नई दिल्ली। देश की प्रमुख न्यूज़ एजेंसी United News of India (यूएनआई) के कथित ‘रिवाइवल’ को लेकर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं। कर्मचारियों और पूर्व कर्मचारियों के एक वर्ग का आरोप है कि एजेंसी को पुनर्जीवित करने की बात गलत साबित हो रही है और यह पूरा मामला दरअसल संस्थान की जमीनों पर कब्जा करने की साजिश हो सकता है।
आरोप लगाने वालों का कहना है कि यदि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए तो यह सामने आ सकता है कि सरकारी या सार्वजनिक जमीनों का सीधा सौदा संभव नहीं होता, लेकिन National Company Law Tribunal (NCLT) की प्रक्रिया के जरिए इसे आसान बना दिया गया।
कर्मचारियों का दावा है कि दिल्ली स्थित यूएनआई की जमीन से जुड़ा मामला अदालत में विचाराधीन है। इसके बावजूद वहां कथित तौर पर निर्माण और कब्जे की स्थिति बन गई, क्योंकि अदालत में दूसरा पक्ष प्रभावी ढंग से अपनी बात रखने वाला कोई नहीं है।
आरोप यह भी है कि दिल्ली के अलावा कई राज्यों में यूएनआई से जुड़ी जमीनें स्थानीय निकायों के अधीन हैं, जिन्हें किसी अदालत द्वारा सीधे किसी अन्य पक्ष को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता। नियमों के मुताबिक ऐसी जमीनों का हस्तांतरण स्थानीय निकायों के माध्यम से ही संभव है। कर्मचारियों का कहना है कि यदि वे इस मामले में अदालत में पक्षकार बनें तो इन सौदों पर सवाल खड़े किए जा सकते हैं।
इसी तरह बेंगलुरु में भी कर्मचारियों के अदालत में पक्षकार बनने की संभावना जताई जा रही है। आरोप लगाने वालों का कहना है कि यदि यूएनआई के अधिग्रहण और तथाकथित रिवाइवल की पूरी प्रक्रिया की जांच हो जाए तो कई तथ्यों का खुलासा हो सकता है।
कर्मचारियों के एक वर्ग का यह भी आरोप है कि एजेंसी को जिस तरीके से संभाला गया, उसमें पारदर्शिता की कमी रही। उनका कहना है कि कंपनी के संचालन में मैनेजमेंट से ज्यादा यूनियनों की भूमिका दिखाई दे रही है और जिन लोगों पर एजेंसी को नुकसान पहुंचाने के आरोप लगते रहे, उन्हें ही फिर से जिम्मेदारी दे दी गई।
उनका दावा है कि यूएनआई के पुनरुद्धार के लिए न तो कोई स्पष्ट विजन दिखाई देता है और न ही पर्याप्त वित्तीय संसाधन। इस पूरे प्रकरण को वे जमीनों के लेन-देन से जुड़ा मामला बता रहे हैं और इसकी विस्तृत जांच की मांग कर रहे हैं।
कर्मचारियों का यह भी कहना है कि NCLT के फैसले पर आपत्ति न जताने की बात कही गई, लेकिन इस संबंध में कर्मचारियों से सार्वजनिक रूप से राय कब और कैसे ली गई, इसका कोई स्पष्ट रिकॉर्ड सामने नहीं है। इससे यह आशंका भी जताई जा रही है कि कई निर्णय कर्मचारियों को अंधेरे में रखकर लिए गए।
यूएनआई से जुड़े कई पूर्व कर्मचारी इस स्थिति पर चिंता जता रहे हैं और उनका कहना है कि एजेंसी के भविष्य को लेकर व्यापक और पारदर्शी चर्चा जरूरी है। हालांकि फिलहाल इन आरोपों पर प्रबंधन की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
एक कर्मचारी द्वारा भड़ास को भेजे गए मेल पर आधारित



