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जवाब नहीं दे पाए तो डिफेमेशन केस की धमकी देने लगे गडकरी साहब…. देखें वीडियो

Two people seated in a private jet; a woman in a floral shawl speaks while a man with a microphone listens.

कृष्ण कांत-

फोकट के एथेनॉल मंत्री को धमकी नहीं, जवाब देना चाहिए। नितिन गडकरी लंबे समय से एथेनॉल मंत्री बने घूम रहे थे। सरकार की ओर से ये अकेले मंत्री हैं जो एथेनॉल पर बोलते रहे हैं। अब पत्रकार ने सवाल पूछ लिया तो कह रहे हैं कि जाकर पेट्रोलियम मंत्री से पूछो। फिर आप सालों से एथेनॉल के ब्रांड एंबेस्डर बनकर बनकर क्यों घूम रहे थे?

हद तो त​ब हो गई जब उन्होंने पत्रकार को धमकी दे दी कि तुम पर मानहानि का मुकदमा कर सकता हूं। पत्रकार से कह रहे हैं कि आप गाड़ी का माइलेज नहीं चेक कर सकतीं, सिर्फ कंपनी कर सकती है। इस पर आप हैरान हो सकते हैं कि हर गाड़ी खुद ही माइलेज बताती है, लगता है गडकरी ने जीवन में कभी कार देखी नहीं है।

गडकरी ने इस इंटरव्यू में जो किया, वह एक मंत्री का व्यवहार नहीं है। वे सत्ता के अहंकार में अपनी जवाबदेही से भाग रहे हैं और पत्रकार को, जनता को धमका रहे हैं। इसके पहले अपनी फ्रस्ट्रेशन निकालने वाले यूट्यूबर को गधा बता चुके हैं।

असली बात तो ये है कि अगर सब सही है तो एथेनॉल मिलावट, माइलेज या फिर एथेनॉल से गाड़ी खराब होने के बारे में कोई पारदर्शिता क्यों नहीं है?

गडकरी को यह जवाब देना चाहिए कि वे सालों से एथेनॉल की वकालत क्यों कर रहे थे? उनका इससे क्या लेना देना था? क्या सिर्फ इसलिए कि वे अपने बेटी की शुगर और एथेनॉल कंपनी के पक्ष में अपने पद का दुरुपयोग कर रहे थे? जब वह विभाग आपका नहीं है तो आप हर मंच से एथेनॉल क्यों बेच रहे हैं? क्या यह खुले भ्रष्टाचार का मामला है?

देश के हर कार वाले, बाइक वाले या अन्य वाहन मालिकों को जो नुकसान हो रहा है, उसका जिम्मेदार कौन है?

देखें वीडियो-

https://x.com/azizkavish/status/2076986280072904929?s=46

https://x.com/azizkavish/status/2076986280072904929?s=46

अशोक झा-

करारे सवालों का सामना कैसे किया जाता है, इसका लाइव ट्रेलर एबीपी न्यूज की पत्रकार मेघा प्रसाद के इंटरव्यू में देखने को मिल गया। पूरे इंटरव्यू के दौरान केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी जिस तरह असहज नजर आए, उनके चेहरे के हाव-भाव और बॉडी लैंग्वेज को देखकर साफ लग रहा था कि जमीनी हकीकत से जुड़े कई तीखे सवालों के ठोस जवाब उनके पास थे ही नहीं। मेघा प्रसाद ने जब जनता की जेब और गाड़ियों के इंजन पर पड़ने वाले असर को लेकर सीधे सवाल दागे, तो गडकरी जी सीधे जवाब देने के बजाय हर बार बात को गोलमोल तरीके से घुमाते हुए नजर आए। सीधा जवाब भला उनके पास होगा भी कहाँ? जब देश की जनता पर बिना सोचे-समझे इथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल जबरदस्ती थोप दिया गया हो, तो ऐसे तीखे सवालों से भागना ही पड़ेगा। ऐसा लगता है कि गडकरी जी को अब एक नया चमत्कारी अभियान शुरू कर देना चाहिए, जिसका नाम होना चाहिए – हर हाल एथेनॉल यानी एवरी होल इथेनॉल! इस अभियान का संदेश बिल्कुल साफ और सीधा होना चाहिए कि देश में ऐसा कोई छेद या कोना बचना ही नहीं चाहिए, जहाँ जबरदस्ती एथेनॉल न ठूंसा जाए।

