शीतल पी सिंह-
G7 बनाम BRICS : आज पब्लिक इंडिया के शाम पाँच बजे के कार्यक्रम में निमंत्रित होने के नाते इस विषय को खँगालना पड़ा तो बहुत सी ज़रूरी जानकारियाँ सामने आईं।
आज से तीस पैंतीस साल पहले G7 वाले दुनिया के राजा थे। क़रीब सत्तर फ़ीसदी अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर इनका नियंत्रण था जो अब तीस से चालीस फ़ीसदी के बीच झूल रहा है और उत्तरोत्तर नीचे ही जा रहा है जबकि BRICS ने न सिर्फ़ G7 की अंतरराष्ट्रीय व्यापार की हिस्सेदारी में बराबरी कर ली है वरन वह कुछ हद तक आगे भी निकल आया है।
G7 के देशों की तुलना में BRICS देशों में विकास दर प्रगति पर है इसलिए आने वाले दिनों में यह संतुलन लगातार BRICS के पक्ष में झुकता जाएगा। जब मोदी जी ट्रंप के इस बार अमरीका के राष्ट्रपति बनने के बाद उन्हें बधाई देने गए थे तब ट्रंप ने BRICS को लेकर जो झल्लाहट दिखाई थी उसकी वजह यही है।
BRICS चीन की प्रभुता वाला संगठन है और G7 अमरीका का। चीन करेंसी समेत बैंकिंग और अन्य वित्तीय गतिविधियों में विकल्प प्रस्तुत कर रहा है। भारत BRICS का सदस्य है और G7 में सदस्य नहीं है पर आमंत्रित किया जाता है। भारत करेंसी के मामले में डॉलर की चौधराहट ख़त्म किए जाने के पक्ष में नहीं है। दरअसल भारत का कारपोरेट इसकी वजह है।
भारत में भ्रष्टाचार के ज़रिए जो पैसा अर्जित किया जाता है और पहले से किया गया है वह दुनिया के जिन टैक्स हैवेन्स में छिपाया जाता है वे सब G7 देशों के नियंत्रण में हैं और डॉलर नियंत्रित हैं। भारतीय कारपोरेट इसी चोरी के पैसे को भारत और पश्चिम में एसेट ख़रीदने में इस्तेमाल करता है। इसलिए कोई भी कारपोरेट पक्षीय भारत सरकार इस दुरभिसंधि से बाहर निकलने को तैयार न होगी।
हमने देखा ही है कि दो दिन पहले तक ट्रंप और G7 को गालियाँ बकता ANI के नेतृत्व में हमारा दक्षिणपंथ शेखी बघारने में लगा था कि अब अगर G7 का न्योता मिल भी जाए तो मोदीजी उसे लात मार देंगे, अब एकदम ख़ामोश है। बल्कि कुछ ने तुरंत रंग बदल कर G7 में मोदीजी की ज़रूरत की वजहें गढ़नी शुरू कर दी हैं।


इसलिए भारत का नेतृत्व BRICS में अपने होने का इस्तेमाल अमरीका के नेतृत्व वाले प्रभुओं से रियायतें पाने और रिश्ता प्रगाढ़ करने की कोशिश करते हुए ही मिलेगा!


