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सुख-दुख

इंटर्न से लेकर संपादक तक सबके लाडले थे विधि सिंह!

विनय तिवारी-

पत्रकारिता जगत के लिए दुःखद समाचार

वरिष्ठ पत्रकार श्री विधि सिंह Vidhi Singh जी का हृदयाघात से अचानक निधन हो गया है। श्री सिंह वर्तमान में दैनिक हिंदुस्तान में कार्यरत थे। सीतापुर जनपद के कसमंडा के मूलनिवासी श्री विधि सिंह लखनऊ के त्रिवेणीनगर में रहते थे। उनके असामयिक निधन से पत्रकारिता जगत में शोक की लहर है। आपके विचार और सामाजिक सरोकारों के प्रति प्रतिबद्धता हमेशा स्मरण की जाती रहेगी।

ईश्वर से प्रार्थना है कि दिवंगत आत्मा को सद्गति तथा शोकाकुल परिवार एवं साथियों को इस असीम दुःख को सहने का साहस दें। साथी श्री विधि सिंह जी को भावभीनी श्रद्धांजलि, नमन


श्रेया पाठक-

कुछ खबरें आपको स्तब्ध कर देती हैं विधि सर आपका यूं दुनिया को अलविदा कहने की खबर लखनऊ के हर इंसान को मायूस कर गई। क्राइम रिपोर्टिंग के महारथी के ठहाकों से न्यूज रूम गुलज़ार रहता था।

हिन्दुस्तान अखबार में जब मेरी नौकरी लगी तो मीटिंग इंचार्ज जिस दिन आप होते थे उस दिन ऑफ़िस का माहौल बेहद हल्का और काम करने की स्पीड सबकी तेज रहती थी।

सबकी डेस्क पर आकर सबसे बात करना। अच्छे पद पर होने के बाद सहज और सरल होना लोगों की मदद करना और मुस्कुरा कर सभी से बोलना, ये बातें आपको विशेष बनाती थी।

सर आपका जाना हम सबके लिए बेहद दुखद है। आप इंटर्न से लेकर संपादक सबके लाडले थे। सर आप जहां रहे वहां हंसते रहे… Rest in Glory


पीयूष त्रिपाठी-

विधि का विधान! हिंदुस्तान अखबार के वरिष्ठ पत्रकार विधि सिंह भाई के जाने की खबर अविश्वसनीय सी है।

2003 में मैंने कुछ समय दैनिक जागरण में काम किया। उस समय विधि सिंह भाई भी वहीं थे। बहुत बात नहीं होती थी। एक बार अचानक उन्होंने मुझे एक कागज थमाते हुए कहा कि भाई साहब यह एक प्रेस कॉन्फ्रेंस का न्यौता है इसे आप कवर कर लीजिएगा। उस प्रेस कॉन्फ्रेंस में तत्कालीन आईजी शैलजा कांत मिश्र भी थे।

उनके मुंह से भाई साहब शब्द सुनकर आश्चर्य हुआ क्योंकि मैं वहां एकदम नया था और उनसे कभी बात भी नहीं हुई थी। वैसे भी वहां ज्यादातर लोग रिजर्व ही दिखाई देते थे। अगर आप अपनी ओर से टोंक कर किसी को नमस्कार कर लें तो ठीक वरना कोई कम ही बात करता था। शायद भइया जी के आतंक का असर रहा हो।

उस समय वहां पर बड़े-बड़े धुरंधर क्राइम रिपोर्टर थे और भी तमाम बड़े पत्रकार थे जो बाद में बड़े बड़े संस्थानों में सम्पादक बने। जहां अधिकतर लोग बात भी न करें ऐसे में अचानक विधि जी का आदर पूर्वक बुलाना मन को छू गया।

उसके बाद कभी साथ काम करने का मौका नहीं मिला। मैं टीवी पत्रकारिता में आ गया। विधि भाई हिन्दुस्तान चले गए। मैं ईटीवी में हैदराबाद से होते हुए लखनऊ आ गया।

फील्ड में यदा कदा मुलाकात हुई तो बस नमस्कार तक। वह भी बहुत बरस पहले। उनका सौम्य चेहरा याद आ रहा है। आज यह खबर हिला गई। हार्ट अटैक ने उन्हें हम सब से छीन लिया। विनम्र श्रद्धांजलि भाई। यही विधि का विधान है, कब क्या होगा पता नहीं


किशन कांत उपाध्याय-

विधि तुम जाने कहां चले गए… विधि सिंह, तुम तो दिलदार थे… दिल को कैसे कमजोर कर बैठे?

