मनीष दुबे-
NDTV को उसके ब्रांड नाम और अडानी ग्रुप के फंडिंग सपोर्ट के जरिए ही चलने का तर्क काफी हद तक सही माना जा सकता है। 2022 में जब गौतम अडानी के समूह ने NDTV में बहुलांश हिस्सेदारी हासिल की, तब से चैनल की संपादकीय स्वतंत्रता और वित्तीय स्थिति को लेकर कई तरह की चर्चाएँ होती रही हैं।
NDTV की मौजूदा स्थिति
- TRP में गिरावट – पिछले कुछ सालों में NDTV की हिंदी और अंग्रेजी दोनों ही चैनलों की TRP में भारी गिरावट आई है। खासतौर पर हिंदी समाचार चैनलों में Aaj Tak, ABP News, India TV, और Republic Bharat जैसे चैनलों के मुकाबले NDTV इंडिया बहुत पीछे रहता है।
- ब्रांड वैल्यू पर निर्भरता – NDTV का नाम आज भी एक प्रतिष्ठित और पुराने न्यूज ब्रांड के रूप में जाना जाता है, खासकर “लिबरल और एलीट ऑडियंस” में इसकी पकड़ बनी हुई है। लेकिन बड़े पैमाने पर दर्शकों के बीच इसकी लोकप्रियता सीमित हो चुकी है।
- अडानी ग्रुप का निवेश – अडानी ग्रुप के टेकओवर के बाद से NDTV को मजबूत फंडिंग सपोर्ट मिला है, जिससे इसकी आर्थिक स्थिति स्थिर बनी हुई है। हालाँकि, इससे चैनल की निष्पक्षता पर सवाल भी उठने लगे हैं।
- डिजिटल प्लेटफॉर्म पर फोकस – NDTV ने अपनी डिजिटल उपस्थिति को मजबूत करने पर ज्यादा ध्यान दिया है, जिससे उसे ऑनलाइन व्यूअरशिप में कुछ फायदा मिलता है।
क्या NDTV को TRP की परवाह है?
NDTV खुद को एक प्रोफेशनल और विचारशील पत्रकारिता वाला चैनल मानता है, जो “मास ऑडियंस” (आम दर्शकों) की बजाय एक खास तबके (शहरी पढ़े-लिखे दर्शकों) को टारगेट करता है। यही वजह है कि NDTV के लिए TRP मुख्य प्राथमिकता नहीं रही है।
प्रणव राधिका और रवीश कुमार के बाद अब NDTV इंडिया की साख कितनी बची है?
NDTV इंडिया की साख (credibility) पर पिछले कुछ वर्षों में बड़ा प्रभाव पड़ा है, खासकर जब से रवीश कुमार, प्रणय रॉय और राधिका रॉय ने चैनल को अलविदा कहा। इनके जाने के बाद NDTV इंडिया की निष्पक्षता और विश्वसनीयता को लेकर कई सवाल उठे हैं।
NDTV इंडिया की मौजूदा साख
- रवीश कुमार के जाने का असर
रवीश कुमार NDTV इंडिया का सबसे बड़ा चेहरा थे। उनकी पत्रकारिता की एक अलग पहचान थी और उनका दर्शकों पर जबरदस्त प्रभाव था।
उनके जाने के बाद चैनल की टीआरपी और दर्शकों की रुचि में गिरावट आई है।
अब NDTV इंडिया असली मुद्दों पर बहस करने वाले मजबूत एंकरों की कमी महसूस कर रहा है।
- प्रणय रॉय और राधिका रॉय की विदाई
NDTV के संस्थापक प्रणय और राधिका रॉय के जाने के बाद चैनल के मालिकाना ढांचे में बदलाव आया।
जब तक ये दोनों NDTV के नेतृत्व में थे, चैनल की संपादकीय स्वतंत्रता बनी रही।
लेकिन अब NDTV पर अडानी ग्रुप के प्रभाव की आशंका बनी रहती है, जिससे उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं।
- संपादकीय रुख में बदलाव?
NDTV को पहले एक स्वतंत्र और निष्पक्ष मीडिया संस्थान के रूप में देखा जाता था, जो सरकार की आलोचना करने से नहीं हिचकता था।
अडानी ग्रुप के टेकओवर के बाद अब यह धारणा बनी है कि चैनल सरकार के प्रति ज्यादा नरम रवैया अपना सकता है।
हालांकि, NDTV ने अब तक पूरी तरह से अपना स्टैंड नहीं बदला है, लेकिन यह पहले जितना मुखर और साहसी नहीं रहा।
- NDTV की बची हुई साख और नई रणनीति
NDTV इंडिया अभी भी गंभीर पत्रकारिता करने की कोशिश करता है और उसे अपने पुराने दर्शकों का एक हिस्सा अभी भी पसंद करता है।
डिजिटल मीडिया पर ज्यादा ध्यान देने के कारण यह अभी भी ऑनलाइन स्पेस में अच्छा कर रहा है।
लेकिन यह भी सच है कि TRP के मामले में यह पीछे चला गया है, क्योंकि अब इसमें पहले जैसी धार नहीं रही।
NDTV का संक्षिप्त इतिहास
- स्थापना और शुरुआती दौर (1988-1998)
1988 में प्रणय रॉय और राधिका रॉय ने New Delhi Television (NDTV) की स्थापना की।
शुरुआत में NDTV डीडी न्यूज़ के लिए कार्यक्रम बनाता था।
1995 में NDTV ने स्टार न्यूज़ के साथ मिलकर भारत का पहला 24×7 अंग्रेजी न्यूज चैनल लॉन्च किया।
- स्वतंत्र चैनल के रूप में उदय (1998-2005)
1998 में NDTV ने स्टार न्यूज़ से अलग होकर स्वतंत्र रूप से काम शुरू किया।
2003 में NDTV ने दो चैनल लॉन्च किए:
NDTV 24×7 (अंग्रेजी)
NDTV इंडिया (हिंदी)
- विस्तार और चुनौतियाँ (2005-2020)
NDTV भारत में गंभीर पत्रकारिता का प्रतीक बन गया, खासकर रवीश कुमार के आने के बाद NDTV इंडिया की लोकप्रियता बढ़ी।
2010 के बाद वित्तीय संकट बढ़ने लगा, और चैनल को सरकार विरोधी रुख के कारण दबाव का सामना करना पड़ा।
सीबीआई, इनकम टैक्स और ED की जांचें NDTV के खिलाफ चलती रहीं।
- अडानी टेकओवर और बदलाव (2022-वर्तमान)
2022 में गौतम अडानी के अडानी ग्रुप ने NDTV की बहुलांश हिस्सेदारी खरीद ली।
इसके बाद प्रणय रॉय, राधिका रॉय और रवीश कुमार ने इस्तीफा दे दिया।
अडानी टेकओवर के बाद NDTV के संपादकीय रुख में बदलाव की अटकलें लगने लगीं।
निष्कर्ष- NDTV एक समय भारत में निष्पक्ष और खोजी पत्रकारिता का प्रतीक था। लेकिन अडानी ग्रुप के टेकओवर के बाद इसकी संपादकीय स्वतंत्रता पर सवाल उठ रहे हैं। अब यह देखना होगा कि NDTV भविष्य में अपनी साख बनाए रख पाता है या नहीं।
एनडीटीवी की टीआरपी का क्या हाल है? नीचे देखिए


