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उत्तर प्रदेश

कभी सूचनाओं के लिए संघर्ष कर चुके नदीम सूचना आयुक्त की कुर्सी पाते ही सत्ता के भोंपू बन गए क्या?

मनीष दुबे-

त्तर प्रदेश के राज्य सूचना आयुक्त मोहम्मद नदीम का हालिया बयान कि- 84 आरटीआई कार्यकर्ता “ब्लैकमेलर” हैं, लोकतंत्र के लिए एक खतरनाक चेतावनी जैसा है। एक समय खुद पत्रकार रह चुके नदीम आज जब सत्ता की कुर्सी पर बैठे हैं, तो वही सूचनाधिकार की लड़ाई लड़ने वालों को अपराधी की तरह देखने लगे हैं। सवाल उठता है: क्या यह व्यक्तिगत अहंकार है या सत्ता संरक्षित एजेंडा?

आरटीआई कार्यकर्ता लोकतंत्र के वे सिपाही हैं, जो अंधेरे में छिपी भ्रष्टाचार की दीमकों को उजागर करते हैं। सत्ता का नैतिक दायित्व है कि वह इन्हें संरक्षण दे, सम्मान दे। लेकिन जब राज्य का सूचना आयुक्त ही इन्हें बदनाम करने पर उतर आए तो इसे केवल एक व्यक्ति की भूल नहीं कहा जा सकता, यह एक गहरी साजिश का हिस्सा नजर आता है — सूचना को दबाने, असहज सवालों को मिटाने और जवाबदेही से बचने की साजिश।

नदीम का यह बयान महज एक ‘फिसलन’ नहीं है, बल्कि सत्ता की उस मनोदशा का आईना है, जो सूचना के अधिकार को बोझ की तरह देखती है। यह वही प्रवृत्ति है जिसमें पारदर्शिता को खतरा, और सवाल पूछने वालों को ‘गुनहगार’ समझा जाता है। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में, जहां प्रशासनिक भ्रष्टाचार और जवाबदेही पर पहले ही सवाल उठते रहे हैं, वहाँ सूचना आयुक्त का इस तरह खुलकर आरटीआई कार्यकर्ताओं को बदनाम करना लोकतंत्र पर सीधा हमला है।

और यह पहली बार नहीं है जब नदीम सवालों के घेरे में आए हैं। हाल में लखनऊ में एक सुनवाई के दौरान एक अपीलकर्ता ने उन पर जूता फेंका और जान से मारने की धमकी दी। यह घटना निंदनीय भले हो, मगर यह भी बताती है कि जन असंतोष किस हद तक बढ़ चुका है। जब न्याय दिलाने वाली संस्था पर से भरोसा उठने लगे, तो फिर जनता का गुस्सा फूटना तय है।

मोहम्मद नदीम का बयान उस सोच का प्रतीक है, जो आरटीआई को न केवल कमजोर करना चाहती है, बल्कि उसे एक अपराध जैसा पेश करना चाहती है। सत्ता की नजर में अब सूचना मांगना अपराध है, और सवाल पूछना ब्लैकमेलिंग!

नदीम का यह रुख उनके पत्रकारिता के दिनों से बिल्कुल विपरीत प्रतीत होता है, जब वे खुद सूचनाओं के लिए संघर्ष करते थे। अब, सूचना आयुक्त के रूप में, उनका RTI कार्यकर्ताओं को “ब्लैकमेलर” कहना न केवल उनके पूर्व के आदर्शों के खिलाफ है, बल्कि यह सूचना के अधिकार को कमजोर करने की दिशा में एक कदम माना जा सकता है।

अगर मोहम्मद नदीम वाकई पत्रकारिता की आत्मा से जुड़े होते, तो उन्हें पता होता कि सूचनाएं मांगना, सच खोजना और सवाल उठाना ही लोकतंत्र की असली ऑक्सीजन है। लेकिन कुर्सी पर बैठते ही जब संवैधानिक पदाधिकारी सत्ता के भोंपू बन जाएं, तो यह लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है।

इस विवाद ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सूचना आयुक्तों की निष्पक्षता और पारदर्शिता बनाए रखना कितना महत्वपूर्ण है। यदि वे सत्ता के दबाव में आकर कार्य करेंगे, तो यह सूचना के अधिकार और लोकतंत्र के लिए खतरा बन सकता है।

इस मामले में मोहम्मद नदीम की भूमिका और उनके बयान की गंभीरता को देखते हुए, यह आवश्यक है कि इस पर उच्च स्तर पर जांच हो और सुनिश्चित किया जाए कि सूचना आयोग का कार्य निष्पक्ष और पारदर्शी बना रहे।

यह समय है जब समाज को, मीडिया को, और खुद ईमानदार अफसरों को खड़े होकर सवाल करना चाहिए: क्या उत्तर प्रदेश का सूचना आयोग सत्ता का मुखबिर बन चुका है? क्या आरटीआई कार्यकर्ताओं को चुप कराने की सुनियोजित साजिश चल रही है? अगर हाँ, तो यह लड़ाई सिर्फ कार्यकर्ताओं की नहीं, हर जागरूक नागरिक की भी है।

सूचना का अधिकार किसी की कृपा नहीं है। यह जनता का संवैधानिक हक है। और इस हक पर हमला किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए।

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