
संजय कुमार सिंह
अमर उजाला की आज की लीड बहुत महत्वपूर्ण है और मेरे आठ अखबारों में किसी अन्य में पहले पन्ने पर भी नहीं है। खबर का शीर्षक है, “तमिलनाडु के दस विधेयकों पर राष्ट्रपति की कार्रवाई भी गैरकानूनी : सुप्रीम कोर्ट”। खबर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि तमिलनाडु के राज्यपाल की ओर से भेजे गए 10 विधेयकों पर राष्ट्रपति ने अगर कोई कार्रवाई की है, तो वह भी गैरकानूनी है। शीर्ष कोर्ट ने स्पष्ट कहा है, अगर किसी विधेयक को राज्य विधानसभा की ओर से दोबारा पास किया जाता है, तो राज्यपाल उसे राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए सुरक्षित नहीं रख सकते हैं। हालांकि, केरल के राज्यपाल राजेन्द्र अरलेकर ने राज्यपालों के लिए समय सीमा निर्धारित किये जाने को न्यायिक अतिरेक कहा है। यह खबर हिन्दुस्तान टाइम्स में यह पहले पन्ने पर तीन कॉलम में है। अगर राज्यपाल को सही भी मान लिया जाये तो मुद्दा यह है कि सरकारी और पुलिसिया अतिरेक पर कौन बोलेगा और राज्यपाल सिर्फ इस पर क्यों बोल रहे हैं। खासकर तब जब मीडिया अपना काम कायदे से नहीं कर रहा है और सरकारी तथा पुलिसिया अतिरेक का विरोध करना उसी का काम है। केरल के राज्यपाल ने हिन्दुस्तान टाइम्स से मुलाकात में यह बात कही है। दि एशियन एज़ की एक खबर के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है कि विपक्ष सत्ता के लिये परिवार की राजनीति को बढ़ावा दे रहा है। दूसरी ओर, जो सत्ता में है वह अपने खिलाफ कुछ छपने नहीं दे रहा है। पर यह खबर नहीं है।
तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि मामले में जस्टिस जेपी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ की ओर से आठ अप्रैल को सुनाए फैसले को सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर चौथे दिन यानी शुक्रवार रात 10:54 बजे अपलोड किया गया। संविधान के अनुच्छेद 200 की व्याख्या करते हुए पीठ ने कहा, जब किसी विधेयक को विधानसभा की ओर से दोबारा पास कर दिया गया हो तो राज्यपाल उसे (किसी विधेयक को) राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए सुरक्षित नहीं रख सकते हैं भले ही राज्यपाल ने पहले चरण में अपनी स्वीकृति रोक ली थी। 415 पेज के अपने फैसले में पीठ ने स्पष्ट कहा है, राज्यपाल डॉ. रवि का 10 विधेयकों को रोकने का फैसला अवैध था। राष्ट्रपति की ओर से 10 विधेयकों के संबंध में उठाए गए कदम भी कानून के मुताबिक वैध नहीं हैं। पीठ ने कहा, जब ये 10 विधेयक विधानसभा से पास होने के बाद दूसरी बार राज्यपाल के समक्ष पेश किए गए, तो इन विधेयकों को राज्यपाल से स्वीकृत माना जाए। शीर्ष अदालत ने अपनी रजिस्ट्री को इस फैसले की प्रति सभी हाईकोर्ट और सभी राज्यों के राज्यपालों के प्रधान सचिव को भेजने के निर्देश दिए।
उत्तर-दक्षिण की भिड़ंत में केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री का विरोध करने में मुख्य भूमिक निभा रहे तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के रुख के बाद राज्यपाल के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के फैसले और उनके मार्फत सभी राज्यपालों के हाथ बांध दिये जाने के बाद आज की दूसरी बड़ी खबर तमिलनाडु में भाजपा की चुनावी तैयारी है। इसके तहत भाजपा ने एआईएडीएमके के साथ करार किया है। आज यह खबर मेरे आठ अखबारों में एक, द हिन्दू में लीड है। अमर उजाला ने इसे चार कॉलम का बॉटम बनाया है। गैर हिन्दी भाषी, दक्षिण भारतीय राज्य में भाजपा की इस उपलब्धि की खबर आज हिन्दी के मेरे दूसरे अखबार, नवोदय टाइम्स में भी पहले पन्ने पर है जबकि विज्ञापन की अधिकता के कारण आज यहां पहले पन्ने पर दो ही खबर है। लीड का शीर्षक है, राणा से 26/11 का राज उगलवायेगी एनाईए। भाजपा की खबर दूसरी है, तमिलनाडु चुनाव के लिए भाजपा ने अन्नाद्रमुक से हाथ मिलाया।
