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आज के अखबार : वोट चुराने की कोशिश का आरोप छपा नहीं, केंचुआ ने हैशटैग शुरू किया वो दिखा नहीं

अमर उजाला ने बिहार बंद से ज्यादा महत्व भारत बंद को दिया, पटना की नहीं कोलकाता की फोटो छापी है। गनीमत यही है गुजरत में पुल टूटा और मरने वालों की संख्या 12-13 है – लगभग सभी अखबारों में पहले पन्ने पर है। नहीं बताया जाता तो कोई क्या कर सकता था। आखिर इस खबर से भी तो गुजरात मॉडल और सब चंगा सी की पोल खुलती ही है।

संजय कुमार सिंह

बिहार में मतदाता सूची के मनमाने, विशेष सघन पुनरीक्षण (एसआईआर) के खिलाफ कल के बिहार बंद के दौरान राहुल गांधी ने वोट चुराने की कोशिश का आरोप लगाया और कहा कि महाराष्ट्र की तरह बिहार में धांधली कर चुनाव जीतना चाहती है भाजपा। यह आरोप, इसकी खबर और खबर का यह शीर्षक क्या आपके अखबार में है? मुझे लगता है कि आज अगर यह खबर दिल्ली के अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है तो यह हेडलाइन मैनेजमेंट के कारण है। पाठकों को यह जानना चाहिये और इसके लिए बताया जाना चाहिये कि 50 साल पुरानी इमरजेंसी को कोसने वालों का शासन अघोषित इमरजेंसी से बुरा है और भाजपा अगर सत्ता में आ पाई तो इसलिए कि कांग्रेस ने अपने शासन में वह सब होने दिया जो भाजपा अब नहीं होने दे रही है। बात इतनी ही नहीं है। इमरजेंसी तो कुछ ही समय रही थी पर विपक्ष या विरोध की खबर तो कई साल से नहीं छप रही है। आज भी, विपक्ष के एक महत्वपूर्ण आंदोलन, विरोध प्रदर्शन और आरोप को वह महत्व नहीं मिला है जो मिलना चाहिये या भाजपा के सत्ता में आने से पहले तब के विपक्ष को मिलता रहा है। लेवल प्लेइंग फील्ड और इसका मतलब सरकारी समाचार संस्थानों में सभी विपक्षी दलों को बराबर समय देना शामिल होता था। मुझे ठीक से याद नहीं है, संभवतः इसमें पार्टियां बड़ी-छोटी नहीं होती थीं। सबको बराबर समय दिया जाता था। तब चुनाव आयोग स्वतंत्र रूप से निष्पक्ष चुनाव कराता था। अपनी मनमानी को सही साबित करने के लिए हैशटैग नहीं चलाता था। यह अलग बात है कि तब यह सब होता भी नहीं था लेकिन होता तो खबर प्रमुखता से छपती। छपती रही। आज हिन्दुस्तान टाइम्स में छोटी सी खबर है, विपक्ष का मुकाबला करने के लिए चुनाव आयोग ने हैशटैग चलाया। आप जानते हैं कि चुनाव आयोग के बचाव में भाजपा या सत्तारूढ़ पार्टी चली आती है।   

