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आज के अखबार : विजयोत्सव की चाहत, हंगामेदार सत्र, राहुल के आरोप और अदृश्य रीढ़ सब थोड़ा-थोड़ा है

संजय कुमार सिंह

उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के इस्तीफे को हेडलाइन मैनेजमेंट का हिस्सा माना जाये तो आज कई खबरें दब गई हैं। इनमें संसद के मानसून सत्र को विजयोत्सव मानने की चाहत (नवोदय टाइम्स) शामिल है। कहा जा सकता है कि यह ठीक ही हुआ और नई कहानियों के जरिये सत्ता में बने रहने की कोशिश की पोल खुलनी ही चाहिये। लेकिन जो दो महत्वपूर्ण खबरें पिट गईं और अचानक इस्तीफा नहीं हुआ होता तो सरकार के भूत-भविष्य से जुड़ी ये खबरें हेडलाइन मैनेजमेंट से ऊपर की चीज हैं। इनमें एक ईडी पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी, राजनीतिक लड़ाइयों के लिये उपयोग किया जा रहा है (द टेलीग्राफ) और चुनाव आयोग का यह कहना कि मतदाता सूची में नाम न होने से किसी व्यक्ति की नागरिकता खत्म नहीं हो जायेगी (इंडियन एक्सप्रेस) शामिल है। ये दोनों ऐसे मामले हैं जो देश की राजनीति को प्रभावित तो कर रहे हैं पर किसी का ध्यान नहीं है। खासकर मीडिया का जो सरकार के इशारे पर देशभक्ति का झंडा उठा लेता है पर इस बात की चिन्ता नहीं करता है कि देश में लोकतंत्र का क्या हो रहा है। राहुल गांधी ने कहा है कि विपक्ष को ससंद में बोले का अधिकार नहीं है (देशबन्धु) पर यह ज्यादातर अखबारों के लिए पहले पन्ने की खबर नहीं है। नागरिकता और मतदाता से संबंधित हिन्दुस्तान टाइम्स की एक खबर का शीर्षक है, चुनाव आयोग ने बिहार के एसआईआर का बचाव किया। कहा आधार योग्य सबूत नहीं है। यही नहीं, उसने यह भी कहा है कि वह जन्म से नागरिकता का दावा करने वाले व्यक्ति से मतदाता सूची में शामिल करने के लिए संबंधित कागजात पेश करने के लिए कह सकता है। नागरिकता, मतदाता सूची से संबंधित ये खबरें हिन्दी अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं हैं।

देश में चल रही भारतीय जनता पार्टी की राजनीति ने न सिर्फ कई मीडिया संस्थानों और पत्रकारों को प्रचारक व प्रवक्ता बना दिया है, संवैधानिक संस्थाओं पर नियंत्रण की कोशिशों ने भारी नुकसान किया है। इसमें चुनाव आयोग मतदाता (सूची) बनाने के अपने संवैधानिक अधिकार का उपयोग नागरिकता तय करने के लिए करना चाहता है। मामला सुप्रीम कोर्ट में है। द हिन्दू में शीर्षक है, मतदाता सूची से निकाला जाना नागरिकता प्रभावित नहीं करेगा। इस तरह, चुनाव आयोग आधार को नहीं मानेगा और नागरिक (किसी चुनाव क्षेत्र में सामान्य तौर पर रहने वाले) को मतदाता नहीं बनायेगा। साथ ही कह रहा है कि मतदाता नहीं बनाने का मतलब यह नहीं है कि वह नागरिक भी नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस में खबर है कि चुनाव आयोग ने बिहार में चल रहे अपने विशेष सघन पुनरीक्षण (एसआईआर) के लिए आधार, मतदाता परिचय पत्र और राशन कार्ड को निवास का सबूत मानने की सुप्रीम कोर्ट की सलाह को स्वीकार नहीं किया है और अदालत में दायर जवाबी शपथ पत्र में कहा है कि मतदाता नागरिकता की शर्त पूरी करते हैं कि नहीं यह सुनिश्चित करना उसका संवैधानिक अधिकार है। फैसला अदालत को करना है लेकिन मुझे लगता है कि चुनाव आयोग अपने अधिकारों को लेकर भ्रम में होने का दिखावा कर रहा है ताकि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के हित में काम करने का मौका मिले या कर सके।

