चंद्र भूषण-
अंधेरा आया तो डेढ़ इंच नीचे चले गए? बीसवीं सदी का अंतिम दशक करीब आने के साथ तीन बड़े लेखकों की छवि में एक बुनियादी बदलाव आते देखा। शैलेश मटियानी, अमृता प्रीतम और निर्मल वर्मा। हिंदी साहित्य का मैं अच्छा तो क्या कामकाजी पाठक भी नहीं था। बौद्धिक दिलचस्पियां थीं लेकिन उनके क्षेत्र दूसरे थे। दर्शन, गणित, सारे प्राकृतिक विज्ञान, इतिहास, राजनीतिशास्त्र, अर्थशास्त्र, असामान्य और सामूहिक मनोविज्ञान वगैरह। अपनी भाषा की कविताएं, कहानियां और जब-तब कोई छोटा उपन्यास भी कहीं से लह जाने पर पढ़ लेता था लेकिन मन उधर ज्यादा टिकता नहीं था।
राजनीतिक कार्यकर्ता साहित्य पर बहस में कभी पीछे नहीं रहते लेकिन कुछेक अपवाद छोड़ दें तो ज्यादातर का हाल ऐसा ही होता है। ऊपर जिन लेखकों का नाम लिया, उनमें शैलेश मटियानी का घर इलाहाबाद में हमारे छात्र संगठन के कार्यालय के पास पड़ता था तो वहां मेरा कुछ आना-जाना था। कभी अपनी पत्रिका के चंदे के लिए। कभी यूं ही चाय-नाश्ते के जुगाड़ में। लेकिन ज्यादातर उनकी बातों के मजे के लिए। उनका एक छोटा उपन्यास ‘बर्फ गिर चुकने के बाद’ मुझे रद्दी में मिला और उनकी लिखित भाषा ने मुझे चुंबक की तरह खींच लिया। एक गरीब पहाड़ी लड़के की नजर से लिखी गई, मुंबई में उनके संघर्ष के दिनों से निकली उनकी कालजयी कहानियां मैंने बाद में पढ़ीं, जब मैं उनके दायरे से दूर जा चुका था।
दुर्भाग्यवश, मटियानी जी की बौद्धिकता से मेरा संपर्क ‘चौथी दुनिया’ में उनके लंबे-लंबे लेखों के जरिये हुआ, जिनसे बहसबाजी वाली नहीं, ढांचे के स्तर पर उग्र हिंदुत्व की विचारधारा टपकती थी। यह मामला कांग्रेस विरोध तक सीमित होता तो शायद मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। सामान्य संवेदना वाला कोई भी व्यक्ति उस दौर की कांग्रेस से या तो घृणा कर सकता था या उसके प्रति तटस्थता दिखा सकता था। लेकिन मटियानी जी वहां से बहुत आगे जा चुके थे। कोई इलाहाबादी मित्र मिलता तो कहता कि भाजपा की सरकार बन गई तो वे मोटा माल उठाएंगे।
व्यवहार में इसका उलटा देखने को मिला। देश में न सही, यूपी में कुछ समय के लिए भाजपा की सरकार बनी लेकिन मटियानी जी को बड़ी तकलीफ के साथ अपना जोड़ा हुआ काफी कुछ, यहां तक कि होश-चेत भी गंवाकर इलाहाबाद छोड़ना पड़ा। वे एक खुशमिजाज लेकिन ट्रैजिक कैरेक्टर थे। ट्रैजेडी ने कभी उनका साथ नहीं छोड़ा।
अमृता प्रीतम को मैंने तुलनात्मक रूप से ज्यादा पढ़ा था। कविताएं लगभग सारी और ‘रसीदी टिकट’ जो मुझे तो उपन्यास जैसा ही लगता था। होंगी वे पंजाबी की लेखिका लेकिन मेरे लिए हिंदी की ही थीं। आकर्षण और विकर्षण का स्तर यह था कि लेखकों में वे अकेली रहीं, जिनका नाम मेरी एक कविता के शीर्षक में आया। यह कविता, ‘एक और अमृता प्रीतम’ पीड़ा के महिमामंडन और पाठक से ज्यादा लेखक के भीतर उतरने वाले उसके नशे को अपने दिल के करीब रहे एक चरित्र की विडंबना की तरह प्रस्तुत करती है।
उन्हीं अमृता प्रीतम को मैंने 1990 के अंत में दिल्ली के बोट क्लब पर बंधे आरक्षण विरोधी मंच पर चौधरी देवीलाल के साथ आसीन देखा। इस सभा में उन्होंने बड़े जोश से एक भाषण भी दिया लेकिन वहां मौजूद श्रोता उग्र थे। लेखिका को सुनने का धीरज उनके पास नहीं था। भारत में प्रेम की देवी जैसी प्रतिष्ठा वाली इस कवयित्री को ऐसी क्या जल्दी पड़ी थी, मेरे मन ने कहा और उनसे हट गया।
तीसरे लेखक निर्मल वर्मा को उस समय तक मैंने ना के बराबर ही पढ़ा था। उनके द्वारा अनूदित किसी चेक लेखक का उपन्यास ‘रोमियो जूलियट और अंधेरा’ पढ़ते हुए अनुवाद लगा ही नहीं था। नाजियों से जान बचाने के लिए छिपी एक यहूदी लड़की और उसे बचाते हुए उसके प्रेम में पड़ गया एक चेक क्रिश्चियन लड़का। लड़की का उस संकोची लड़के से कहना कि देर-सबेर नाजी उसे पकड़ लेंगे और रेप करने के बाद मार भी डालेंगे। उसके पहले वह जीवन में एक बार प्रेम, संभोग और हो सके तो एक बच्चा भी कर लेना चाहती है!