वृन्दा तुलसियान की बाईलाइन खबर के अनुसार चुनाव आयोग ने अपने एसआईआर पर विपक्ष के कई नेताओं की पोस्ट को भ्रामक करार दिया है। आप जानते हैं कि एसआईआर के खिलाफ आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई है। दूसरी ओर केंचुआ हैशटैग चलाकर फैक्टचेक कर रहा है जो उसका काम नहीं है। इसी तरह, विदेशी नागरिकों की पहचान करना और उनके नाम मतदाता सूची में शामिल नहीं करना भी चुनाव आयोग का काम नहीं है। चुनाव आयोग अवैध रूप से अमेरिका गये और वहां से बेड़ियों में वापस भेज दिये नागरिकों से भी यह नहीं पूछ सकता है कि आप देश छोड़कर चले गये थे अब आपको मतदाता क्यों बनाया जाये। असल में नागरिक ने क्या किया है और क्या नहीं किया है को देखना भी चुनाव आयोग का काम नहीं है। फिर भी चुनाव आयोग यह सब कर रहा है और जाहिर है कि सत्तारूढ़ पार्टी के कहने पर कर रहा है। ऐसे में खबर कहां क्या छप रही है और क्या नहीं छप रही है – देखना-समझना जरूरी है। आज देशबन्धु की लीड का शीर्षक है, बिहार में वोट चुराने की कोशिश हो रही। उपशीर्षक है, कांग्रेस नेता ने कहा महाराष्ट्र की तरह बिहार में धांधली कर चुनाव जीतना चाहती है भाजपा। इस खबर के साथ एक खबर का शीर्षक है, “अवैध वोटरों पर राजनीति करना चाहती है भाजपा : रविशंकर”।

रविशंकर भाजपा नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं। वे मतदाता सूची बनाने में मनमानी के आरोपों पर अवैध वोटर की बात कर रहे हैं लेकिन महाराष्ट्र में लोकसभा और विधानसभा चुनाव के बीच लाखों वोटर बढ़ जाने पर कुछ कहा हो तो पता नहीं है। मशीन से पढ़ने योग्य मतदाता सूची चुनाव आयोग दे नहीं रहा है और अब नियम बन गया है कि 45 दिन बाद रिकार्ड ही नहीं रहेगा। उसपर भी उनका कहा कुछ सुनने में नहीं आया है। ऐसी हालत में रविशंकर प्रसाद ने जो कहा उसे राहुल गांधी के कहे के साथ सरकारी पार्टी के पक्ष के रूप में जगह दी गई है। यही तरीका है। इसमें यह नहीं देखा जाता है कि जो कहा गया है वह कितना अर्थपूर्ण या तार्किक है या तथ्यों की कसौटी पर कितना खरा है। सच्चाई यह है कि चुनाव आयोग का काम है कि वह किसी चुनाव क्षेत्र में सामान्य तौर पर रहने वाले 18 साल से ऊपर के सभी लोगों के नाम मतदाता सूची में दर्ज करे। यही लोग वोटर कहे जाते हैं और मतदाता सूची में जिसका नाम है वही मतदाता होता है इसमें वैध-अवैध कुछ नहीं होता है क्योंकि किसी भी देश में कोई विदेशी बगैर चिन्हित किये नागरिक की तरह रहेगा या रहने दिया जायेगा इसकी कल्पना भी नहीं की जाती है। भारत सरकार ने चुनाव आयोग के लिए यह नया काम ढूंढ़ा है जबकि अभी तक यह आरोप लगाया जाता था कि गैर भाजपाई सत्तारूढ़ दल ऐसे विदेशी नागरिकों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करते हैं और बदले में उनके वोट से चुनाव जीतते हैं। अब जब केंद्र में 11 साल से भाजपा की सरकार है और बिहार में ज्यादातर समय नीतिश कुमार की सरकार केंद्र की भाजपा सरकार के समर्थन में रही है तो जाहिर है कि विदेशी नागरिक होंगे ही नहीं क्योंकि भाजपा ऐसा करती ही नहीं है और अगर हैं तो वे भाजपा के शासन में रह रहे हैं और इसी से सुविधा पाते रहें होंगे और भाजपा के आरोपों के अनुसार भाजपा को ही वोट देंगे। ऐसे में यह कहना बेमतलब है कि विपक्ष अवैध वोटरों पर राजनीति करना चाहता है जबकि ऐसी कोशिश का आरोप भाजपा लगाती रही है। फिर भी इस बार ऐसा कोई मतदाता समूह है तो वह भाजपा को ही वोट देगा।