दिल तो तुम्हारे कहने पर चलता था। दिल जीतने वाले जादूगर थे तुम… फिर यह क्या कर बैठे? इतनी भी क्या जल्दी थी जाने की? मेरे तो बहुत क़रीब थे तुम।

ऑफिस के तमाम झंझावातों के बाद भी तुमने कभी संपर्क नहीं तोड़ा। हर कठिन दिन के बाद तुम्हारी एक मुस्कान सब थकान दूर कर देती थी। तुम सिर्फ़ एक सहकर्मी नहीं थे — तुम इंसान थे… और इंसानों में भी श्रेष्ठ।

सबकी मदद को हर पल तैयार। किसी के चेहरे पर चिंता देखी नहीं कि तुम सबसे पहले उसके पास खड़े मिलते थे। तुम्हारे टिफ़िन का इंतज़ार पूरे ऑफिस को रहता था।

सिर्फ़ खाने के लिए नहीं, उस अपनापन के लिए… उस साथ बैठने की खुशी के लिए… जो तुम अपने साथ लाते थे। संस्थान में तुम्हारे साथ बिताए हुए लम्हे अद्भुत थे।

वे अब सिर्फ़ यादें नहीं, हमारी ज़िंदगी का एक खूबसूरत हिस्सा हैं। जाने में इतनी जल्दी क्यों कर दी? नहीं जाना था… नियति को कोई टाल नहीं सकता — यह कहते हैं लोग। पर यह टल क्यों नहीं सकता था?

क्यों इतनी जल्दी हमें अधूरा छोड़ गए? आज तुम नहीं हो, पर तुम्हारी हँसी, तुम्हारी दरियादिली, तुम्हारी सादगी — हमारे दिलों में हमेशा जीवित रहेगी।

तुम्हारी कमी कभी पूरी नहीं होगी, पर तुम्हारी याद हमें बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा देती रहेगी। ईश्वर तुम्हारी आत्मा को शांति दे।

तुम जहाँ भी हो, मुस्कुरा रहे होगे — और शायद वहाँ भी सबका दिल जीत रहे होगे। विधि, तुम हमेशा हमारे दिलों में रहोगे।


विवेक त्रिपाठी-

विश्वास नहीं होता!! आज मेरे लिए बड़े शोक का दिन है.. 26 साल पुराना साथी हमको छोड़ गया..

पत्रकारिता के मेरे शुरुआती दोस्त.. बेहद मिलनसार.. हमेशा मुस्कुराते रहने वाले.. सबकी मदद करने वाले.. हमेशा उपलब्ध, शरीर से चुस्त-दुरुस्त, वरिष्ठ पत्रकार विधि सिंह नहीं रहे..

विधि भाई जितने सभ्य और सौम्य व्यक्ति थे, उससे कहीं ज्यादा धाकड़ क्राइम रिपोर्टर थे.. उनकी धारदार और तेवर वाली खबरें पुलिस प्रशासन से लेकर सत्ता तक में हड़कंप मचाती थीं.. कई खबरें राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रहीं..

सन 2000 में जब मैंने पत्रकारिता शुरू की थी, तब विधि सिंह दैनिक जागरण में हुआ करते थे.. उस वक्त मैं हिंदुस्तान अखबार में था.. संस्थानों की अदला-बदली हुआ करती है.. मैं लखनऊ छोड़कर तमाम प्रदेशों में घूमते हुए कानपुर गया और फिर वापस लखनऊ आया.. उसी दौरान विधि सिंह हिंदुस्तान में आ गए थे और यहां पर उन्होंने एक मजबूत लंबी पारी खेली..

हम दोनों साथ के ही थे.. उम्र में ज्यादा अंतर नहीं था.. लेकिन मैं उन्हें विधि सर.. विधि सर.. कहता था.. विधि भाई भी सबके नाम के आगे जी जरूर लगाते थे.. मुझे विवेक जी कहकर बुलाते थे..

विधि भाई की गृहस्थी अभी कच्ची है.. अपनी बेटी को लेकर बहुत पजेसिव थे.. उनकी बेटी ही उनकी दुनिया थी.. जब भी मिलते मेरी बेटियों के बारे में जरूर पूछते थे..

