मनीष सिंह-
क्या सरकार क्रिमिनल हो सकती है? वित्तमंत्री पर FIR हुई है, इलेक्टोरल बांड से वसूली के सम्बन्ध में। इसमे ED, IT के अफसरों के साथ आरोपी नामजद हुईं।
हालिया, दिल्ली की शराब पॉलिसी के मामले में सिटिंग सीएम पर FIR हुई, वे जेल भी काट आये।
यह निजी करप्शन नही, कि मंत्री रहते हुए, किसी व्यक्ति/कम्पनी को “नियमविरुद्ध” लाभ दिया हो।
इलेक्टोरल बांड और शराब नीति, “पॉलिसी” थे।वो काम, जो करने को सरकार ऑथराइज्ड की जाती है- सम्विधान द्वारा,
और चुनी गई है जनता द्वारा।
यह ठीक, कि कोई कानून, कालक्रम में गलत, अनुचित दिख सकता है। उसके नैतिक या सामाजिक नुकसान भी हो सकते है।लेकिन उसे बनाने वाली विधानसभा..
और तत्कालीन सरकार के कर्ताधर्ता, क्रिमिनल नही माने जाते थे।
रिश्वत लेनेदेने के तरीके अनोखे, इनोवेटिव होते गए हैं।
आप वोटर को चुनावी रात शराब और पैसे की रिश्वत नही बांटते। बकायदा नीतिगत जामा देकर वोटर के खाते में पैसे देते है। इसे किसान कल्याण निधि कह दीजिए, लाडली बहना या प्यारा भाऊ योजना।
है तो रिश्वत न…
आप एक हाथ से, कर्ज दिलवा कर, दूसरे हाथ से माफी दिलवा सकते है। लूट का एक हिस्सा चंदे में ले सकते हैं, इलेक्टोरल बांड कहकर।
आप छापे मारकर, डराकर एक्सटॉर्शन कर सकते है। और रंगदारी का पैसा, इलेक्टोरल बांड से ले सकते हैं। दिल्ली वाली सरकार ने शराब ठेकेदारों से पैसा, पार्टी फंड में बांड के थ्रू लिया होता, तो पवित्र होता।
चेक के थ्रू लिया,
तो मनीलांड्रिंग हो गयी।
कहने का मतलब यह कि सरकार तय करती है कि क्राइम क्या है, क्या नही। आखिर वही राजा है, हुक्काम है, मालिक है। उसका लिखा, बोला, गजट में छपाया हुआ ही कानून है।
और क्राइम वह, जो कानून के खिलाफ हो।
सरकार तो क्राइम माफ भी कर सकती है।यूपी की योगी सरकार ने, सत्ता में आते ही करीब 25 जघन्य आपराधिक मामले, एक ऐसे व्यक्ति के सिर से वापस ले लिए, जिसका नाम अजय सिंह बिष्ट था।
वे मामले, जिनमे धरे जाने के डर से वह आदमी, भरी सन्सद में रो रहा था।
पर सरकार को पॉवर है। वो काम भी कानून के तहत हुआ।
और जो कानून के अनुसार किया गया, वह क्राइम कैसे हुआ? ये ज्यूरिस्प्रूडेंस का बेसिक क्वेश्चन है।
मैं सीतारमन, केजरीवाल या योगी मामले की विवेचना नही कर रहा।बेसिक सवाल ये है- कि क्राइम क्या है?
अगर कानून के तहत किये काम को भी क्राइम मानना शुरू हो गया।
सरकारों, मुख्यमंत्रीयों और प्रधानमंत्रियों पर पॉलिसी के लिए FIR, जेल डालने की प्रथा शुरू हो गई (जो शुरू हो चुकी है) तो कोई सरकार नीतिगत फैसले कैसे लेगी?
सरकार के दो स्तर हैं
प्रशासन,और मंत्री
ब्यूरोक्रेसी लेवल पर पैरालिसिस, पिछले कुछ दशकों में बढ़ता गया है। IAS अफसरान, निर्णयनहीन और शक्तिहीन बना दिये गए हैं। उनकी पदीय वकत, नेताओ की ताबेदारी और प्रोटोकॉल के अलावे शून्य है।
एक मामूली ट्रान्सफ़र, एक सिम्पल ठेका, एक साधारण सर्कुलर जारी करने में अफसरों को काठ मार जाता है।
आईटी, मोबाइल फोन, वीडियो कॉन्फ्रेंस ने दखलंदाजी को 24X7 कर दिया है। ऐसे में किसी बड़े मंत्री का वरदहस्त न हो, तो फैसले लेने की ताकत ब्यूरोक्रेसी में नही रही।
तब मंत्री स्तर पर भी, नीतिगत बातें भी क्रिमिनलाइज होने लगी..
तो क्या सरकार, क्या सत्ता?
वे भी कोर्ट के डर से काठ मारकर बैठेंगे। जो चल रहा,चलने देंगे। कमाई के रास्ते तो फिर भी निकाल ही लेंगे, कोई जनोपयोगी फैसला करने में भय जरूर लगेगा।
आखिर शराब नीति और लाडली बहना, एक एंगल से जनोपयोगी भी तो हैं।
उधर बैंगलोर की कोर्ट ने जो किया, वह भी एकदम सही है। सरकार हो, तो क्या आप एजेंसियों को वसूली वाला गुंडा बना देंगे?