आप जानते हैं कि बिहार एक गरीब राज्य है जहां हर साल आने वाली बाढ़ के कारण लाखों लोगों के लिए अपनी जान बचाना मुश्किल होता है। गरीबी और सरकारी लापरवाही या उपेक्षा के कारण जहां प्रसव और जन्म तक अर्धनिर्मित, कच्चे या खपरैल घरों में बगैर किसी चिकित्सीय सहायता के होता है वहां नागरिकता साबित करने के लिए जन्म प्रमाणपत्र मांगा जा रहा है। शत प्रतिशत जन्म और मत्यु पंजीकरण का दावा राजधानी पटना के पॉश इलाकों में भी शायद ही किया जा सके तो दूर-देहात में सरकारी व्यवस्था कैसे की जाती होगी। 2025 में अगर शत प्रतिशत जन्म-मृत्यु पंजीकरण सुनिश्चित नहीं है तो 2003 के बाद दूर देहात के किसी गांव-घर में पैदा हुए बच्चों के माता-पिता के जन्म का प्रमाणपत्र होने की संभावना कितनी है इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। ऐसे दस्तावेज या प्रमाणपत्र नहीं होने के कारण किसी निवासी को नागरिक न माना जाये तो यह सरकार और व्यवस्था की नालायकी की सजा देना है। सरकार अपने नागरिकों और काम को जानती है इसलिए सजा नहीं दी जाती है। इसीलिये यह नहीं पूछा जा रहा है कि जो नागरिक नहीं हैं वो वर्षों से रह क्यों रहे हैं और जब आम तौर पर रहने वाले मतदाता होते हैं तो इनसे सबूत क्यों मांगा जा रहा है। मतदाता को उसका अधिकार मिले न मिले, चुनाव आयोग अपने संवैधानिक अधिकार का उपयोग करने पर आमादा है। इसीलिये यह भी कहा जा रहा है कि मतदाता सूची में नाम न होने से किसी व्यक्ति की नागरिकता खत्म नहीं हो जायेगी। यानी वह निवासी और नागरिक होकर भी मतदान के अधिकार से वंचित किया जा सकता है। 

जाहिर है, मामला गंभीर है। मीडिया में चर्चा हो तो कुछ और तर्क व मामले सामने आयेंगे जो उनके मतदाता ही नहीं, नागरिक होने की पुष्टि करेंगे पर मकसद तो यह है कि उन्हें मतदान से वंचित कर दिया जाये ताकि वे अपनी भलाई के लिए कुछ नहीं करने वाले नेताओं को अपने वोट से वंचित रखने की सजा न दे पायें। नेताओं के भले के लिए उनके मताधिकार छीनने की रणनीति साफ दिख रही है और इंतजार सुप्रीम कोर्ट के फैसले का है। मीडिया में इसपर चर्चा नहीं के बराबर है और अपना लक्ष्य पूरा करने के लिए चुनाव आयोग मनमानी कर रहा है। इसके सबूत फिर भी सामने आ ही जा रहे हैं। जो प्रभावित हैं वो जानते हैं, जो प्रचारक हैं उन्हें जानना ही नहीं है। मीडिया ने नहीं बताने, छिपाने और डराने की सुपारी ले रखी है। दूसरी ओर, तमाम संवैधानिक संस्थाएं सरकार के लिये या सरकार के पक्ष में काम करती नजर आती हैं। यहां तक कि उपराष्ट्रपति भी यही सब करते दिखते रहे हैं। अब उन्होंने इस्तीफा दे दिया है तो वह भी खबर ही है लेकिन मैं देख रहा हूं कि इस इस्तीफे ने किन खबरों को डस्टबिन में डालने में सहायता की। संसद के मानसून सत्र की हंगामी शुरुआत भी ऐसी ही खबरों में एक है। संसद में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की उपस्थिति वैसे ही कम होती है और विपक्ष के सवालों के जवाब देने से लेकर गलतियों और कमजोरियों को स्वीकार करने जैसे मामले बहुत कम होते हैं।