निर्मल वर्मा के खुद के लिखे हुए एकाध उपन्यास भी मेरे हाथ लगे थे लेकिन दस-बीस पन्ने से ज्यादा गति नहीं बन पाई थी। पटना में अपने दोस्त राजीव की अतिशय प्रशंसा पर जो पहली रचना उनकी पढ़ी, वह थी हंस में छपी कहानी ‘सूखा’, जिसे पढ़ना खुद में एक अनुभव था।
पहली बार निर्मल वर्मा को सुनने का मौका मिला 1994 में, अपने ‘जनमत’ के दिनों में। दिल्ली हिंदी अकेडमी ने एक परिचर्चा कराई थी, ‘परंपरा और हस्तक्षेप’, जहां उनके अलावा दो और वक्ता थे। रामेश्वर मिश्र पंकज, जिनको अभी लोगबाग 2020 के दिल्ली दंगों से मशहूर हुए कपिल मिश्रा के पिताजी के रूप में जानते हैं, लेकिन उस दौर में पता नहीं कैसे हर दूसरी बातचीत में उनका जिक्र आ जाता था। और अभय कुमार दूबे जो तब जनसत्ता से जुड़े थे लेकिन पहचान वामपंथ की तरफ झुके एक राजनीतिक पत्रकार वाली थी।
गोष्ठी में तीनों वक्ताओं के पर्चे पढ़ दिए जाने के बाद पर्चों पर टिप्पणी करनी थी राजकिशोर को, जो नवभारत टाइम्स से जुड़े थे या थोड़ा ही पहले उससे सेवामुक्त हुए थे।
बड़ी अजीब बात है कि उस चर्चा में निर्मल जी और रामेश्वर पंकज की बातें कुछ इस तरह घुल-मिल गईं कि मेरे लिए दोनों में फर्क करना मुश्किल हो गया। निर्मल जी के यहां कुछ लंबे विदेशी उद्धरण थे और उनकी वक्तृता-शैली वही ‘सूखा’ कहानी के डॉ. देव जैसी थी- वक्तव्य के बीच में कई जगह देर तक ठहर जाना, जैसे कोई समस्या आ गई हो या बात ही खत्म हो गई हो। लेकिन कहानी की ही तरह यहां भी लोग धीरज से उनका इंतजार करते थे। बात उबाऊ नहीं थी तो श्रोताओं की तरफ से अधैर्य वाली कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखती थी।
उनके वक्तव्य का तत्व यह था कि परंपरा खुद ही अपनी धाराओं, उपधाराओं को जन्म देती है, साथ में अपने बदलाव की गुंजाइश भी बनाती है। हस्तक्षेप सिर्फ एक छलावा है, जिसके नाम पर आजकल अपनी तरफ जो कुछ भी किया जा रहा है, वह या तो पश्चिम की नकल है या सांस्कृतिक विध्वंस का बहाना।
परिचर्चा के इतने अमूर्त शीर्षक से ही जाहिर था कि हिंदी अकेडमी के सरबरा अपनी बंदूक लेखकों के कंधों पर रखकर चलाना चाहते थे। उद्देश्य इतना ही रहा होगा कि मंडल अनुशंसा और मंदिर मुहिम से बनी तुर्शी को विचारधाराओं के संवाद की तरफ ले जाया जाए और हो सके तो इसके जरिये छूटी हुई लिबरल पिच पर वापस लौटा जाए। इस अखाड़े में कुश्ती लड़ने का कुछ खास मायने नहीं निकलना था, लेकिन तीनों वक्ताओं की बात निपट जाने पर राजकिशोर ने अपनी टिप्पणी में कहा कि ‘हस्तक्षेप’ एक नया शब्द है और संभवतः पहली बार तीस के दशक में अज्ञेय की किसी रचना में आया है, फिर भी द्रौपदी के चीरहरण के समय कृष्ण ने जो किया और भीष्म ने जो नहीं किया, वह क्या था?
