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विनोद शुक्ल को ज्ञानपीठ लौटाने का सुझाव दिए जाने पर मुझे फिराक साहब के एक लाख रुपये याद आ गए!

उमेश चतुर्वेदी-

फ़िराक़ साहब को ज्ञानपीठ मिला. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हाथों उन्हें पुरस्कृत किया गया. उस साल उत्तर भारत बाढ़ से परेशान रहा.

समारोह से पहले किसी अधिकारी ने फ़िराक़ साहब को सुझाव दिया था कि पुरस्कार की लाख रुपये की राशि प्रधानमंत्री कोष में दान दे दें. फ़िराक़ साहब जब बोलने खड़े हुए तो उन्होंने सुझाव का ज़िक्र करते हुए कहा कि कुछ लोग मुझे तिया समझते हैं. मैं इतना बड़ा मूर्ख नहीं कि लाख रुपए दान में दे दूं.

पंडित जी के सुझाव के बाद वह घटना याद आ गई


दयाशंकर मिश्रा-

विनोद कुमार शुक्ल को ज्ञानपीठ नहीं लेना चाहिए ..

मेरा विनम्र अनुरोध हमारे प्रिय कवि, लेखक, कथाकार विनोद कुमार शुक्ल तक पहुँचे। उनको ज्ञानपीठ पुरस्कार स्वीकार नहीं करना चाहिए। यह पुरस्कार के साथ नहीं, उनकी अपनी कविता की हताश जनता के साथ खड़े होने का वक़्त है। जिस मनुष्य के पक्ष में विनोद कुमार शुक्ल खड़े होते हैं ; उनकी कविता हताश व्यक्ति को न जानते हुए भी हताशा के साथ खड़ी होती है, उस कविता और हताशा को अकेले छोड़कर कवि ज्ञानपीठ के साथ कैसे खड़े हो सकते हैं?

साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ के व्याकरण में मत उलझिए। सवाल सीधा है; जब संविधान, सद्भावना और नागरिकता पर बुलडोजर दौड़ रहा है। ऐसे में यह पुरस्कार लेने का समय कैसे हो सकता है। पुरस्कार देने वाले, किनके साथ खड़े हैं? साहित्य की स्याही से जनता को बाहर करके पुरस्कार कैसे लिया जा सकता है? वही पुरस्कार जो ऐसे लोगों को दिया जा रहा है जो धर्म की शाल ओढ़कर सत्ता के सारथी बने हुए हैं। देश में पत्रकार पी साईनाथ भी हुए हैं। जिन्होंने सरकार से पुरस्कार लेने से ही इनकार किया था। और हाँ उस वक़्त BJP की सरकार नहीं थी। कुछ वर्ष पहले उन्होंने आँध्र प्रदेश सरकार का पुरस्कार भी लेने से इनकार कर दिया था।

साईनाथ ने कहा था : ‘पत्रकारों को उन सरकारों से पुरस्कार स्वीकार नहीं करना चाहिए जिनके बारे में वे खबरें लिखते हैं।जिनकी वे आलोचना करते हैं, क्योंकि वे ‘सरकार के बाह्य लेखा परीक्षक’ हैं। इस समय हमारे प्रिय लेखकों और कवियों की भी यही भूमिका होनी चाहिए।

हिंदी को जन भाषा बनाना है तो उसे पहले प्रतिरोध की भाषा बनना होगा।

मैं इतना बड़ा व्यक्ति नहीं हूँ कि विनोद जी मुझे जानें, लेकिन मैंने यह लिखा ही केवल इसलिए, क्योंकि उन सभी बड़े लोगों ने यह नहीं लिखा‌। जबकि वह मुझसे बेहतर लिख सकते थे। उनके पास भाषा है। साहित्य है। मुझे कहीं बेहतर, समझ है। किसी भी ऐसे व्यक्ति ने नहीं लिखा/ मुझे नहीं दिखा; जिनका लिखा, पढ़ते हुए मुझमें लिखने की चेतना बाक़ी है।

