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साहित्य

कैमरे में दर्ज बिहार की पत्रकारिता के एक पूरे दौर के जीवंत दस्तावेज!

Portrait of a man with a mustache wearing a light yellow kurta, standing outdoors with a shoulder bag strap visible.

कुमार कृष्णन-

इतिहास केवल सरकारी अभिलेखों, पुस्तकों और संस्मरणों में ही सुरक्षित नहीं रहता; वह कैमरे की आँख में भी दर्ज होता है। कई बार एक सशक्त छायाचित्र वह सच कह देता है, जिसे हजारों शब्द भी पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पाते। यही कारण है कि फोटो पत्रकारिता को इतिहास की सबसे विश्वसनीय दृश्य-साक्ष्य परंपरा माना जाता है। विशेषकर उस दौर में, जब न डिजिटल कैमरे थे, न मोबाइल फोन और न ही कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित त्वरित छवि-निर्माण की सुविधा। उस समय कैमरे का हर क्लिक सोच-समझकर किया जाता था। हर फ्रेम के पीछे धैर्य, तकनीकी दक्षता, सामाजिक संवेदनशीलता और जोखिम उठाने का साहस छिपा होता था। इसलिए उस युग के छायाचित्र केवल समाचार नहीं, बल्कि समय के जीवंत दस्तावेज़ हैं।

Book cover titled 'The Photo Journalist: A Memoir of Late Rajiv Kant' with a grid collage surrounding a central portrait of Rohit Kant; author name Rohit Kant in yellow.
Grayscale collage poster centered on a portrait of Rohit Kant with many smaller photos around; yellow Hindi text memorializing Bihar-based figure Rajiv Kant and honoring his memory.

इसी दृष्टि से रोहित कांत द्वारा संपादित दो महत्त्वपूर्ण कृतियाँ—’द फोटो जर्नलिस्ट: अ मेमॉयर ऑफ लेट राजीव कांत’ तथा ‘बिहार के छायाकार : स्व. राजीव कांत की छाया स्मृति’—सिर्फ स्मरण-ग्रंथ नहीं हैं, बल्कि बिहार की दृश्य-संस्कृति और पत्रकारिता के इतिहास को संरक्षित करने का गंभीर और दीर्घकालिक प्रयास हैं। ये दोनों पुस्तकें मिलकर एक ऐसे फोटो पत्रकार के जीवन और कृतित्व को सामने लाती हैं, जिसने अपने कैमरे से बिहार के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक इतिहास के अनेक निर्णायक क्षणों को सहेजा।

दोनों पुस्तकों की प्रकृति अलग होते हुए भी वे एक-दूसरे की पूरक हैं। ‘द फोटो जर्नलिस्ट: अ मेमॉयर ऑफ लेट राजीव कांत’ अंग्रेज़ी में प्रकाशित संस्मरणात्मक पुस्तक है, जिसमें राजीव कांत के जीवन, उनके पेशेवर संघर्ष, कार्यशैली और पत्रकारिता के अनुभवों को क्रमबद्ध ढंग से प्रस्तुत किया गया है। दूसरी ओर ‘बिहार के छायाकार : स्व. राजीव कांत की छाया स्मृति’ हिंदी पाठकों के लिए तैयार किया गया एक आत्मीय स्मृति-ग्रंथ है, जिसमें संस्मरणों, टिप्पणियों, दुर्लभ छायाचित्रों और समकालीन पत्रकारों तथा साहित्यकारों के विचारों के माध्यम से राजीव कांत के व्यक्तित्व और योगदान का बहुआयामी चित्र उभरता है। इन दोनों पुस्तकों को साथ पढ़ने पर पाठक केवल एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि बिहार की पत्रकारिता के एक पूरे दौर को समझने लगता है।

