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आज के अखबार : सिन्दूर के नाम पर ‘युद्ध का खेल’ विदेश में प्रचार के लिए सर्वदलीय टीम से और खुला

संजय कुमार सिंह

तमाम कारणों से पहले दिन से स्पष्ट है कि ऑपरेशन सिन्दूर आतंकवाद खत्म करने के लिये नहीं, चुनावी लाभ के लिए है (था)। नरेन्द्र मोदी की सस्ती रणनीति, घटिया राजनीत के कारण हेडलाइन मैनेजमेंट के बावजूद आज जो खबर है वह यही कि रायता फैल जाने के बाद समेटने के लिए बनाई गई सर्वदलीय टीम में भी खेल चल रहा है। यह अलग बात है कि किसी को समझ में आया किसी को नहीं। हालांकि, यह भी संभव है कि समझ कर भी भोलू बने रहें वरना गुजरात समाचार के मालिक की तरह संपादक (या मालिक) को गिरफ्तार कर लिया जायेगा तो दूसरे अखबारों में खबर भी नहीं छपेगी और बीमार नहीं हुए तो जमानत भी नहीं मिलेगी। सरकार की चल गई या अपनी पर आई तो बुलडोजर न्याय भी हो सकता है। हालांकि, यह सब मेरा विषय नहीं है। मैं मुद्दे पर आता हूं। सोशल मीडिया पर विदेश मंत्री एस जयशंकर के एक बयान का वीडियो घूम रहा है और मैं उनमें से कुछ का शीर्षक पेश कर रहा हूं जो यूट्यूब पर हैं। हटा और हटवा दिये जाते हैं के बावजूद जो शीर्षक आज सुबह मुझे मिले वो हैं 1) बहुत बुरा फंसे मोदी विदेश मंत्री का सनसनीखेज वीडियो वायरल, मचा बवाल! 2) जयशंकर ने मोदी को बुरा फंसा दिया, कैमरे के सामने उगल दिया सारा सच … विदेश मंत्री का सनसनीखेज वीडियो वायरल। 3) ऑपरेशन सिंदूर को लेकर विदेश मंत्री एस. जयशंकर के बयान पर बवाल…राहुल गांधी ने उठाए सवाल…विदेश मंत्रालय बोला, तथ्यों को गलत तरीके से पेश कर रहे हैं राहुल।

यह खबर आज जयशंकर की फोटो के साथ होनी चाहिये थी भले शीर्षक अंतिम वाला होता। हालांकि, राहुल गांधी गलत बोल रहे होते या यह सवाल ही गलत होता तो इसे पहले पन्ने पर प्रमुखता से छापकर या वीडियो फैलाकर राहुल गांधी की साख खराब करने की कोशिश की जाती। पर इस बार ऐसा नहीं हुआ है। एस जयशंकर और उनके खंडन को गंभीर बनाने की कोशिश की गई है। राहुल गांधी का आरोप (पहले पन्ने से) गोल कर दिया गया है। मैं पहले भी लिख चुका हूं कि भारत में राज करने या सत्ता पाने के लिए आजादी के बाद से ही कोशिश में लगे संघ परिवार की सरकार बनी तो सुषमा स्वराज के बाद से विदेश नीति या विदेशी मामले भाजपा के किसी नेता या संघ के मार्गदर्शन में नहीं है। रिटायर नौकरशाह की राजनीति झेल रहा विदेश मंत्रालय अक्सर कमजोर और चूकता लगता है पर वह अलग मामला है। खबर नहीं छपने का कारण आप समझ गये होंगे। वीडियो आने के बाद आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह ने कहा, पहले ही ऑपरेशन सिंदूर की जानकारी देना भारत, भारतीय सेना और भारत माता के साथ गद्दारी है। यह कोई साधारण मामला नहीं है। मोदी सरकार को सामने आकर इसका जवाब देना चाहिए। राहुल गांधी ने एक्स पर पोस्ट करके भारत-पाकिस्तान के बीच सैन्य कार्रवाई को लेकर गंभीर आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि भारत ने ऑपरेशन सिंदूर शुरू करने से पहले पाकिस्तान को इसकी जानकारी दी, जो कि एक अपराध है। उन्होंने विदेश मंत्री एस. जयशंकर के उस कथित बयान का हवाला दिया, जिसमें उन्होंने स्वीकार किया कि भारत सरकार ने यह कदम उठाया था।