कल देर रात विधि सिंह का निधन हो गया. उन्हें दिल का दौरा पड़ा.. हमने एक बेहतरीन पत्रकार और एक शानदार इंसान खो दिया..

ईश्वर विधि सिंह की आत्मा को शांति दें और उनके परिवार को ये असीम कष्ट सहने की शक्ति प्रदान करें.. ओम शांति शांति शांति


ब्रजेश शुक्ला-

यकीन नहीं हो रहा है। यकीन हो भी तो कैसे हो। विधि सिंह चले गए। नहीं, नहीं यह क्या कह रहे हो। अभी तो विधि मेरे सामने बच्चे ही थे। विधि से मेरे क्या संबंध थे इसको शब्दों में बयां नहीं कर सकता। वह शब्द बार-बार मेरे कानों में गूंज रहे हैं की जीजा बहुत दिन से घर नहीं आए हो। मैं भी हँस कर कहता विधि जल्द आऊंगा। वह कहते कि बार-बार आप यही बात कहते हैं।

वैसे तो विधि क्राइम रिपोर्टर थे लेकिन उनके जैसी खबरें मैंने बहुत कम पढ़ी है। मुझे नहीं याद है की कभी उनकी खबरों पर एक सवाल भी उठा हो। लेकिन उतनी ही तीखी। उन कुख्यात अपराधियों के खिलाफ भी जो अपने को बेताज बादशाह समझते हैं और उन पुलिस वालों के भी अहंकार का मर्दन करती हुई जो सोचकर आए हैं की वर्दी पहनने के बाद उन्हें बेहूदगी करने का हक मिल गया है।

वह तमाम क्षण याद आ रहे हैं जो विधि के साथ मैंने गुजारे हैं। दैनिक जागरण में वह मेरे साथ थे। मैं ब्यूरो हेड था और विधि क्राइम रिपोर्टिंग के बेताज बादशाह। एक ऐसी टीम जो उत्तर प्रदेश में तहलका मचाए हुए थी। विधि और मनीष मिश्रा एक साथ अपराध जगत की खबरें देखते थे और रोज ही उनकी खबरों में कभी पुलिस फंस जाती और कभी अपराधी। अरे विधि भाई मनीष भाई यह क्या लिख दिया। कुछ तो बता दिया करो। ब्यूरो प्रमुख होने के कारण सुबह-सुबह लोग मुझको फोन करते थे। कुछ लोग खबरों की सराहना करते थे कुछ लोग अपनी शिकायतें और दर्द भी बयां करते थे।

मुझे नहीं याद की कोई दिन ऐसा गया हो जागरण की बेजोड़ रिपोर्टरों की खबरों पर प्रशंसा और शिकायत ना मिली हो। वह क्षण भी आया जब मैं हिंदुस्तान आ गया और उसके बाद तुम भी हिंदुस्तान आए। तुम्हारे जीवन को नजदीक से देखा है। एक पत्रकार की हैसियत से क्षण प्रतिक्षण तुम्हारे साथ जिया हूं। एक पत्रकार के तौर पर तुम्हारी ईमानदारी और कर्तव्य निष्ठा को मैंने देखा है। क्या कहूं कुछ कहते नहीं बन रहा है। मैं निशब्द हूं।

मैं एक बात कह सकता हूं की लखनऊ के ही नहीं उत्तर प्रदेश के अपराध रिपोर्टर के रूप में जो नाम है उनमें तुम श्रेष्ठ थे। थे तो तुम क्राइम रिपोर्टर लेकिन आचरण बिल्कुल संत जैसा। हर तरह के उन आदतों से दूर जो किसी रिपोर्टर को भ्रष्ट बनाती है। बिल्कुल निर्मल हृदय। तुम लोंग तक भी नहीं खाते थे। लेकिन विधाता की मर्जी। उसके आगे सब बेबस है। उसका निर्णय क्या है कोई नहीं जान सकता। लेकिन हे ईश्वर आपसे शिकायत है कि विधि को आपने क्यों छीन लिया।

हे विधि तुम सर्वश्रेष्ठ थे सर्वश्रेष्ठ हो। मैं यह शब्द कैसे कहूं की विधाता तुम्हें अपने चरणों में शरण दे। लेकिन जो हुआ है उसे कौन बदल सकता है। हे बाबा विश्वनाथ, हे बांके बिहारी हे मर्यादा पुरुषोत्तम विधि को अपने चरणों में शरण दें।

मूल खबर…

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