राजीव कांत उन विरल फोटो पत्रकारों में थे जिन्होंने कैमरे को केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व का माध्यम माना। लगभग तीन दशकों तक उन्होंने बिहार की बदलती राजनीति, समाज और संस्कृति को अत्यंत संवेदनशील दृष्टि से दर्ज किया। यह वह समय था जब बिहार अनेक बड़े राजनीतिक परिवर्तनों, जनआंदोलनों और सामाजिक उथल-पुथल का साक्षी बन रहा था। संपूर्ण क्रांति आंदोलन की गूँज, लोकतांत्रिक संघर्षों का विस्तार, सामाजिक न्याय की राजनीति का उदय, किसानों और मजदूरों के आंदोलन, सांस्कृतिक आयोजनों की जीवंतता और आम जनजीवन की विविधता—इन सबको राजीव कांत ने अपने कैमरे में अत्यंत ईमानदारी से सुरक्षित किया।

उनके कैमरे के सामने केवल सत्ता के शिखर पर बैठे लोग नहीं थे। निस्संदेह जयप्रकाश नारायण, कर्पूरी ठाकुर, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, चंद्रशेखर, जॉर्ज फर्नांडिस, रामविलास पासवान तथा अनेक राष्ट्रीय नेताओं के दुर्लभ छायाचित्र इन पुस्तकों को ऐतिहासिक महत्त्व प्रदान करते हैं, किंतु उनकी वास्तविक शक्ति इन प्रसिद्ध चेहरों से कहीं आगे दिखाई देती है। राजीव कांत की दृष्टि का केंद्र आम आदमी था। खेतों में श्रम करता किसान, कारखानों में काम करता मजदूर, लोक कलाकारों की जीवंत प्रस्तुतियाँ, विद्यालयों के छात्र, ग्रामीण जीवन की सहजता, गंगा घाटों का आध्यात्मिक वातावरण, मेलों की रंगीन दुनिया, पर्व-त्योहारों की सांस्कृतिक ऊर्जा और बिहार की लोक परंपराएँ—ये सब उनके कैमरे में समान सम्मान और संवेदना के साथ स्थान पाते हैं। यही दृष्टि उन्हें मात्र समाचार छायाकार नहीं, बल्कि समाज का दृश्य इतिहासकार सिद्ध करती है।

इन पुस्तकों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे छायाचित्रों का यांत्रिक संग्रह भर नहीं हैं। प्रत्येक तस्वीर अपने भीतर एक कहानी, एक सामाजिक संदर्भ और एक ऐतिहासिक संकेत समेटे हुए है। अनेक चित्रों को देखते हुए ऐसा अनुभव होता है मानो पाठक किसी पुराने समाचार को नहीं, बल्कि अपने समय को पुनः जी रहा हो। यही किसी भी उत्कृष्ट फोटो पत्रकारिता की पहचान होती है कि वह घटना के क्षणिक महत्व से आगे बढ़कर इतिहास का स्थायी दस्तावेज़ बन जाए।

पुस्तकों का एक और उल्लेखनीय पक्ष उनका संपादकीय विन्यास है। रोहित कांत ने केवल अपने पिता के कार्य का संकलन नहीं किया, बल्कि उसे व्यवस्थित ऐतिहासिक रूप देने का कठिन दायित्व निभाया है। वर्षों से सुरक्षित हजारों नेगेटिवों का डिजिटलीकरण, उनका वर्गीकरण, उपयुक्त छायाचित्रों का चयन, उनके साथ आवश्यक संदर्भ जोड़ना और उन्हें पुस्तकाकार स्वरूप देना अत्यंत श्रमसाध्य कार्य था। विशेष रूप से कोविड-19 महामारी के कठिन समय में इस परियोजना को पूरा करना उनके समर्पण और धैर्य का प्रमाण है। इस प्रयास ने निजी संग्रह को सार्वजनिक सांस्कृतिक धरोहर में बदल दिया है।

‘बिहार के छायाकार : स्व. राजीव कांत की छाया स्मृति’ का एक महत्त्वपूर्ण आयाम यह भी है कि इसमें अनेक पत्रकारों, साहित्यकारों, कलाकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और सहयोगियों के संस्मरण शामिल हैं। इन संस्मरणों के माध्यम से राजीव कांत केवल एक कुशल फोटो पत्रकार नहीं, बल्कि संवेदनशील, विनम्र और मानवीय व्यक्तित्व के रूप में सामने आते हैं। वहीं ‘द फोटो जर्नलिस्ट: अ मेमॉयर ऑफ लेट राजीव कांत’ उनके कार्य को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पाठक वर्ग तक पहुँचाने का सेतु बनती है। इस प्रकार दोनों पुस्तकें मिलकर दृश्य और शब्द—दोनों माध्यमों से एक संपूर्ण व्यक्तित्व की रचना करती हैं।