राहुल गांधी ने इस पोस्ट में दो सवाल उठाए गए। पहला यह कि इसकी इजाजत किसने दी? दूसरा यह कि इसके चलते भारतीय वायुसेना को कितने विमानों का नुकसान हुआ? 22 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में आतंकी हमला हुआ, जिसमें 26 लोग मारे गए थे। भारत ने इसके जवाब में 7 मई को ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान और पीओके में आतंकी ठिकानों पर हमले किए। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि भारत ने हमले से पहले पाकिस्तान को सूचित कर दिया था ताकि यह साफ हो कि हमले आतंकी ढांचों पर होंगे, न कि सैन्य ठिकानों पर। इसका मकसद युद्ध से बचना और अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन करना था। कहने की जरूरत नहीं है कि शुरू में यही हुआ था और प्रचारक अंग्रेजी-हिन्दी में दबे-छिप जो कहते रहे उसका मतलब यही था कि पाकिस्तान बात बढ़ा रहा है। चूंकि यही रणनीति थी, विदेश मंत्री को मालूम थी इसलिये बता दिया लेकिन राहुल गांधी के सवालों के बाद इसकी गंभीरता समझ में आई तो जो हुआ सो हुआ लेकिन खबर भी नहीं छपी है। हालांकि, जो सब हुआ उससे बिगड़ी छवि की डेंटिंग-पेंटिंग के लिए सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल विदेश भेजने की योजना की खबर कल ही छपी थी। लेकिन नीयत और रणनीति दोनों स्पष्ट नहीं है तो दोनों की ही पोल खुल गई। यह अलग बात है कि हिन्दी अखबारों में सरकार के समर्थन में ताली-थाली बज रही है।

नवोदय टाइम्स के टॉप बॉक्स का शीर्षक है, भारत दुनिया को आतंकवाद पर जीरो टॉलरेंस बतायेगा। सात सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल विदेश जायेंगे, तीन का नेतृत्व विपक्ष के नेता करेंगे। कहने की जरूरत नहीं है कि सरकार की सेवा में यह आदर्श खबर और आदर्श प्रस्तुति होगी। अमर उजाला में इस खबर का शीर्षक है, आतंक के खिलाफ टीम इंडिया में थरूर के नाम पर कांग्रेस को आपत्ति। उपशीर्षक है, पार्टी का दावा – हमने उनका नाम नहीं दिया थरूर बोले – बेहद सम्मानित महसूस कर रहा हूं। बहुत स्पष्ट है कि यह बांटों और राज करो का मामला लग रहा है। थरूर भाजपा की बोली बोल रहे हैं और अगर पार्टी की ओर से पार्टी की लाइन का प्रचार करने के लिए चुने जाने पर गर्व कर रहे हैं तो उनका कहना चाहिये कि देश में विपक्ष की राजनीति की जरूरत नहीं है और विपक्ष को सरकार के साथ मिलकर ऑपरेशन सिन्दूर चलाना चाहिये भले 26-28 हत्या का बदला लेने में उससे ज्यादा मारे गये। नुकसान का तो अंदाजा भी नहीं बताया जा रहा है और लोग पाकिस्तानी चैनलों से न जान जायें इसलिए उनपर प्रतिबंध लगा ही दिया गया था। सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल की जरूरत और उसके गठन को इस नजर से देखिये तो खेल खबर के बिना स्पष्ट हो जायेगा। अमर उजाला की खबर से बांटों और राज करो का आभास हो रहा है तो सरकार की नीति, उसकी कामयाबी, शशि थरूर के मामले में कांग्रेस की कमजोरी का भी पता चल रहा है। भाजपा की इसी राजनीति का विस्तार बताती है नवोदय टाइम्स की लीड। शीर्षक है, आप से अलग हुए 15 पार्षद, नई पार्टी बनाई। यह पार्टी तोड़ो अभियान का भाग हो सकता है और इससे शिवसेना नहीं बची तो आप बहुत नई पार्टी है। पर अलग मुद्दा है।  