चुनाव आयोग भाजपा की इच्छा या आदेश से काम कर रहा है इसका पता रविशंकर प्रसाद के इस बयान या इसके जरिये विपक्ष के विरोध या चुनाव आयोग की मनमानी पर चुप्पी से भी चलता है। इसके अलावा कल के बंद की खबर को आज अखबारों में प्रमुखता नहीं मिलने से भी स्पष्ट है कि सरकार और सरकारी बाबू चुनाव आयोग के साथ हैं। तमाम मामले में भाजपा के समर्थन की यह खास पहचान रही है। ऐसे में आज बिहार के विरोध प्रदर्शन की खबर हिन्दुस्तान टाइम्स में दो कॉलम में है और छोटी सी इस खबर के साथ चुनाव आयोग के हैशटैग वाली खबर भी है। टाइम्स ऑफ इंडिया में कल के आंदोलन या आरोप की खबर तो नहीं है लेकिन बिहार के एसआईआर पर एक खबर सेकेंड लीड है। इसका शीर्षक है, “बिहार एसआईआर  : पटना में आधार स्वीकार किया जा रहा है सीमांचल में नहीं”। कहने की जरूरत नहीं है कि अगर ऐसा है तो गलत है और इसीलिये सेकेंड लीड है और दूसरे अखबारों में नहीं छपने का मतलब यह नहीं हो सकता है कि ऐसा नहीं है या है तो ठीक है। जाहिर है, चुनाव आयोग मनमानी कर रहा है और मीडिया बता भी नहीं रहा है। सीमांचल में आधार नहीं मानने का कोई कारण नहीं है और अगर आधार नहीं मानने का कारण यह है कि वह ‘अवैध मतदाताओं’ या विदेशियों या घुसपैठियों को भी जारी किये गये हैं तो जिम्मेदार कौन है। उसके खिलाफ कार्रवाई कौन करेगा और चुनाव आयोग किसके कहने पर इन्हें मतदाता बनाने को तैयार नहीं है?

टाइम्स ऑफ इंडिया में आरा के पास बभनगांव के एक रेल कर्मचारी श्याम बिहारी ओझा का बयान छपा है। उसका कहना है कि अपने माता-पिता के दस्तावेज लेने के लिए छुट्टी लेकर गांव जाना उसके लिए संभव नहीं है। उसके पिता को एसआईआर के बारे में पता ही नहीं है। मेरे माता-पिता के पास आधार के सिवा कोई जन्म प्रमाणपत्र या अन्य दस्तावेज भी नहीं है। अखबार ने यह भी बताया है कि चुनाव आयोग ने एसआईआर को उचित ठहराने के लिए अनुच्छेद  326 का उल्लेख किया है। पर मुद्दा यह है कि नागरिक सुनिश्चित करने के लिए नागरिक का पासपोर्ट जरूरी नहीं है और आधार को क्यों नहीं माना जा रहा है। अगर सरकार ने ऐसा कहा है तो सरकार बताये कि आधार जारी करने और उसकी अनिवार्यता का मतलब क्या है। अगर सरकार को लगता है कि सीमांचल में कुछ आधार गलत जारी हो गये हैं तो उसके लिये पूरे बिहार को परेशान करना कैसे सही है और उनकी पहचान करने का तरीका मतदाता सूची में नाम के बाद क्यों नहीं लागू किया जा सकता है। इसमें जो लोग रह जायेंगे उसके लिये कौन जिम्मेदार होगा या वह कैसे सही या जरूरी है?