तथ्य है कि जयललिता की मौत के कुछ दिन बाद ही एआईएडीएमक के दो हिस्से हो गए थे। एक धड़े का नेतृत्व ओ पनीरसेलवम कर रहे थे जो शुरुआत में मुख्यमंत्री भी बने जबकि शशिकला के नेतृत्व वाले दूसरे धड़े ने ईडापड्डी के पलानीस्वामी को मुख्यमंत्री बनाया। एक छोटे लेकिन नाटकीय घटनाक्रम के बाद पलानीस्वामी सीएम बने थे। आज अमर उजाला की खबर का उपशीर्षक है, पलानीस्वामी के साथ बैठक के बाद (अमित) शाह ने किया गठबंधन का एलान…. अन्नामलाई की जगह नागेन्द्रन प्रदेश अध्यक्ष। अखबार ने मोदी का यह दावा भी छापा है, डीएमके को सत्ता से उखाड़ फेंकेगा एनडीए : मोदी। दूसरी खबर है गुरुमूर्ति से मुलाकात अहम। मुझे याद है, कांग्रेस के शासन में जब अरुण शौरी इंडियन एक्सप्रेस के संपादक होते थे तो भ्रष्टाचार के खिलाफ गुरुमूर्ति के खुलासे इंडियन एक्सप्रेस में छपा करते थे। उल्लेखनीय है कि सितंबर 2014 में निचली अदालत ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अपराधों के लिए जयललिता को दोषी ठहराया था और उन्हें चार साल का कारावास तथा 100 करोड़ रुपये का जुर्माना भरने की सजा सुनाई थी। कर्नाटक हाई कोर्ट ने भी 2015 में दोषसिद्धि को खारिज कर दिया और उन्हें बरी कर दिया। हाल में खबर थी कि तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जे जयललिता की भतीजी ने जयललिता के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति मामले में जब्त की गई संपत्ति वापस पाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। जे दीपा ने जयललिता की संपत्ति उन्हें वापस देने से इनकार करने वाले कर्नाटक हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए विशेष अनुमति याचिका दायर की है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि दिसंबर 2016 में जयललिता की मृत्यु के बाद उनके खिलाफ आपराधिक मामला समाप्त हो गया, इसलिए कार्यवाही के दौरान जब्त की गई उनकी संपत्ति वापस की जानी चाहिए।
तमिलनाडु के राज्यपाल से संबंधित सुप्रीम कोर्ट की खबर के अनुसार, अनुच्छेद 200 में राज्यपाल के पास सिर्फ तीन विकल्प हैं। पीठ ने कहा है, विधानसभा से पास होने के बाद विधेयक राज्यपाल के समक्ष पेश किए जाएं तो राज्यपाल के पास अनुच्छेद 200 के तहत तीन विकल्प होंगे। पहला इसे स्वीकृति दें। दूसरा स्वीकृति रोकें और तीसरा राष्ट्रपति के विचार के लिए विधेयक को सुरक्षित रख लें। पीठ ने कहा कि जहां राज्यपाल किसी विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रखते हैं और राष्ट्रपति उस पर अपनी सहमति नहीं देते, वहां राज्य सरकार को शीर्ष अदालत में जाने का अधिकार होगा। जब राष्ट्रपति अनुच्छेद 201 के तहत स्वीकृति के लिए उनके समक्ष किसी विधेयक पर निर्धारित समय सीमा के भीतर निर्णय नहीं लेते, तो भी राज्य सरकार को सुप्रीम कोर्ट से परमादेश रिट की मांग करने का अधिकार होगा। यही नहीं, विधेयक दोबारा पास हुआ तो मंजूरी एक माह में देनी होगी। अनुच्छेद 200 में राज्यपाल के लिए समय सीमा निर्धारित नहीं है, लेकिन कहा गया है कि वह जितनी जल्द हो सके फैसला लेंगे। विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ रखे जाने की स्थिति में, राज्यपाल से अपेक्षा की जाती है कि वह अधिकतम एक महीने में सहमति देंगे। मंजूरी नहीं देने पर संदेश के साथ अधिकतम तीन माह के भीतर उसे वापस करना होगा। विधानमंडल विधेयक दोबारा पास कर भेजता है तो राज्यपाल को एक माह में स्वीकृति देनी होगी।
कोर्ट ने संविधान के तहत राष्ट्रपति को प्राप्त शक्तियों के प्रयोग की भी व्याख्या की है। शीर्ष अदालत ने फैसले में संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल को मिली शक्तियों और अनुच्छेद 201 के तहत राष्ट्रपति को प्राप्त शक्तियों के प्रयोग की न्यायिक समीक्षा भी की। पीठ ने कहा, जहां राज्यपाल मंत्री परिषद की सलाह के विपरीत किसी विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ अपने विवेकानुसार सुरक्षित रखते हैं, वहां राज्य सरकार ऐसी कार्रवाई को हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे सकती है। पीठ ने कहा कि अनुच्छेद 201 के अनुसार, राष्ट्रपति के पास भी किसी