ऐसे समय में आज अमर उजाला की ली़ड का शीर्षक है, पाकिस्तान के लिए जासूसी के आरोप में चर्चित यूट्यूबर समेत दो और गिरफ्तार। उपशीर्षक है, ज्योति मल्होत्रा तीन बार जा चुकी हैं पाकिस्तान, पाक उच्चायोग के निष्काषित कर्मचारी के संपर्क में थी। खबर पढ़ने से पहले ये दो शीर्षक जो बताते हैं कि उससे समझ में आता है कि अगर ऐसा था तो उसपर नजर रखी जा रही होगी। नहीं रखी जा रही थी तो संबंधित एजेंसियां क्या कर रही थीं और रखी जा रही थीं तो जासूसी करने क्यों दिया? संवेदनशील जानकारी देने क्यों दी। जाहिर है, ऐसा नहीं हुआ होगा और हुआ होगा तो एजेंसियां ज्यादा जिम्मेदार हैं देने वाला तो है ही। संभव है चुप रहने के बदले पैसे मिलते हों या आश्वासन हो लेकिन अभी जासूसी के आरोप में गिरफ्तार जैसी खबर को लीड बनाकर यह जरूर दिखाया जा रहा है कि सरकार काम कर रही है या बहुत सख्त है जबकि काम कर रही होती तो पहले ही गिरफ्तार किया जाना चाहिये था या जासूसी करने से रोक लिया जाना चाहिये था। खबर के अनुसार भारत की जासूसी करने और गोपनीय सूचनाएं पाकिस्तान पहुंचाने के आरोप में हरियाणा पुलिस ने चर्चित ट्रैवल ब्लॉगर ज्योति मल्होत्रा समेत दो और जासूसों को गिरफ्तार किया है। ज्योति तीन बार पाकिस्तान जा चुकी है। पुलिस के हत्थे चढ़ा दूसरा जासूस अरमान नूंह के नगीना क्षेत्र के राजाका गांव का रहने वाला है। इस मामले में पंजाब और हरियाणा से अब तक 4-4 आरोपी गिरफ्तार किए जा चुके हैं। पुलिस उप-अधीक्षक कमलजीत ने बताया कि हिसार की रहने वाली ज्योति ने भारतीय सैन्य ठिकानों से जुड़ी संवेदनशील जानकारी पाकिस्तान भेजी थी। पहलगाम हमले के बाद जासूसी के आरोप में भारत से निष्कासित पाकिस्तान उच्चायोग के कर्मचारी एहसान उर रहीम उर्फ दानिश के जरिये वह जासूसी नेटवर्क से जुड़ी थी। वह एक यूट्यूब चैनल चलाती है। अदालत ने उसे पांच दिन और अरमान को छह दिन के पुलिस रिमांड पर सौंप दिया। आज के समय में सूचना लेकर किसी को सौंपने की जरूरत नहीं के बराबर है। फिर भी गोपनीय सूचना किससे ली जाती थी और उसे तमाम आसान तकनीक की बजाय किसी को सौंपने की जरूरत पूरी कहानी को संदिग्ध बनाती है. खास कर तब जब पहलगाम का सैटेलाइट इमेज कई बार खरीदे जाने की खबर का ना खंडन हुआ है ना पुष्टि हुई है।   

इस आधार पर उपरोक्त निष्कर्ष निकालते हुए मैं निश्चित रूप से गलत हो सकता हूं लेकिन खबर देने वालों से ऐसे सवाल पूछे जा रहे होते, प्रधानमंत्री प्रेस कांफ्रेंस कर रहे होते या अधिकारी इन प्रश्नों का जवाब दे रहे होते तो मुझे यह आरोप लगाने का मौका नहीं मिलता ना इसकी जरूरत थी। हालांकि, तथ्य यह भी है कि किसी और ने इस खबर को लीड नहीं बनाया है। इंडियन एक्सप्रेस में तो खबर पहले पन्ने पर भी नहीं है। अंदर होने की सूचना है। आज के अंग्रेजी अखबारों में अमेरिका जाने वाली सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व शशि थरूर करेंगे –  को भाजपा सरकार की उपलब्धि के रूप में तो छापा ही गया है थरूर का हल्कापन भी दिखता है। दि एशियन एज ने सात कॉलम में दो लाइन के शीर्षक के साथ इस खबर को लीड बनाया है। हिन्दी में यह शीर्षक कुछ इस प्रकार होगा – भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ एक अहम राजनयिक हमला तैयार किया, थरूर का अमेरिकी टीम को लीड करना तय। इसके साथ की एक खबर में जयराम रमेश की तस्वीर है और उसका शीर्षक है, पाकिस्तानी प्रचार का खुलासा करने वाली टीम का नेतृत्व थरूर को मिला तो भाजपा कांग्रेस में टकराव। इस शीर्षक से लगता है कि सरकार ने शशि थरूर को इस काम के लिए चुना है और कांग्रेस इसका विरोध कर रही है। जाहिर है कि अगर ऐसा है तो पार्टी हित में थरूर का काम था कि वे इस टीम में शामिल नहीं होते या इसके लिए अपनी पार्टी को मनाते, नहीं मानने पर मना कर देते। जो भी हो, भाजपा सरकार तो थरूर पर डोरे डाल ही रही है। अखबारों का काम था कि इस खेल का खुलासा करते पर बहुत ही चतुराई से इसे छिपाकर भाजपा के पक्ष में माहौल बनाया गया है। भले यह शशि थरूर की राजनीतिक साख या धारा की कीमत पर हो और सब करके या झेलकर भी वे अगली बार अपने दम पर चुनाव जीत जायें। हालांकि, इससे यह साबित हो जायेगा कि उनकी राजनीतिक विचारधारा क्या है, और राहुल गांधी किससे लड़ रहे हैं।

