… तो अब क्यों बिलख रहे हो साहित्य के माननीयों ?

कई बार समान सोच वाले मित्रों से एक मसले पर बात हुई है और हम सभी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाए हैं। मसला यह कि तथाकथित मुख्यधारा के हिंदी मीडिया और हिंदी साहित्य का वर्तमान परिदृश्य- इन दोनों में अधिक पतित कौन है? यकीन मानिए, कई ‘महान बहसों’ के बाद भी हम इस प्रश्न का उत्तर नहीं खोज सके। 

तथाकथित मीडिया के पातित्य पर तो मैं कई बार लिख चुका हूं, आज ही हिंदी साहित्य के महानुभावों का एक कारनामा सामने आया है। बिहार में राजभाषा पुरस्कारों की घोषणा हुई है, इन पर विवाद हुए हैं और कई पुरस्कृत माननीयों ने इन्हें लेने से इंकार भी कर दिया है। वैसे, पुरस्कार हैं तो विवाद भी होगा ही….इसमें कोई नयी बात नहीं है। 

नयी बात इस बार यह है कि चयन समिति के अध्यक्ष बाबा नामवर ही पुरस्कृत नामों से अनभिज्ञता जता रहे हैं। चयन समिति के सदस्य अरुण कमल भी अपना पल्ला झाड़ ले रहे हैं। तीन लाख रुपए का शिखर सम्मान किन्हीं ‘अज्ञात’ साहित्यकार रामनिरंजन परिमेंदु को दिया गया है, जबकि जाबिर हुसैन और सच्चिदानंद सिन्हा वगैरह को 50 हजार में समेट लिया गया है। बता दें कि राजेंद्र बाबू के नाम का यह शिखर सम्मान कभी नागार्जुन और अमृत लाल नागर को भी मिल चुका है। 

ज़ाहिर तौर पर, खेमेबाजी तेज़ हो गयी है….तलवारें निकल चुकी हैं और प्रहार शुरू हो चुके हैं। हालांकि, हिंदी साहित्य का आखिरी सामंत साहित्य अकादमी के राष्ट्रीय सम्मेलन में हिस्सा लेने निकल चुका है, उसके तमाम चेले-चपाटे आपस में ही तलवारबाजी कर रहे हैं और कटने वाले सिरों की तलाश हो रही है। 

बहरहाल, इसपर बवाल काटने वाले तमाम माननीयों से भी मेरा मासूम प्रश्न है। क्या उनको तब यह दर्द नहीं हुआ था, जब हिंदी साहित्य को सामंतों के साम्राज्य की तरह कुछेक माननीय ने इस्तेमाल किया? क्या तब उन्हें तकलीफ हुई थी, जब जाति और क्षेत्र के नाम पर बांट कर साहित्य के सामंतों ने प्रतिभाहीन और चापलूस लोगों की फसल उगाई थी? क्या उन्हें तब भी दर्द हुआ था, जब चरण-चुंबन को कौशल का पर्याय बना दिया गया, जब नकल का अनुवाद मौलिकता कर दिया गया और जब प्रतिभा की कब्र पर जातिवाद की ज़हरीली फसल बोई गई थी…….

नहीं न। फिर, अब क्यों बिलख रहे हो, माननीयों। अच्छा हुआ…जो हुआ। जो हो रहा है, अच्छा हो रहा है और जो होगा, वह भी अच्छा होगा……

पुनश्चः आज के वाकयात पर हा हुसैन-हा हुसैन कर छाती पीटनेवाले और (सारा लोहा उनका वाले)भारी मात्रा में जनवादी कवि अरुण कमल जी वही हैं, जो किसी कार्यक्रम में जाने की सहमति दे देते हैं। फिर, जब गाड़ी के तौर पर इंडिका देखते हैं, तो उनकी तबीयत ख़राब हो जाती है। हालांकि, जनवादी हैं, इसलिए पहले से आयोजकों को अपनी कोई शर्त भी नहीं बताते। ऐसे जनवाद के बाद पुरस्कारों का यही हश्र हो रहा है, तो क्या दिक्कत है ….प्रभुओं….

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