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सुख-दुख

‘स्नोपियर्सर’ : आम हिंदुओं को कुर्सी से बाँधकर जबरन दिखाई जाने वाली फिल्म!

Snowpiercer poster: a rugged man with an axe stands in a frosty, metallic train interior, surrounded by other passengers; title 'Snowpiercer' and the tagline 'Fight Your Way to the Front' visible.

आनंद कुमार-

कोरियन फिल्मों की श्रेणी में “स्नोपियर्सर” को रखा जाए या नहीं रखा जाए, यह एक बहस का मुद्दा हो सकता है क्योंकि फिल्म के ८५% संवाद तो अंग्रेजी में थे। निर्देशक बोंग जून-हो ने बाद में ऑस्कर विजेता फिल्म “पैरासाइट” भी बनाई थी।

मोटे तौर पर फिल्म की कहानी यह है कि ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के प्रयास में एक वैज्ञानिक प्रयोग नाकाम हो जाता है और पूरी पृथ्वी एक घातक हिमयुग में जम जाती है। सूर्य दिखता नहीं, कोहरे से ढका है, तो ठंड काफी बढ़ गई होती है। सर्वनाश से बचे हुए इंसान एक विशाल, कभी न रुकने वाली ट्रेन (‘स्नोपियर्सर’) में सवार हैं, जो पूरी दुनिया का चक्कर लगाती रहती है।

यह ट्रेन समाज का एक प्रतिरूप दिखाती है। पीछे के डिब्बों में गरीब लोग घुस आए थे, जिन्हें ट्रेन में नरकीय परिस्थितियों में रखा जाता है। इन पर नियंत्रण रखने के लिए सत्ता के पास एक ब्यूरोक्रेसी और पुलिस बल है। आगे के डिब्बों में पूँजीपति, शासक, संभ्रांत वर्ग हैं जिन्होंने इस ट्रेन का टिकट खरीदा था। इनके पास भोग-विलास के साधन उपलब्ध हैं। इंजन सत्ता है जिसमें एक देवता की तरह ट्रेन का मालिक रहता है। फिल्म दिखाती है कि कैसे पिछले डिब्बे के लोग क्रांति करते हैं और डिब्बा-दर-डिब्बा आगे बढ़ते हैं। क्रांति का नायक और उसके साथी जैसे-जैसे एक-एक डिब्बा आगे बढ़ते हैं, अलग-अलग दुनिया जैसे स्कूल, बार, स्विमिंग पूल, कसाईघर आदि नज़र आते हैं और ध्यान से देखते ही यह समझ में आने लगेगा कि आधुनिक राजनीति के बारे में फिल्म क्या कह रही है।

आम हिंदुओं को कुर्सी से बाँधकर, जबरन जो फिल्में दिखा देनी चाहिए, हम उनमें एक नाम ‘स्नोपियर्सर’ का अवश्य गिनवाते हैं। फिल्म देखकर समझ में आता है कि क्रांति के बाद सत्ता जिनके हाथ में जाती है, वे अक्सर पुराने शासकों से भी गए-गुजरे होते हैं। ऐसे में एक बड़ा सवाल यह खड़ा हो जाता है कि “क्या व्यवस्था को बदलना (Revolution) ही समाधान है, या उस पूरी व्यवस्था (System/Train) को ही नष्ट कर देना असली मुक्ति है?” जिस क्रांति के नायक पर जनता भरोसा कर रही होती है, वह किस लायक है, इस पर कई बड़े सवाल उठ खड़े होंगे। हाल के भारत में जो तथाकथित आंदोलन दिखे हैं, उनमें से कुछ के हाथ पुलिस की परमिशन, कुदरती बिरयानी, फंड आदि कैसे पहुँचते रहे, और दूसरे कुछ लोग भूखे पुलिस-प्रताड़ना कैसे झेलते रहे? गुप्त समझौते भी होते हैं, यह फिल्म देखकर याद आने लगेगा।

फिल्म की कहानी के धोखे से जो भगवद्गीता के श्लोक याद दिलाने की आदत है, वह हमने कायम रखी है। तो सबसे पहले तो अठारहवें अध्याय का अड़तालीसवाँ श्लोक देख लीजिए:

सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्नि रिवार्ताः॥ (भगवद्गीता १८.४८)

यहाँ कहा गया है कि जैसे अग्नि होगी तो धुआँ भी होगा ही, वैसे ही सभी कर्म किसी न किसी दोष से युक्त होंगे। इसलिए स्वाभाविक कर्म, अपने स्वभाव का त्याग नहीं करना चाहिए। इसके बारे में शुरू में ही भगवान (अध्याय ३, श्लोक २५) कह चुके होते हैं:

सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत।
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम्॥ (भगवद्गीता ३.२५)

कर्म से आने वाले फल के लालच में पड़े अज्ञानी जैसे कर्म करते हैं, वैसे ही भारत, आसक्तिरहित विद्वान को भी लोकसंग्रह के उद्देश्य से कर्म करते रहना चाहिए। इस श्लोक से थोड़ा पहले के हिस्से को देखेंगे तो कर्म न करने से क्या नुकसान होगा, वह भी बताया गया है। इस श्लोक में जो “लोकसंग्रह” शब्द है, वह भगवद्गीता को उपनिषदों से अलग भी कर देता है। भगवद्गीता को उपनिषदों का सार कहा जाता है, लेकिन यह शब्द उपनिषदों से नहीं आता। मोटे तौर पर इस शब्द का अर्थ “पब्लिक सर्विस” (लोक-कल्याण/जन-हित) जैसा होगा।

क्रांति होती भी है या नहीं, आंदोलन के बाद स्थिति आंदोलन के पहले से अच्छी होती है या बुरी, इन पर फिल्म से ध्यान जाएगा। इन बातों के साथ ही महाभारत के युद्ध जैसा ही, पूरी व्यवस्था को समाप्त करके एक नयी व्यवस्था की शुरुआत करना सही होता है या नहीं, यानी हिंसा सही या गलत जैसे बचकाने सेकुलर प्रश्न से भ्रमित हैं तो उससे भी थोड़ी मुक्ति मिले, ऐसा हो सकता है। बाकी भगवद्गीता के बारे में फिल्म के माध्यम से जो बताया वह नर्सरी के स्तर का था क्योंकि हमें उतना ही आता था। पीएचडी के लिए आपको भगवद्गीता स्वयं पढ़नी पड़ेगी, यह तो याद ही होगा!

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