रवीश रंजन शुक्ला-
करीब 20 साल बाद दैनिक जागरण के जालंधर दफ्तर जाना हुआ। बात 2002-03 की है, जब मैंने जालंधर में ट्रेनी के तौर पर फुल-टाइम नौकरी शुरू की थी। रोज दोपहर 12 बजे दफ्तर पहुंचकर गार्ड के रजिस्टर में हाजिरी लगाता और अंदर जाता। फिर दोआबा डेस्क पर सुरेंद्र यादव जी और भूपेंद्र कौर मैम के साथ फैक्स पर आई खबरों को एडिट करते-करते देर रात तक काम चलता। अखबार छपते-छपते रात के 12-1 बज जाते और फिर उन्हीं सुनसान रास्तों से होकर, एक नहर पार करते हुए, गुरु अमरदास नगर वाले कमरे तक लौटता था।
दो दशक से ज्यादा समय बीत गया, लेकिन जैसे ही जालंधर हाईवे से फोकल प्वाइंट की ओर दफ्तर के लिए मुड़ा, पुरानी यादें ताजा होने लगीं। रास्तों को ध्यान से देखता हुआ आगे बढ़ा। दफ्तर के बाहर पहुंचकर कुछ देर वहीं खड़ा रहा—मानो 20 साल पुरानी तस्वीरों को फिर से जोड़ने की कोशिश कर रहा हूं। वही ढाबा, वही गार्ड रूम, वही रास्ता, वही बिल्डिंग… आंखें सब कुछ पहचानने की कोशिश कर रही थीं। कदम खुद-ब-खुद उन जानी-पहचानी सीढ़ियों की ओर बढ़ गए।


पहला पड़ाव दूसरी मंजिल पर अपने पुराने दोस्त अरुणदीप से मुलाकात का रहा। जालंधर और फिर पटियाला में मेरा रूम पार्टनर और संघर्ष के दिनों का साथी। अब वह पंजाबी जागरण में फीचर एडिटर है। मुलाकात के बाद लंबी बातचीत हुई। फिर वह मुझे कुछ पुराने साथियों से मिलाने ले गया।
पंजाबी जागरण के संपादक खन्ना जी से मुलाकात हुई। याद आया कि पटियाला रिपोर्टिंग के लिए भेजे जाने से पहले उस समय के समाचार संपादक कमलेश रघुवंशी सर ने खन्ना जी से ही मेरे बारे में पूछा था—“क्या यह लड़का पंजाब में रिपोर्टिंग कर पाएगा?” उनसे मिलते ही वे पुराने पल फिर से जीवंत हो उठे।
यहीं दैनिक जागरण के संपादक हृदय नारायण मिश्रा सर से भी मुलाकात हुई। हृदय सर उस समय मेरे सीनियर हुआ करते थे। इन सभी लोगों ने मुझे एक पत्रकार बनते हुए देखा है। हालांकि अजय शर्मा सर से मुलाकात नहीं हो पाई, लेकिन उनसे मिलने का उत्साह अब भी बना हुआ है।
कुल मिलाकर, पंजाब की यह यात्रा खास रही। ऐसे सफर आपको भीतर से जिंदा रखते हैं। जिंदगी सिर्फ कामयाबी की दौड़ नहीं है, कभी-कभी ठहरना और पीछे मुड़कर देखना भी उतना ही जरूरी होता है।