सरकारी नीतियों को ऑपर्च्युनिटी की विंडो बनाकर, लीगली, बेशर्मी से धन उगाहोगे??ऑडिट कराकर अपने पालित चुनाव आयोग को पेश कर देंगे, जो इसे सार्वजनिक न होने देगा।
क्योकि ऐसा कानून तुमने बना दिया है!!
असल मे, बंगलूरू के उस जज को सलाम। उसने वहां टांग फंसा दी है, जहां हाथ लगाने से हमारे धर्मपरायण चीफ जस्टिस भी कतरा गये।
कायदे से जब इस कानून को सुप्रीम कोर्ट ने स्क्रैप किया, इसमे हुए हर ट्रांजेक्शन की जांच होनी थी।
देखना चाहिए था, की उस लेन देन के पीरियड में चन्दा देने वालो को क्या लाभ मिले। ठेके, कर्जमाफी, छापों से आजादी??
जैसे जब शराब नीति का पैसा, AAP के कोष में गया, तो कोर्ट ने पार्टी को आरोपी बनाया।
यह लॉजिक तो हर दल के लिए होना चाहिए।
पर फिर वही सवाल, कि क्या सरकार खुद ही क्रिमिनल हो सकती है?
ये अजीब हालत है। टकराव, बेशर्मी, हेकड़ी की राजनीति ने राजव्यवस्था को अनुचित टकराव, और दुविधा की राह पर डाल दिया है। तय करना कठिन है। पर इसमे कोई शक नहीं, कि ये हालात बनाने वाली सरकार..
इतिहास के प्रति क्रिमिनल अवश्य है।
निर्मला सीतारमण और ईडी पर एफआईआर में लिखा क्या है?

दिनांक: 20.09.2024
मामला संख्या: ब्रह्म सत्य:4800/2024
प्रस्तुतकर्ता: श्री भीमप्पा, पीसी-20664
सारांश:
इस मामले में, यह आरोप लगाया गया है कि निर्मला सीतारमण और ईडी, संवैधानिक पदों पर हैं।
टिप्पणी में, आरोप लगाया गया है कि भाजपा के नड्डा और नलिन कतील भाजपा में उच्च पदों पर हैं।
यह भी आरोप लगाया गया है कि आरोपी निर्मला सीतारमण और ईडी ने भाजपा के नड्डा और अन्य ग़ैरकानूनी पदों पर बैठे लोगों के साथ मिलकर, एमएनसी और टी.एस.सी. शार्घरेट कंचि और एम से लगभग 8,000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि “इलेक्टोरल बॉण्ड” के नाम पर ग़लत तरीके से हासिल की।
आरोप है कि आरोपी निर्मला सीतारमण ने आरोपी ईडी की मदद से रास और मध्य में बैठे आरोपी नड्डा और कर्नाटक राज्य में बैठे आरोपी नलिन कुमार कतील के फायदे के लिए रहस्यमय ढंग से हज़ारों करोड़ रुपये ग़लत तरीके से हासिल किए।
आरोप है कि आरोपी निर्मला सीतारमण ने आरोपी ईडी का उपयोग करते हुए कई कार्पोरेट कंपनियों पर छापे मारे और उनके CEO और MD को गिरफ्तार कराया। आरोपी नंबर दो यानी ईडी के हमले से डरकर कई कार्पोरेट कंपनियों को करोड़ों रुपये की कीमत के “इलेक्टोरल बॉण्ड” खरीदने के लिए मजबूर किया गया।
कार्पोरेट ऑडियम, कफ़र जॉइंट, एम/एस स्टोर लाइट, और वेदांता कंपनियों से अप्रैल 2019 से अगस्त 2022 और नवंबर 2023 तक कुल 230.15 करोड़ रुपये हासिल किए गए। अरविंद फार्मा नामक कंपनी से 02 जुलाई 2022, 15 नवंबर 2022, 05 जनवरी 2023 और 08 नवंबर 2023 को कुल 49.5 करोड़ रुपये रहस्यमय ढंग से हासिल किए गए। आरोप है कि सभी आरोपी ग़ैरकानूनी तरीके से पैसे हासिल करने के लिए आपराधिक साजिश में शामिल थे।
ऐसा भी आरोप है कि आरोपी निर्मला सीतारमण ने आरोपी ईडी की मदद से आरोपी नड्डा, नलिन कतील, बीवाई विजयेंद्र आदि के फायदे के लिए ग़लत तरीके से कुल 8,000 करोड़ रुपये से भी अधिक रकम हासिल की।
कार्रवाई:
तहकीकात: इस मामले में तहकीकात शुरू की गई है।
प्र.व.व. रिपोर्ट: प्र.व.व. रिपोर्ट पीड़ित को उसकी भाषा में समझा कर पढ़कर सुनाई गई और उसकी प्रति उसे दी गई।
धारा 157 सी.आर.पी.सी. या 176 बी.एन.एस.एस. : यदि पुलिस अधिकारी घटनास्थल पर नहीं पहुंचा या जांच करने से इनकार किया, तो धारा 157 सी.आर.पी.सी. या 176 बी.एन.एस.एस. के तहत इसका कारण दर्ज किया जाएगा।
अगली कार्रवाई: मामले की जांच जारी है।
पीड़ित का हस्ताक्षर/अंगूठे का निशान



Sanjay mittal
October 1, 2024 at 8:36 pm
Phir to jin jin parties ne electoral bond se chanda liya hai sab doshi hain aur sabne extortion money liya hai sab parties per fir honi chiye keval ek party per kyon ye dikhata hai ki fir karne wala kisi vipakshi party ka dalaal hai pehle to fir karane wale ki jaanch honi chahiye