांग्रेस कवर करती आई हैं और राहुल गांधी और उनके साथ बैठे नेताओं को इस बात की जानकारी होनी चाहिए थी कि वो अर्णब, सुधीर जैसों जैसी नहीं हैं. एक पत्रकार सवाल तो पूछेगा ही, पत्रकार को खारिज करने से पहले नेता को पता होना चाहिए कि वो सवाल पत्रकार की तरफ से आया है या पत्रकार रूपी प्रवक्ता की तरफ से.
अलीशान जाफरी-
राहुल इससे पहले बीबीसी के सलमान रावी साहब के साथ भी बदतमीजी कर चुके हैं। मीडिया ने उनके साथ बुरा किया है लेकिन हर कोई अमीश और अर्नब नहीं होता है।
आशुतोष मिश्रा-
क्या बुरा किया है मीडिया ने राहुल के साथ? अगर मान भी लें कि उनका पक्ष कम दिखाया तो उसे क्या कहेंगे जो मोदी के साथ दंगों के बाद होता था। इसी India Today ने बकायदा स्टोरी बना बनाकर और interview में भाग खड़े होने तक चुभने वाले सवाल किए थे। आज कसीदे पढ़ रहा है। राहुल को समझना चाहिए।
स्वप्निल पाटिल-
ये सवाल पसंद न आने पर नहीं बोला है बीजेपी की लाईन दोहराने पर ही इसे बीजेपी की लाईन कहा है। गोदी मिडिया को गोदी मिडिया कहने पर गुस्सा नहीं आना चाहिए। गुस्सा तो तब आना चाहिए जब गोदी मिडिया लोकतंत्र की हत्या कर रहा होता है।
डॉ विष्णु राजगड़िया-
इतने बड़े शेयर घोटाले में खुद मौसमी का संस्थान भी सह-अभियुक्त है। JPC जांच एक स्वस्थ संसदीय प्रक्रिया है। इसे जनता के पैसों की बर्बादी कहना मूर्खता है। बीजे की तरफ से सवाल पूछोगे, तो ऐसा ही ‘सम्मान’ मिलेगा।
निखिल राय-
क्या जवाब देते? कहते कि अच्छा हम जेपीसी की मांग नहीं करेंगे। क्यों नहीं जा कर बीजेपी से यही कहा कि जेपीसी की मांग मान लो नहीं तो संसद में हंगामा होगा और जनता का पैसा बरबाद होगा।
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