सभा विसर्जन के समय जिस बात को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा थी, वह थी कम्युनिस्टों को लेकर की गई पता नहीं पंकज की या निर्मल की यह टिप्पणी कि अभी वे गांधी की बात करते हैं लेकिन स्वतंत्रता आंदोलन में लगातार गांधी को गालियां देते थे और सुभाष को तोजो (द्वितीय विश्वयुद्ध के समय जापानी सैन्य शासक) का कुत्ता बताते थे। ध्यान आ रहा है कि शिक्षाविद कृष्ण कुमार ने बाहर निकलते हुए कहा था- ‘गाली देना गलत है और गोली मार देना ठीक है!’
इस गोष्ठी में जाने का फायदा यह हुआ कि निर्मल वर्मा का वैचारिक परिप्रेक्ष्य मेरी समझ में आ गया। इसके बाद मैंने उनकी लगभग सारी कहानियां और दो-तीन उपन्यास पढ़े लेकिन सबसे ज्यादा मनोयोग से उनके आलोचनात्मक निबंध पढ़कर दस-बारह पेज का एक लंबा लेख लिखा, जो अभय कुमार दूबे की दो-तीन साल चली पत्रिका (नाम अभी याद नहीं) में छपा। निर्मल की कहानियों में ‘डेढ़ इंच ऊपर’ मुझे सबसे अच्छी लगी, हालांकि वह पूरी तरह विदेशी माहौल की कहानी है और उसमें व्याप्त विषाद से खुद को जोड़ पाना शुरू में आसान नहीं होता।
नशे में डूबा लेकिन अपने पैरों पर खड़ा हो सकने वाला एक शराबी अपनी मृत पत्नी को याद कर रहा है। किसी नाजी विरोधी मोर्चे की सदस्य थी, पकड़ी गई, मौत से पहले टॉर्चर सहे, लेकिन पकड़े जाने से पहले उसे, यानी पति को उसके राजनीतिक पहलू के बारे में कुछ भी पता नहीं चला। गर्व की हल्की गंध के साथ जुड़ा हुआ पछतावा कि भरोसा क्यों नहीं किया। इस कहानी के बाद पिताजी और मां की मृत्यु के समय कुछ देर ‘कव्वे और काला पानी’ का साथ रहा। लेकिन अपनों से मुक्ति कौन चाहता है? वह भी ऐसे भुलावों और कर्मकांडों के बल पर, जो आघात कम होते ही उड़नछू हो जाते हैं!
कभी-कभी लगता है, निर्मल का साहित्य मैंने उनके राजनीतिक विचारों से परिचित होने के पहले पढ़ लिया होता तो अच्छा रहता। वक्त-जरूरत उनके जादू में खो जाने की गुंजाइश भी बनी रहती। लेकिन यह नहीं होना था। निर्मल जी की पत्नी, कवयित्री गगन गिल से सन 1998-99 में राजकमल प्रकाशन की अपनी नौकरी के दौरान लेखक के निजी, घरेलू पक्ष को लेकर एक-दो बातें हुई थीं और अभी, बीते 3 अप्रैल को इसी प्रकाशन के आयोजन ‘कृती निर्मल’ में उन्हें इस मौजूं पर बोलते सुना।
वे बताती हैं कि निर्मल वर्मा एक बच्चे की तरह सरल और तुनकमिजाज थे। 1996 या 1998 के आम चुनाव से पहले भाजपा को आजमाकर देखने का बयान उन्होंने तब दिया था जब खुद वोटर भी नहीं बने थे। गगन गिल की बात पर मुझे पूरा भरोसा है और निर्मल जी के जीवन की ज्ञात घटनाएं भी उनकी सरलता की पुष्टि करती हैं। लेकिन 2005 में अपने निधन से पहले 2002 के गुजरात दंगों के अखबारी ब्यौरे क्या उनतक न पहुंचे होंगे? ‘तुम अभी तक जिंदा हो जाफरी?’- जैसे बहुचर्चित शासकीय सवाल ने औरों की तरह क्या उन्हें भी हॉन्ट नहीं किया होगा?
‘रोमियो जूलियट और अंधेरा’ का अनुवादक, ‘डेढ़ इंच ऊपर’ का लेखक विधिवत योजना बनाकर कराए गए इस जनसंहार के पीछे घहरा रहे आकबत के अंधेरे को कुछ तो भांप सकता था। इसके खिलाफ खड़ी हो सकने वाली उसकी एक छोटी सी चीज भी मुझ जैसे उसके सामान्य पाठकों की नजर में उसे निर्दोष सिद्ध करने के लिए काफी थी। लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा गुजरात के अपने स्वयंसेवक मुख्यमंत्री को संबोधित ‘राजधर्म का पालन’ करने वाले बयान जैसी क्षणिक मानवीय संवेदना भी ‘बच्चे जैसे हृदय वाला’ यह लेखक तब अपने भीतर क्यों नहीं जुटा पाया?



Ashok Kumar
April 5, 2025 at 4:35 pm
Utter Nonsense