इंडिया टुडे के कॉनक्लेव का एक वीडियो क्लिप सोशल मीडिया पर वायरल है। राजदीप सरदेसाई ने सेशन के अंत में ट्रंप समर्थक लॉरा लूमर से कहा, “Your remarks are brazenly racist and Islamaphobic”। लूमर ने कमला हैरिस (भारतीय मूल), भारतीय इमिग्रेंट्स और H-1B वीजा पर टिप्पणियां कीं – जैसे भारतीयों को “third-world invaders” कहना और कमला पर “White House will smell like curry” वाली पुरानी वाली बात का जिक्र/डिफेंस। राजदीप ने इसे रेसिस्ट माना। लूमर ने पाकिस्तान पर टेररिज्म की भी आलोचना की थी। पूरे क्लिप में यही टेंशन दिख रहा है।
शीतल पी सिंह-
अमेरिकी दक्षिणपंथी राजनीति की दुनिया में चर्चित नाम Laura Loomer हाल के दिनों में एक बार फिर विवादों के केंद्र में हैं। वजह है भारतीय पत्रकार Rajdeep Sardesai के साथ उनका एक तीखा आमना-सामना, जिसकी वीडियो क्लिप सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है।
यह घटना उस मंच पर हुई जिसे India Today Conclave के नाम से जाना जाता है। यह कार्यक्रम भारत के बड़े मीडिया आयोजनों में गिना जाता है, जहाँ राजनीति, कूटनीति, मीडिया और वैश्विक मुद्दों पर चर्चा के लिए अंतरराष्ट्रीय वक्ताओं को बुलाया जाता है।
Laura Loomer को आमंत्रित किए जाने के पीछे शायद आयोजकों का उद्देश्य अमेरिकी दक्षिणपंथी राजनीति की आवाज़ को मंच देना रहा होगा क्योंकि इस समय भारत में भी दक्षिणपंथी ही सत्ता में हैं। और शायद इसलिए भी क्योंकि Loomer को अक्सर Donald Trump की समर्थक और उन्हीं के कट्टरपंथी विचारों के लिए जाना जाता है। लेकिन कार्यक्रम के दौरान जब उनसे उनके पुराने बयानों के बारे में सवाल पूछे गए—जिन्हें कई लोग भारतीयों के प्रति नस्लवादी और मुसलमानों के प्रति घृणास्पद मानते हैं—तो माहौल अचानक असहज हो गया।
यहीं पर राजदीप सरदेसाई का हस्तक्षेप महत्वपूर्ण बन जाता है। उन्होंने Loomer से सीधे सवाल किया कि यदि वे भारत आती हैं और यहाँ के मंचों पर बोलती हैं, तो क्या उन्हें भारतीय समाज और मुसलमानों के प्रति दिए गए अपने विवादित बयानों पर सफाई नहीं देनी चाहिए?
यह सवाल सीधा था, स्पष्ट था और पत्रकारिता के मूल दायित्व के अनुरूप था—सत्ता या सत्ता के इर्द-गिर्द के प्रभावशाली व्यक्तियों से जवाबदेही मांगना।
बताया जा रहा है कि इस सवाल के बाद Laura Loomer स्पष्ट और ठोस जवाब देने में असहज दिखीं। उन्होंने बात को घुमाने की कोशिश की, लेकिन सवाल का सीधा उत्तर देने से बचती रहीं। सोशल मीडिया पर कई लोगों ने टिप्पणी की कि जिस आत्मविश्वास से वे अक्सर इंटरनेट पर कठोर और आक्रामक बयान देती हैं, वही आत्मविश्वास इस सार्वजनिक मंच पर दिखाई नहीं दिया।
आज के दौर में सोशल मीडिया पर नफरत भरी भाषा बोलना आसान है, लेकिन जब उसी भाषा के बारे में सार्वजनिक मंच पर सवाल पूछे जाते हैं तो अक्सर उसके पीछे तर्क का अभाव दिखाई देता है।
इसलिए इस घटना को केवल एक वायरल वीडियो के रूप में नहीं, बल्कि पत्रकारिता की भूमिका के उदाहरण के रूप में भी देखा जाना चाहिए। जब दुनिया भर में मीडिया पर समझौता करने के आरोप लगते हैं, तब ऐसे क्षण याद दिलाते हैं कि पत्रकार का असली काम सत्ता का मंच सजाना नहीं, बल्कि सत्ता को असहज करते कठिन सवाल पूछना है।
और इस बार, वह कठिन सवाल एक सम्मानित भारतीय पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने पूरी स्पष्टता के साथ पूछा।