द हिन्दू में आज आधे पेज का विज्ञापन है और बिहार की एक ही सिंगल कॉलम की खबर है जो राहुल गांधी की कल की फोटो के साथ है। इस खबर का शीर्षक है –  राहुल ने कहा, “मतदाता सूची का पुनरीक्षण वोट चुराने की कोशिश”। विपक्ष के नेता का यह कहना कितना महत्वपूर्ण है इसका पता इस खबर और शीर्षक को पहले पन्ने पर रखने से चलना चाहिये। इंडियन एक्सप्रेस ने सुप्रीम कोर्ट में आज सुनवाई है को फ्लैग शीर्षक के साथ लीड बनाया है। मुख्य शीर्षक में बताया है कि चुनाव आयोग अपने ही व्यवहार नहीं मान रहा है, मतदाताओं पर जिम्मेदारी डाल रहा है और मौजूदा सूची को नजरअंदाज कर रहा है। इसके साथ दो खबरों के दो उप शीर्षक हैं, एक के अनुसार – रिकार्ड से पता चलता है कि पहले के संशोधनों में चुनाव आयोग ने स्वघोषणा को प्राथमिकता दी थी और विरोध करने वाले को साबित करना था कि जिसका विरोध किया जा रहा है वह नागरिक नहीं है। इस बार या सिर्फ बिहार के मामले में चुनाव आयोग बदला हुआ है। इसीलिए विरोध हो रहा है और अखबार वाले सच्चाई बताने से बच रहे हैं जबकि सामान्यतौर पर तरीका यही होना चाहिये। विशेष स्थिति में विशेष तरीके की बात मानी जा सकती है पर वह केंद्र सरकार को कहना होगा और मानना होगा कि 10 साल में घुसपैठ हुई है और आधार गलत जारी हुए हैं। अगर ऐसा नहीं है तो चुनाव आयोग किसके कहने पर नये नियम लागू कर रहा है या सख्ती कर रहा है। तीन कॉलम में इंडियन एक्सप्रेस का एक शीर्षक है, “बिहार में महाराष्ट्र मॉडल नहीं चलेगा : राहुल ने चुनाव आयोग के अभियान का विरोध किया”। इंडियन एक्सप्रेस ने एक और शीर्षक से बताया है कि बिहार में चुनाव आयोग का आदेश मानने में बीएलओ का क्या हाल हो रहा है। खबर के अनुसार अखबार के संवाददाता ने एक बीएलओ के साथ रहकर देखा कि डेडलाइन तक काम पूरा करने के लिए रोज देर रात तक काम करना पड़ रहा है और इंटरनेट धीमा है या उसे कोई जल्दी नहीं है, मांगे गये दस्तावेजों में कुछ ही, कुछ लोगों के पास उपलब्ध है और 77895 बीएलओ इससे जूझ रहे हैं। दि एशियन एज में चार कॉलम की खबर का शीर्षक है, राहुल और तेजस्वी ने एसआईआर विरोधी आंदोलन का नेतृत्व किया। उपशीर्षक है – वोट की चोरी नहीं होने देंगे : राहुल, भाजपा ने मकसद पर सवाल उठाये। द टेलीग्राफ ने देश के दो पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों के हवाले से कहा है कि नागरिकता की पुष्टि करना चुनाव आयोग का काम नहीं है। यह खबर लीड है और यही शीर्षक है। नवोदय टाइम्स में बड़े से शीर्षक और फोटो के साथ छोटी सी खबर छपी है। शीर्षक है, शांतिपूर्ण रहा बिहार में विपक्ष का चक्का जाम। उपशीर्षक है, मिला-जुला रहा असर, यात्रियों को हुई असुविधा। इस खबर का जो हिस्सा पहले पन्ने पर है उसमें मुद्दे की कोई बात नहीं है। सिर्फ यह बताया गया है कि चक्काजाम एसआईआर के खिलाफ था। अभी तक की खबरों से लग रहा था कि एसआईआर के खिलाफ बिहार बंद का आयोजन था। रेलों को भी रोका गया। फोटो भी उसी की है। अमर उजाला में बिहार बंद या एसआईआर पर कुछ नहीं है। यहां खबर है, भारत बंद का मिला-जुला असर। देशबन्धु ने इस शीर्षक के साथ बिहार की खबर को लीड बनाया है।

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