विधेयक को मंजूरी के लिए असीमित समय तक रोकने का अधिकार नहीं है। राष्ट्रपति या तो स्वीकृति देंगे या रोकेंगे। अगर राष्ट्रपति विधेयक की स्वीकृति को रोकते हैं तो इसके कारण भी स्पष्ट करने होंगे। पीठ ने कहा, हम यह नहीं कह सकते कि राष्ट्रपति को अनुच्छेद 201 के प्रावधान का प्रयोग न करने और राज्य विधानमंडल को अनुमति न देने के कारणों की जानकारी न देने की अनुमति होगी, क्योंकि ऐसा करने से अनुच्छेद 200 में प्रावधान का समावेश हो जाएगा। पीठ ने कहा, जहां किसी कानून के तहत कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं है, वहां भी उसे उचित समय के भीतर प्रयोग किया जाना चाहिए। स्पष्ट है कि निर्वाचित सरकार के अधिकार राज्यपाल के जरिये नियंत्रित नहीं किये जा सकते हैं और इसमें राष्ट्रपति की भी भूमिका नहीं है।
इस लिहाज से मौजूदा समय में यह बड़ी खबर है लेकिन दूसरे अखबार आज भी आतंकी राणा से पूछताछ और उसके खिलाफ कार्रवाई की खबर से सरकार को आतंकवाद के खिलाफ सख्त दिखाने की कोशिश और प्रचार कर रहे हैं। मैं कल यहां बता चुका हूं कि वारदात के समय की सरकार ने ठीक से काम नहीं किया होता तो राणा का प्रत्यर्पण मुश्किल था और इस लिहाज से सरकार को बताना चाहिये और अखबारों को पूछना चाहिये कि पुलवामा (और दूसरे) मामलों में उसने क्या किया है। अभी स्थिति यह है कि सरकार चाहती है कि राणा के बयान से पाकिस्तान को लपेटा जा सके लेकिन उसके बाद की वारदात (जो पाकिस्तानी साजिश हो सकती है) की जांच नहीं करा रही है या उसपर मुंह सिले हुए है। इससे पुलवामा को लेकर आशंकाएं गंभीर होती हैं, खासकर उस समय के राज्यपाल के बयानों के कारण। लेकिन सरकार को चिन्ता नहीं है क्योंकि मीडिया ने इसे कभी मुद्दा बनाया ही नहीं और अब श्रेय देने में लगा है। द टेलीग्राफ में भी यह खबर सेकेंड लीड है। हालांकि, यहां याद दिलाया गया है कि अजमल कसाब जब हिरासत में था तब उसे बिरयानी खिलाने की खबर फैलाई गई थी और उसका मकसद बाद में पता चला। नतीजा हम जानते हैं कि उस समय के सरकारी वकील उज्ज्वल निकम भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ चुके हैं। भले हार गये। खबर के अनुसार, तहव्वुर हुसैन राणा अजमल कसाब से बेहतर स्थिति में है क्योंकि उसे आठ मंजिल की जिस एनआईए बिल्डिंग स्थिल भूतल के लॉकअप में रखा गया है वह सेंट्रली एसी है और एनआईए के एक अधिकारी ने संकेत दिया कि वह भोजन के मामले में भी कसाब से भाग्यशाली हो सकता है। अखबार ने इस अधिकारी के हवाले से लिखा है कि आमतौर पर आरोपियों को दाल, रोटी और सब्जी परोसी जाती है लेकिन अपवाद स्वरूप कुछ आरोपियों के भोजन और पसंद का ख्याल रखा जाता है। हमें उससे सच कबूलवाना होता है इसलिए खुश और अच्छी स्थिति में रखने की जरूरत होती है। खबर में बताया गया है और यही शीर्षक है कि जांच के सिलसिले में उसे घटनास्थल यानी होटल ताज ले जाया जा सकता है। अधिकारी ने यह नहीं बताया कि राणा को उसकी पसंद का भोजन पहले से ही तो नहीं मिल रहा है।
इसके अलावा आज यह खबर टाइम्स ऑफ इंडिया, हिन्दुस्तान टाइम्स, दि एशियन एज और नवोदय टाइम्स में भी लीड है। इंडियन एक्सप्रेस, द हिन्दू और द टेलीग्राफ की लीड अलग है। इंडियन एक्सप्रेस में राणा से पूछताछ की खबर पांच कॉलम में है जबकि लीड सिर्फ दो कॉलम में और वह है, अमेरिकी टैरिफ स्थगित रहने की अवधि में भारत अमेरिका से अंतरिम व्यापार करार करने का उत्सुक है। द हिन्दू में राणा से पूछताछ शुरू होने की खबर सिंगल कॉलम में है। टेलीग्राफ की लीड सुप्रीम कोर्ट के आदेश से बेरोजगार और बर्खास्त शिक्षकों की खबर है। पूछताछ शुरू जैसे रूटीन शीर्षक से हटकर टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड का शीर्षक है, राणा को बेहद सुरक्षित एनआईए के मुख्यालय स्थित सेल में रखा गया है और उसपर नजर रखी जा रही है ताकि आत्महत्या न कर सके। हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड का शीर्षक है, राणा को दोषी साबित करने के लिए एनआईए ने कई रहस्यमयी गवाह उतारे।



