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राष्ट्रीय सहारा में एक साल पापड़ बेलने के बाद मेरी पत्रकारिता की शुरुआत हुई थी!

हैदर नकवी-

ह तस्वीर देखकर मुझे 1993 के गर्मी के दिन याद आ गए, जब बाबा ने मुझे लेकर राष्ट्रीय सहारा कानपुर के प्रमुख, कमलेश भैया (Kamlesh Tripathi) के पास भेजा था। कमलेश भैया मेरे पत्रकारिता के पहले गुरु और मेंटर रहे हैं। मैं अंग्रेजी माध्यम का छात्र था, और बाबा को लगता था कि हिंदी अखबार में काम करके मेरा न्यूज़ सेंस बेहतर होगा। इस कारण सहारा का चयन हुआ। बाबा का मानना था कि कमलेश भैया से बेहतर मुझे अपनी शागिर्दगी में फील्ड रिपोर्टिंग की बारीकियां और कोई नहीं सिखा सकता था।

इसके बाद, कमलेश भैया ने मुझे चंद्रेश दादा के पास भेजा। चंद्रेश दादा एक सख्त गुरु थे, रोज़ाना 30 से 35 प्रेस नोट बनवाते थे। उन प्रेस नोट्स को हाथ से लिखना होता था, और जब लिखते-लिखते हाथ थक जाते थे, तो वह उन्हें प्रूफरीड करते थे। फिर व्याकरण, शब्दावली, और क्या इंट्रो होना चाहिए और क्या जानकारी उस प्रेस नोट में और जोड़ी जा सकती है, इस पर विस्तार से चर्चा करते थे।

एक साल तक मैंने प्रेस नोट बनाए। सुबह-सुबह पैदल दफ्तर जाता था और रात में 11 बजे लौटता था। फिर मुझे रिपोर्टिंग में डाला गया और टेलीग्राफ, जीपीओ, खेल, और रेलवे की बीट्स पर काम करने को कहा गया। एक नए लड़के के लिए रोज़ खबर निकालना आसान नहीं था। लेकिन उस समय स्वर्गीय दीप चंद्र पांडे, विमल जैतली, रामेंद्र सिंह चौहान, आनंद पांडे, सुधीर मिश्रा जी (जिनकी हिन्दी लेखनी का आज भी मुरीद हूं) जैसे बेजोड़ रिपोर्टर्स ने मुझे बड़ी मदद दी। मेरी पहली बाइलाइन स्टोरी मुझे मेरे कॅप्टन संजीव मिश्रा ने दी थी। दूसरी बाइलाइन स्टोरी मुझे केम हॉल की स्टोरी पर मिली।

बाइलाइन स्टोरी—यानी पापड़ बेलने के बराबर। उसमें मेहनत साफ दिखनी चाहिए थी। थोड़ी सी कमी, और बाइलाइन चली जाती थी। दूसरे दिन पेट में बटरफ्लाई इफेक्ट का डर लगता था कि खबर छपेगी या नहीं। लेकिन जब ये दो बाइलाइन स्टोरी मिलीं, तो मुझे लगा कि मेरी मेहनत सफल हुई। कमलेश भैया ने सर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया, और दादा ने मुस्कुराते हुए गले लगाया। इस तरह मेरी पत्रकारिता की शुरुआत हुई, और आज भी मैं उसकी कीमत समझता हूं।

आज जब पत्रकारिता में गिरावट के बारे में सोचता हूं, तो समझता हूं कि मैं बहुत खुशकिस्मत था, जो मुझे ऐसे महान उस्ताद मिले, जिन्होंने पत्रकारिता के असल मायने और बुनियादी तत्वों को सिखाया। आजकल के पत्रकारों में सबसे बड़ी कमी यह है कि वे पढ़ाई या आत्ममूल्यांकन में रुचि नहीं रखते, वे सिर्फ अपने आपको पत्रकार समझकर संतुष्ट हो जाते हैं। उनका दृष्टिकोण बहुत सीमित होता है। यह तब तक नहीं बदल सकता जब तक वे अपनी सोच को विस्तृत न करें और पत्रकारिता को सच्चे अर्थों में न अपनाएं। अगर पत्रकारिता को सही तरीके से समझकर किया जाए, तो सम्मान और यश अपने आप मिलेंगे।

पत्रकारिता एक साधना है। फायदा लेने की चीज़ नहीं। साधना करते-करते साधक के पास सिद्धियां आ जाती हैं। जबकि कुछ लोग साधक होने का नाटक करते हैं!

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