दयानंद पांडेय-
दिल्ली के रामलीला मैदान में आज शपथ ग्रहण से ले कर यमुना के वासुदेव घाट पर आरती तक के दृश्य देख कर लगता है कि प्रवेश वर्मा, रेखा गुप्ता के गले में बंधा पत्थर साबित हो सकते हैं। रेखा गुप्ता को लगातार ओवरटेक करते हुए नज़रअंदाज़ करने की उन की अदा बहुत शुभ नहीं है।
मंज़र बहुत मंगलमय नहीं दिखता। प्रवेश वर्मा को लगता है जैसे मुख्य मंत्री पद उन से रेखा गुप्ता ने छीन लिया है। जब कि छीना मोदी ने है। फिर सुपर चीफ़ मिनिस्टर होने का गुरूर उन के चेहरे पर साफ़ पढ़ा जा सकता है।
यह ख़तरे की घंटी है।
आरती में तो ताबड़तोड़ कंप्टीशन से वह आजिज आ कर पीछे खिसक गईं। फिर आहिस्ता से बीच में कोई और आ गया। रामलीला मैदान में भी प्रवेश वर्मा की उपेक्षा, रेखा गुप्ता के सामने ही थी।
बिलकुल निकट, आमने सामने होने पर भी प्रवेश ने रेखा को नहीं देखने का भाव चेहरे पर बनाए रखा। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि रेखा गुप्ता, इस जाट नेता के गले में घंटी बांध कर क़ाबू कैसे करती हैं।
इस लिए भी कि मुख्य मंत्री रेखा गुप्ता के लिए उन के पास आदर भाव नदारद है। ओवरटेक भाव प्रबल है।
उत्तर प्रदेश में केशव मौर्य और बृजेश पाठक की याद आती है।

प्रवेश वर्मा को CM न बनाने को लेकर स्यापा कर रहै फेसबुकी भाईयो देखो जरा. वर्मा जी की रीढ़ कुछ ज्यादा मुलायम नहीं है. अब इनको CM बनवाना ही है तो जरा इनकी रीढ़ में एक स्टील की रॉड तो डलवा लो. इतनी मुलायम रीढ़ तो CM पड़ का लोड झेल नहीं सकती. -Girdhari Lal Goyal
उर्मिलेश-
शालीमार बाग से पहली बार विधायक बनीं रेखा गुप्ता को दिल्ली का मुख्यमंत्री बनाकर BJP नेतृत्व ने एक बार फिर अपनी ‘चौंकाऊ शैली’ का प्रदर्शन किया है. पिछले वर्ष वह मध्य प्रदेश और राजस्थान में ऐसी शैली का प्रदर्शन कर चुका है, जब क्रमश: मोहन यादव और भजनलाल शर्मा मुख्यमंत्री बनाये गये. पर इन तीनों फैसलों में एक बात कॉमन है, जो बिल्कुल ही चौंकाने वाली नहीं कि ये तीनों नेता संघ-भाजपा की राजनीतिक-संस्कृति में पले-बढ़े हैं!
रेखा गुप्ता अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद(ABVP) की कार्यकर्ता रहीं हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ(DUSU की अध्यक्ष भी रह चुकी हैं. भाजपा-शासित राज्यों में एक भी महिला मुख्यमंत्री नहीं थी. दिल्ली में पार्टी ने महिला को मुख्यमंत्री बनाकर उस कमी को दूर करने की कोशिश की. रेखा गुप्ता वैश्य समाज से आती हैं तो उस जातिगत समीकरण को भी मद्देनजर रखा. दिल्ली में अरविंद केजरीवाल के वैश्य(बनिया) आधार को अपने साथ जोड़ने की इसमें कोशिश दिखती है. विजेंद्र गुप्ता अगर मुख्य मंत्री बनते तो भी इस समीकरण को साधा जा सकता था. पर शायद वैश्य के साथ महिला होना रेखा गुप्ता के पक्ष में गया. इस तरह भाजपा नेतृत्व ने अपने हिसाब से सटीक फैसला किया. हमारी जानकारी है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ(RSS) भी इनके पक्ष में था.
रही बात, रेखा गुप्ता की राजनीतिक और निजी शख्सियत की तो वह ‘खांटी भाजपाई’ हैं. कल रात से ही सोशल मीडिया पर उनके बहुत सारे विवादास्पद और घोर आपत्तिजनक भाषा व विचार वाले ट्विट फिर से अवतरित हो रहे हैं. चूंकि मैं सोशल मीडिया पर ज्यादा नहीं ‘घूमता’ इसलिए अब तक स्थानीय स्तर की एक भाजपा कार्यकर्ता रहीं रेखा गुप्ता के उन कमेंट्स से वाकिफ नहीं था. पर उन्हें देखकर मुझे तनिक भी अचरज नहीं हुआ. मौजूदा सत्ताधारी पार्टी की राजनीतिक संस्कृति में इस तरह के कमेंट्स न सिर्फ पसंद किये जाते हैं अपितु उन्हें ‘योग्यता’ के रूप में देखा जाता है.
लेकिन रेखा गुप्ता के लिए आज से चुनौतियों का नया सफर शुरू हो रहा है.
चुनाव हारने के बाद आम आदमी पार्टी और कांग्रेस, दोनों पार्टियां दिल्ली में अपने-अपने राजनीतिक वजूद को बचाने और बढाने में जुटेंगी. दिल्ली भाजपा के अंदर से भी कुछ चुनौतियां उभर सकती हैं. आलाकमान के डर से फिलहाल भाजपा का कोई ‘महत्वाकांक्षी’ विधायक रेखा गुप्ता का विरोध करने का दुस्साहस नहीं करेगा. लेकिन भविष्य में ऐसी किसी आशंका के मद्देनजर रेखा गुप्ता को भी अपना राजनीतिक कौशल दिखाना होगा. पार्टी ने अपने चुनाव अभियान में दिल्ली वालों को बहुत सब्जबाग दिखाये हैं. सरकार को कुछ तो करके दिखाना ही होगा. पेय जल समस्या और बिजली संकट, यमुना-दुर्दशा और बेरोजगारी जैसे बड़े मसलों पर उनकी राजनीतिक परीक्षा होगी!