यद्यपि दोनों कृतियाँ अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं, फिर भी एक समीक्षक की दृष्टि से यह कहा जा सकता है कि यदि प्रत्येक छायाचित्र के साथ थोड़ा और विस्तृत ऐतिहासिक विवरण, तिथि, स्थान तथा घटना की पृष्ठभूमि दी जाती, तो इन पुस्तकों का शोध-मूल्य और भी अधिक बढ़ जाता। कुछ चित्र ऐसे हैं जिनकी ऐतिहासिक महत्ता इतनी गहरी है कि उनके साथ विस्तृत टिप्पणी पाठकों और शोधार्थियों के लिए अतिरिक्त उपयोगी सिद्ध होती। भविष्य के संस्करणों में इस दिशा में विस्तार की पर्याप्त संभावना दिखाई देती है।

आज का समय छवियों की अत्यधिक उपलब्धता का समय है। स्मार्टफोन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने छवि-निर्माण को अत्यंत सरल बना दिया है। प्रतिदिन करोड़ों तस्वीरें बनती और कुछ ही क्षणों में भुला दी जाती हैं। ऐसे समय में राजीव कांत का संपूर्ण कार्य यह याद दिलाता है कि उत्कृष्ट फोटो पत्रकारिता केवल आधुनिक उपकरणों का परिणाम नहीं होती। उसका वास्तविक आधार संवेदनशील दृष्टि, धैर्य, सत्य के प्रति प्रतिबद्धता, सामाजिक सरोकार और सही क्षण को पहचानने की क्षमता है। उन्होंने सनसनी पैदा करने के लिए कैमरा नहीं उठाया; उन्होंने अपने समय का सत्य दर्ज करने के लिए कैमरा उठाया। यही कारण है कि उनके छायाचित्र आज भी जीवंत लगते हैं।

इन दोनों पुस्तकों का महत्व केवल पत्रकारिता तक सीमित नहीं है। इतिहास, समाजशास्त्र, राजनीति विज्ञान, मीडिया अध्ययन, दृश्य-संस्कृति, लोकजीवन और सांस्कृतिक अध्ययन के विद्यार्थियों तथा शोधार्थियों के लिए भी ये समान रूप से उपयोगी संदर्भ-ग्रंथ हैं। बिहार के सामाजिक परिवर्तन, लोकतांत्रिक आंदोलनों और सांस्कृतिक विकास को दृश्य साक्ष्यों के माध्यम से समझने के इच्छुक किसी भी गंभीर पाठक के लिए इन पुस्तकों का अध्ययन अत्यंत महत्त्वपूर्ण सिद्ध होगा।

वस्तुतः ‘द फोटो जर्नलिस्ट: अ मेमॉयर ऑफ लेट राजीव कांत’ और ‘बिहार के छायाकार : स्व. राजीव कांत की छाया स्मृति’ केवल दो पुस्तकें नहीं हैं; वे बिहार की सामूहिक दृश्य-स्मृति का जीवंत अभिलेख हैं। ये कृतियाँ इस बात का प्रमाण हैं कि कैमरा केवल क्षणों को कैद नहीं करता, बल्कि समय, समाज और सभ्यता की स्मृतियों को भी सुरक्षित रखता है। आने वाली पीढ़ियाँ जब बिहार के सामाजिक और राजनीतिक इतिहास को दृश्य साक्ष्यों के आधार पर समझने का प्रयास करेंगी, तब राजीव कांत के कैमरे से दर्ज ये छवियाँ और उन पर आधारित ये दोनों पुस्तकें निश्चय ही विश्वसनीय, प्रामाणिक और अमूल्य स्रोत के रूप में उनके सामने उपस्थित होंगी। यही इन पुस्तकों की सबसे बड़ी उपलब्धि और उनकी स्थायी प्रासंगिकता है।

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