आतंकवाद खत्म करने के सरकार के प्रयास और उसके प्रचार के बारे में आप जानते हैं। आतकंवाद से निपटने और देश या नागरिकों को इसके दुष्प्रभाव से  बचाने का सरकार और नरेन्द्र मोदी का तरीका बिल्कुल अलग और अनूठा है। इसमें आतंकवाद की आरोपी प्रज्ञा ठाकुर को सांसद बनाना, फिर टिकट नहीं देना, समझौता एक्सप्रेस विस्फोट के आरोपियों का बरी हो जाना, ऊपरी अदालत में अपील नहीं करना और कसाब को विधिवत फांसी देकर आतंकी गतिविधि में पाकिस्तान के शामिल होने को दुनिया के सामने  रखने की कोशिश का मजाक उड़ाने के लिए कसाब को बिरयानी खिलाने की कहानी और उसके मामले में सरकारी वकील को पहले चुनाव लड़ने के लिए पार्टी का टिकट देना और फिर राज्य सभा के लिए मनोनीत कर दिया जाना आतंकवाद पर भारत के अस्पष्ट रवैये का सबूत है। इसीलिए 2019 के पुलवामा के बाद 2025 में पहलगाम हुआ। कायदे की कार्रवाई की बजाय ऑपरेशन सिन्दूर और उसका राजनीतिक लाभ लेने की कोशिशें साफ दिखीं। मामला युद्ध जैसा था नहीं और हो भी तो तैयारियां कहीं नहीं दिखीं फिर अचानक युद्ध विराम और संसद का विशेष सत्र बुलाने की मांग पर सुनवाई नहीं। कल मानसून सत्र हंगामी होना ही था। दूसरी ओर, अमेरिका का उदाहरण सामने है जहां ट्विन टावर हादसे के बाद की गई सख्ती दुनिया अभी तक महसूस कर रही है। 

ऐसे में आज खबर है कि 2006 के मुंबई सीरियल बम ब्लास्ट मामले में 2015 के फैसले को बांबे हाईकोर्ट ने पलट दिया है और फांसी व उम्रकैद की सजा पाये लोगों को बरी कर दिया है। अदालत ने कहा है और इंडियन एक्सप्रेस में उपशीर्षक है, किसी मामले को सुलझा लेने का फर्जी दिखावा मामला निपट जाने का भ्रम पैदा करता है…इससे जनता का विश्वास कम होता है। यह देश में आतंकवादी हमले की जांच का स्तर है। पहलगाम का आप जानते ही हैं। आज यह खबर तो प्रमुखता से है लेकिन जांच के स्तर या गुणवत्ता पर पर कुछ खास नहीं दिखा। दूसरी ओर, एक अन्य सरकारी विभाग ईडी या प्रवर्तन निदेशालय का हाल यह है कि उसने आपराधिक मामलों में आरोपियों को कानूनी सलाह देने के लिए वकीलों को समन भेज दिया था। देशबन्धु और द टेलीग्राफ ने इसे चार कॉलम में छापा है। देशबन्धु ने यह भी बताया है कि सिद्धारमैया मामले में भी ईडी को फटकार लगी है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर छपी दो कॉलम की खबर में बताया है कि जांच एजेंसियां वकीलों को समन नहीं कर सकती हैं। अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमानी ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि सभी जांच एजेंसियों से कहा गया है कि वकीलों को समन करने की गलती दोबारा नहीं करें। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस मामले में स्वतः संज्ञान लिया था और जारी नोटिस बाद में वापस ले लिये गये थे। दि एशियन एज ने ईडी से संबंधित खबर को सिंगल कॉलम में छापा है। इसमें लिखा है, ईडी के लिए पेश हो रहे एडिशनल सोलिसीटर एसवी राजू को संबोधित करते हुए मुख्य न्याधीश ने कहा, कृपया हमें मुंह खोलने के लिए मजबूर मत कीजिये वरना ईडी के बारे में हम कुछ सख्त टिप्पणी करने के लिए मजबूर होंगे। राजनीतिक लड़ाइयां  मतदाताओं के बीच होने दीजिये आपका उपयोग क्यों किया जा रहा है।

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