प्रभात रंजन-
एआई के दौर में किताबों के भविष्य को लेकर अनघा जयकुमार का लेख इंडियन एक्सप्रेस में आया है, जिसके अनुसार-
हाल के सप्ताहों में ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के पुस्तक विक्रेताओं ने पुस्तकों की असामान्य रूप से बड़ी मात्रा में खरीद को लेकर चिंता जताई है। ऐसी खबरें सामने आई हैं कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) विकसित करने वाली कंपनियाँ अपने मॉडल को प्रशिक्षित करने के लिए छपी हुई किताबें बड़ी संख्या में खरीद रही हैं।
लेकिन चिंता केवल खरीदारी को लेकर नहीं है, बल्कि उन्हें प्रशिक्षण के लिए इस्तेमाल करने के तरीके को लेकर भी है। एन्थ्रोपिक कंपनी के विरुद्ध चल रहे एक कॉपीराइट मुकदमे में सार्वजनिक हुए दस्तावेज़ों से पता चला कि कंपनी विनाशकारी स्कैनिंग नाम की प्रक्रिया अपना रही थी। इसमें किताबों को स्कैन करने के बाद उन्हें नष्ट कर दिया जाता है।
हाल ही में द गार्जियन ने बताया कि ऑस्ट्रेलिया के कई पुस्तक विक्रेताओं को कुछ बिचौलियों के माध्यम से दुर्लभ, कम प्रसिद्ध और सस्ती पेपरबैक किताबों तक की बड़ी मात्रा में माँग मिली। फॉर्च्यून पत्रिका ने भी नीदरलैंड के एक पुस्तक विक्रेता के साथ हुई ऐसी ही घटना की जानकारी दी।
अधिकांश मामलों में ये बिचौलिए विभिन्न विक्रेताओं से बड़ी संख्या में किताबें खरीदते हैं और फिर उन्हें डिजिटल रूप में बदलने के लिए भेज देते हैं। इससे पुस्तक विक्रेताओं को यह पता ही नहीं चल पाता कि अंततः इन किताबों का वास्तविक खरीदार कौन है।
ये नई खबरें एन्थ्रोपिक की प्रोजेक्ट पनामा नामक योजना से जुड़ी पहले की जानकारी की पुष्टि करती हैं। जनवरी में द वॉशिंगटन पोस्ट ने बताया था कि कंपनी ने लाखों छपी हुई किताबें खरीदीं, उनकी जिल्दें अलग कर दीं और फिर उन्हें स्कैन करके अपने एआई मॉडल के प्रशिक्षण के लिए उच्च गुणवत्ता वाला विशाल आँकड़ा-संग्रह तैयार किया।
नई रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि जो प्रक्रिया पहले केवल अदालत के दस्तावेज़ों और खोजी रिपोर्टों में दिखाई देती थी, अब उसका असर पुस्तक बाज़ार में भी दिखाई देने लगा है। पुस्तक विक्रेताओं को अब पुस्तकों की असामान्य माँग साफ़ महसूस होने लगी है।
आखिर किताबें ही क्यों?
आमतौर पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता और जनरेटिव कृत्रिम बुद्धिमत्ता से आशय कृत्रिम बुद्धिमत्ता की उस शाखा से होता है जिसे बड़े भाषा मॉडल कहा जाता है। ये मॉडल बहुत बड़ी मात्रा में उपलब्ध सामग्री का अध्ययन करके उसमें मौजूद पैटर्न सीखते हैं और उसी के आधार पर नया पाठ तैयार करते हैं। इसलिए इन्हें जितनी बेहतर गुणवत्ता का सामग्री-संग्रह मिलता है, इनका प्रदर्शन भी उतना ही बेहतर होता है।
हाल के वर्षों में एआई कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा मुख्य रूप से अधिक शक्तिशाली कंप्यूटर चिप बनाने की रही है। लेकिन अब छपी हुई किताबों की बढ़ती खरीद यह दिखाती है कि एक और चीज़ की माँग तेज़ी से बढ़ रही है—उच्च गुणवत्ता वाला प्रशिक्षण सामग्री-संग्रह।
कई वर्षों तक अग्रणी एआई कंपनियाँ मुख्य रूप से सार्वजनिक इंटरनेट से एकत्र किए गए पाठ पर निर्भर रहीं। लेकिन जैसे-जैसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा तैयार की गई सामग्री इंटरनेट पर बढ़ती जा रही है, वैसे-वैसे विश्वसनीय और उच्च गुणवत्ता वाले मूल स्रोतों की आवश्यकता भी बढ़ रही है।
ऐसे में सोचिए कि किताबों का भविष्य क्या होगा? जिन किताबों की ख़रीद बहुत हो रही उनकी ख़रीद के पीछे केवल पाठक नहीं दूसरे कारण भी हो सकते हैं।


