अशोक कुमार पांडेय-
ऑस्ट्रेलिया में पूछा गया कि मोदी जी प्रेस कांफ्रेंस क्यों नहीं करते?
जवाब आया कि भारत में ज़्यादातर लोग ग्रामीण हैं इसलिए सीधे भाषण करते हैं।
तो भइये, प्रेस कांफ्रेंस में पत्रकार कौन सा न्यूटन का सिद्धांत पूछेंगे जिसका जवाब ग्रामीणों को नहीं समझ आयेगा और मोदी जी कौन सा फ्रेंच में जवाब देंगे जो ग्रामीण नहीं समझ पायेंगे?
कीवी पत्रकार : नरेंद्र मोदी प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों नहीं करते?
बाबू: क्योंकि भारत की ज़्यादातर आबादी ग्रामीण है, उन्हें सवाल-जवाब नहीं, सीधे भाषण पसंद हैं।
आज लॉजिक ने भी हाथ जोड़ लिए।
-ऋतु चौधरी
नार्वे की पत्रकार हेले ल्यिंग का ट्वीट-
“तो यह एक दिलचस्प जवाब था। क्या इसका मतलब यह है कि प्रधानमंत्री आमतौर पर टाउन हॉल जैसी बैठकों में लोगों से मिलते हैं और उनकी रोजमर्रा की समस्याओं पर सीधे सवालों के जवाब देते हैं?
मैंने उन्हें ‘कॉकरोच जुंटा पार्टी’ (Cockroach Junta Party), जो एक जमीनी स्तर का आंदोलन बताया जाता है, के साथ सीधे संवाद करते नहीं देखा है।
अगर मैं गलत हूं, तो कृपया मुझे सुधारें।”
पवन खेड़ा-
नौकरशाह उस समय की सरकार के प्रति जवाबदेह होते हैं, इसलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि रुद्रेंद्र टंडन ने विदेश में उस सरकार की आलोचना नहीं की, जिसका वे प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। उनका तर्क भले ही समझा जा सकता हो, लेकिन लोकतांत्रिक दृष्टि से उसका बचाव नहीं किया जा सकता।
कुछ बातें विशेष रूप से ध्यान देने योग्य हैं:
- दुनिया भर का मीडिया प्रधानमंत्री मोदी की चुप्पी पर सवाल उठा रहा है। पहले नॉर्वे और अब न्यूज़ीलैंड में भी इस मुद्दे पर चर्चा हो रही है।
- टंडन जी की टिप्पणी मीडिया—जो लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है—को सरकार की सुविधा का विषय बनाकर पेश करती है। जबकि वास्तविकता यह है कि जनता तक सीधे पहुंच बनाना मीडिया की जवाबदेही और उससे होने वाली सार्वजनिक जवाबदेही का विकल्प नहीं हो सकता।
- अगर इसी तर्क को स्वीकार कर लिया जाए, तो फिर अदालतों को दरकिनार कर एनकाउंटर, भीड़ द्वारा हिंसा (लिंचिंग) या दंगों को भी यह कहकर उचित ठहराया जा सकता है कि सरकार ‘रियल-टाइम न्याय’ में विश्वास करती है।
यह तर्क बेहद कमजोर है और लोकतांत्रिक मूल्यों के स्पष्ट रूप से विपरीत दिखाई देता है।