द टेलीग्राफ में मुख्य शीर्षक शब्दों से खेलने वाला है और शीर्षक के तीनों शब्द अंग्रेजी के टी से हैं, थरूर थ्रस्ट ऑन टेरर। इसका एक मतलब यह भी होगा कि थरूर आतंकवाद पर थोपे गये पर ऐसा कहना या मानना ठीक नहीं है। जो सही है वह, आतंकवाद पर थरूर के जरिये जोर। इसका फ्लैग शीर्षक है, कूटनीतिक प्रयासों का नेतृत्व करने के लिए सरकार ने जिसे चुना उसे लेकर भाजपा-कांग्रेस में खींचतान शुरू। स्पष्ट है कि थरूर का चुना जाना सामान्य नहीं है लेकिन हिन्दी अखबारों के शीर्षक से इसका आभास नहीं के बराबर होता है। दूसरी ओर, ऑपरेशन सिन्दूर के नाम पर युद्ध छेड़कर सरकार ने जो गुड़ गोबर किया है उसकी भरपाई सरकारी खर्चे पर और उसके लिए सदस्यों के चुनाव में भी राजनीति की स्थिति अपने आप में मुश्किल है और छिप नहीं रही है यह एक संकट भी है। हिन्दुस्तान टाइम्स में भी यह खबर लीड है। अंदाज शीर्षक से समझिये – संदेश पहुंचाने के लिए सासंद चुने गये, थरूर की भूमिका से विवाद खड़ा हुआ। आप समझ सकते हैं कि जो मामला सरकार के खिलाफ है उसे थरूर के खिलाफ बना दिया गया। कहने की जरूरत नहीं है कि सर्वदलीय बैठक में भाग नहीं लेने और दूसरे दलों के प्रतिनिधि स्वयं चुन लेने का प्रधानमंत्री का दोनों निर्णय सही नहीं हो सकता है। फिर भी मीडिया ने ना उन्हें तब कोसा न अब कोस रहा है। यह है हिन्दुत्व का समर्थन। यह शिकायत पुरानी है कि मीडिया में दलित और अल्पसंख्यक नहीं के बराबर हैं। असर दिख रहा है।

द हिन्दू की आज की लीड सबसे अलग, ढाका ट्रिब्यून की लग रही है। शीर्षक है, भारत ने सभी जमीनी बंदरगाहों (सीमा) से बांग्लादेशी निर्यात को रोक दिया। यह खबर बड़ी होती तो और अखबारों में लीड होती। पर मेरे सात अखबारों में इतनी प्रमुखता से तो नहीं है। इसलिये इसकी जरूरत और प्रभाव का अनुमान मुझे नहीं है। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह सेकेंड लीड है। तब जब आज पहले पन्ने से पहले का अधपन्ना है और उसपर लीड का शीर्षक है, एनसीआर में आंधी से चार मरे। खबर के ऊपर गिरे हुए पेड़ की फोटो है जिसके नीचे कारें दबीं हुई हैं। द हिन्दू में लीड के साथ सिंगल कॉलम की एक खबर का शीर्षक है, दुनिया सेना की क्षमता, प्रधानमंत्री के संकल्प की तारीफ कर रही है। यह खबर आज द हिन्दू में फोल्ड से नीचे है और शीर्षक है, सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल के लिए सदस्यों के नाम देने से राजनीतिक विवाद शुरू हो गया। द हिन्दू के लीड, सिंगल कॉलम की खबर और सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल वाली खबर की प्रस्तुति पर एस गुरूमूर्ति के ट्वीट और मालिनी पार्थसारथी की  स्वीकारोक्ति का असर हो तो मैं नहीं कह सकता। हालांकि, इसका कारण तो है ही। बोफर्स के जमाने में मैं इंडियन एक्सप्रेस के हिन्दी अखबार जनसत्ता में नौकरी करता था और तब बोफर्स के कई खुलासे द हिन्दू में छपते थे। उस समय माना जाता था कि एक्सप्रेस चूंकि बोफर्स सौदे के खिलाफ लिख ही रहा था तो द हिन्दू में खबर छपने का अलग प्रभाव होगा और खास मकसद से द हिन्दू को लीड की जाती थी। यह बात सही न भी हो तो तथ्य है। आज की स्थिति देखिये।

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