मजे की बात तो यह है कि जब पत्रकार ने कड़े सवाल पूछे, तो हमेशा शांत और शालीन दिखने वाले मंत्री जी सीधे मानहानि का मुकदमा ठोकने की बात पर उतर आए। यहाँ तक कि उन्होंने पत्रकार पर केस करने तक की बात कह डाली। जब इनसे ज़्यादा सवाल पूछे जाओ, तो इनका रवैया ऐसा हो जाता है मानो कह रहे हों कि ज़्यादा दिक्कत है तो तुम खुद ही पेट्रोल बना लो! जब भी कोई ज़मीनी और कड़ा सवाल सामने आता है, तो गोलमोल बातें करना, धमकी देना और जनता को गुमराह करना ही इनका आखिरी सहारा बचता है। इस पूरे खेल में सबसे बड़ा झोल तो नीति आयोग की उस रिपोर्ट से खुला है जो लीक हुई है। उस लीक रिपोर्ट में साफ-साफ बताया गया था कि किसी भी उपभोक्ता को पूरी तरह से मजबूर नहीं किया जा सकता कि वह सिर्फ ई20 फ्यूल ही खरीदे, क्योंकि हमारे देश में आज भी करोड़ों गाड़ियां ऐसी हैं जो इस ईंधन के काबिल ही नहीं हैं और इसलिए उन्हें शुद्ध पेट्रोल मिलना ही चाहिए। इसके साथ ही रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि जिन लोगों की गाड़ियां ई20 ईंधन के अनुकूल हैं, उन्हें यह पेट्रोल काफी सस्ता मिलना चाहिए। इस पूरे प्लान का लक्ष्य तो साल 2030 तक का रखा गया था, लेकिन फिर भी न जाने किस फायदे के लिए इतनी जल्दीबाजी की गई।
हैरानी की बात यह है कि नीति आयोग की इन अहम शर्तों में से एक भी पूरी नहीं की गई। न तो पुरानी गाड़ियों के लिए शुद्ध पेट्रोल का विकल्प बचा और न ही ई20 फ्यूल लेने वालों को कोई सस्ता दाम मिला, जिससे साफ समझ आता है कि यह किस लेवल का प्री-प्लान्ड खेल था। लोकतंत्र में पत्रकारों का असली काम ही सत्ता से तीखे सवाल पूछना है, और इस इंटरव्यू में मेघा प्रसाद ने बिल्कुल वही किया। इथेनॉल ब्लेंडिंग के नाम पर गाड़ियों के इंजन और आम आदमी के बजट के साथ जो खिलवाड़ हो रहा है, उस पर जवाबदेही तय होनी ही चाहिए। पिछले दस सालों से जो ईमानदारी का चोला ओढ़कर एक फर्जी हाइप बनाई गई थी, वह अब इस एक इंटरव्यू के बाद जनता के सामने पूरी तरह उतर चुकी है।


नदीम अख़्तर-

इस इंटरव्यू की सोशल मीडिया पर बहुत चर्चा है। इससे मुझे ये भान हुआ कि चारों ओर से घेर लिए गए नितिन गड़करी जी का मीडिया मैनेजमेंट बहुत अच्छा है। उन्हें क्राइसिस कम्युनिकेशन की समझ है। ह्यूमन साइकॉलॉजी का ज्ञान है।

इसलिए उन्होंने एक ही इंटरव्यू में लोगों का ग़ुस्सा निकाल दिया। उन्हें गुदगुदाया। मुझे यक़ीन है कि गड़करी जी का ये इंटरव्यू देखकर आपको मज़ा आया होगा। यही इसका मक़सद था। प्रेशर निकल गया। ग़ुस्सा फूट गया। इंटरव्यू में मंत्री जी को घिरा देखकर जनता मुस्कुरा दी। इसे सेफ़्टी वॉल्व मेकानिज्म कहते हैं। अब सब ठीक है। जनता ने देख लिया कि मंत्रीजी जवाबदेह हैं। छिपते नहीं, सामने आकर बोलते हैं। उसके लिए यही एवरेस्ट पर्वत पर विजय है।

इसी इंटरव्यू में एक सवाल के जवाब में गड़करी जी कह देते हैं कि पेट्रोल से जुड़े प्रश्न आप पेट्रेलियम मंत्री से करें। यानी पूरा गेम ही पलट दिया। पेट्रेलियम मंत्री रंदीप पुरी जानें। ये मेरी विभाग थोड़े है। वो जानें कि कितना इथेनॉल मिलाया और क्यों मिलाया। खल्लास।

गड़करी जी को छोड़िए। किसी न्यूज़ चैनल के पत्रकार की मजाल है क्या कि वे बिना पूर्व अनुमति के अयोध्या वाले चंपत राय से ही ऐसे चढ़ के सवाल कर सकें? वरना अब तक तो जहां वे अज्ञातवास में हैं, वहाँ से चैनल वाले कब का Live टेलिकास्ट कर चुके होते। कितनी-कितनी बार।

ये कुछ नहीं कर सकते। बस अभिनय कर सकते हैं। इस अभिनय के मज़े लीजिए।

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