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व्यापम से NEET तक: कुछ सालों बाद संस्थानों में न सिर्फ सीट की, बल्कि प्रश्न-पत्र की भी बोलियाँ लगेगी!

प्रवीण झा-

शिक्षा से जुड़ा पहला बड़ा आंदोलन 1968 में फ्रांस में हुआ था, जब राष्ट्रपति चार्ल्स डी गॉल को इस्तीफ़ा देना पड़ा था। यह विश्वविद्यालयों में अनियमितता के खिलाफ था। दक्षिण अमरीकी देश चिली में यह पिछले दशक में हुआ जब वहाँ शिक्षा का निजीकरण बढ़ने लगा था, और खूब धांधली हो रही थी। दक्षिण अफ्रीका और इंग्लैंड में भी बढ़ती फीस को लेकर आंदोलन हुए।

अभी भारत में भी आंदोलन हो रहे हैं, हालाँकि सत्ताधारी दल के समर्थक इसे शिक्षा से जुड़ा नहीं बता रहे। चूँकि केंद्र और राज्यों में एक ही दल भारी बहुमत में है, और जनता का पूरा समर्थन है, इसलिए भारत में इस आंदोलन का प्रभाव शायद न दिखे। बढ़ते निजीकरण के बोझ से लदी शिक्षा की गाड़ी यूँ ही चलती रहे, जैसी चल रही है।

2014-15 के व्यापम घोटाले से लेकर हालिया नीट परीक्षा लीक तक यह स्पष्ट है कि शिक्षा तंत्र में भ्रष्टाचार दीमक की तरह घुस चुका है। सरकारी संस्थाएँ चरमरा गयी हैं। निजी संस्थाओं और कोचिंग संस्थानों का जाल बिछ चुका है। यह अरबों-खरबों का खेल है, जिसमें विश्व की सबसे बड़ी युवा जनसंख्या पिस रही है।

यदि सरकार हल निकालना चाहती तो व्यापम से नीट घोटालों के बीच निकाल लेती। जब निजी मेडिकल कालेज के मालिकों और कोचिंग माफिया के तार राजनेताओं से जुड़ते जाएँ, तो सरकार क्या ही हल निकालेगी।

राजनेताओं को मालूम है कि इससे बेहतर है कि मामला गोल-मटोल कर दिया जाए, और बात शिक्षा से भटका दी जाए। कमाल की बात है कि ऐसे लोग जो राजनीति में नहीं हैं, वे भी इन राजनेताओं की वकालत में लगे हैं। फिर तो शिक्षा-तंत्र ज्यों का त्यों रहेगा। कुछ सालों बाद न सिर्फ संस्थानों में सीट की बोलियाँ लगेगी, बल्कि प्रश्न-पत्र की भी बोलियाँ लगेगी। इस ‘पैसा फेंको, तमाशा देखो’ वाली शिक्षा के सरगना तो शिक्षा मंत्री ही कहलाएँगे। चाहे लोग मानें या न मानें।

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