उन्हें पुरस्कार मिलने की व्यक्तिगत ख़ुशी है, लेकिन लोकतंत्र व्यक्तिगत ख़ुशी से ज़िंदा नहीं रहते। लोक कल्याण के लिए कवि का असहिष्णुता, अन्याय के विरोध में खड़ा होना कहीं अधिक ख़ुशी की बात होगी। मैं अपनी सीमित समझ के साथ केवल यही कहने की कोशिश कर रहा हूँ।

क्या हम भूल गए हैं, देश में पुरस्कार वापसी किसलिए हुई थी? कवियों, लेखकों, साहित्यकारों ने असहिष्णुता और नागरिक हत्याओं पर चुप्पी के विरोध में 2015 में पुरस्कार वापस कर दिए थे। तब से अब तक कुछ नहीं बदला है। शांति, सद्भावना और सहिष्णुता पर हमले की तीव्रता कई गुना बढ़ गई है। नागरिकों के घर और आत्मा पर बुलडोजर लगातार दौड़ रहा है। जनता को चिह्नित करके मारा और दौड़ाया जा रहा है। इतिहास इस पुरस्कार को चुप्पी के रूप में दर्ज कर सकता है। अत्याचारी सरकार नागरिकों के दमन चक्र को लगातार बनाए रखने में क़ामयाब हो जाती है। इस तरह की पुरस्कार और इसकी स्वीकृति सरकार की अनैतिकता को वैधता प्रदान करते हैं।

भारत में प्रतिरोध दर्ज करने का साहस इसी सरकार में देखा गया है। उदय प्रकाश, एमएम कलबुर्गी की हत्या के विरोध में 4 सितंबर 2015 को प्रतिष्ठित पुरस्कार लौटाने वाले पहले साहित्यकार, लेखक थे। लेखिका नयनतारा सहगल और कवि अशोक वाजपेई ने एमएम कलबुर्गी, गोविंद पनसारे और नरेंद्र दाभोलकर जैसे तर्कवादियों की हत्याओं के विरोध में अवार्ड लौटा दिए। भारत में लिंचिंग के वह शुरुआती दिन थे। आज ऐसी घटनाएँ अखबारों में सिंगल कॉलम में सिमट गई हैं।

हमें यह भी याद रखना चाहिए, विनोद कुमार शुक्ल को यह ज्ञानपीठ पुरस्कार असहिष्णुता, अराजकता और साम्प्रदायिकता पर पर्दा डालने की चेष्टा है। रामभद्राचार्य को यह पुरस्कार देने के बाद इसकी गरिमा, गंभीरता बचाने की असफल कोशिश की जा रही है।

जब हमारे प्रिय कवि और लेखक अपने आस पास के अन्याय को अस्वीकार करते चले जाएंगे, तो नागरिक किसके सहारे खड़े होंगे?

आज भारत के संविधान और सहिष्णुता पर जिस तरह से हमले हो रहे हैं, वैसे में पुरस्कार ग्रहण करना सरकार की असहिष्णुता और सांप्रदायिकता की नीति पर मुहर लगाने जैसा होगा।

  • इसलिए हम अपने प्रिय कवि की इस कविता को उद्धृत करते हुए उनके नागरिकों के साथ खड़े होने का आह्वान करते हैं।

‘हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था
व्यक्ति को मैं नहीं जानता था
हताशा को जानता था
इसलिए मैं उस व्यक्ति के पास गया।
मैंने हाथ बढ़ाया
मेरा हाथ पकड़कर वह खड़ा हुआ
मुझे वह नहीं जानता था
मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था
हम दोनों साथ चले
दोनों एक-दूसरे को नहीं जानते थे
साथ चलने को जानते थे’।

  • यह हताश देश के साथ खड़े होने का वक़्त है। कविता और लेखन अकेला पड़ जाएगा, यदि उनमें केवल शब्द रह जाएंगे। अत्याचार का विरोध सबसे ज़रूरी शर्त है। इनके बिना मानवीय संवेदना, सहजता, विडंबना की सुंदरतम कविता भी अपना अर्थ खो देगी।
  • आशा है; एक पाठक का अनुरोध, हमारे समय के बड़े कवि तक पहुँचेगा। न भी पहुँचे, तो लिखना पाठक का हक़ है, मैंने केवल अपना हक़ अदा किया है।
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