ठीक है, राहुल गांधी बताएं किससे मिले – लेकिन पहले सरकार बताए कि PM के दर्जनों विदेश दौरों का पूरा खर्च और agenda अब तक RTI में सार्वजनिक क्यों नहीं हुआ?
-राजनीतिक तड़का (एक्स हैंडल)
मुकेश कुमार-
एक बार फिर राहुल गाँधी विदेश यात्रा पर हैं और एक बार फिर बीजेपी परेशान है। राहुल गाँधी के विदेश जाते ही बीजेपी सवाल करने लगती है कहाँ गए हैं, क्यों गए हैं, किससे मिलेंगे, क्या करेंगे, कहीं मोदी सरकार का तख़्तापलट करने की साज़िश रचने तो नहीं गए?
आख़िर बीजेपी की परेशानी क्या है? उसके लिए ये पता करना बाएँ हाथ का खेल है कि राहुल कहाँ गए हैं और उनके कार्यक्रम क्या हैं। तमाम ख़ुफ़िया एजेंसियां उन पर दिन रात नज़र रखती हैं, उन्हें सब पता होता है। राहुल तो छोड़िए कोई सामान्य नागरिक भी विदेश जाता है तो उसके बारे में सरकार दो मिनट में जानकारी हासिल कर सकती है। ऐसे में बीजेपी इस तरह की नौटंकी क्यों करती है।
ये राहुल के बारे में भ्रम फैलाने का, उनकी छवि ख़राब करने का हथकंडा तो नहीं है? लोगों की नज़रों में उन्हें संदिग्ध बनाने का एजेंडा तो नहीं है? या फिर सचमुच में बीजेपी के अंदर ये डर बैठा हुआ है कि विदेशी ताक़तों की मदद से राहुल गाँधी कभी भी मोदी की सत्ता पलट सकते हैं? अगर ऐसा सोचती है तो क्या इसलिए कि उसका अपने और अपनी सरकार पर भरोसा चुक गया है?
लेकिन परेशानी केवल बीजेपी को ही नहीं है, विपक्षी दलों को भी है। बेशक़ विपक्षी दल बोलते नहीं या दबी ज़ुबान से ये कह देते हैं कि राहुल को देश में रहना चाहिए। लेकिन सच्चाई तो यही है कि उन्हें राहुल का बार-बार विदेश जाना खटकता है। कई बार तो वे बहुत ही नाज़ुक मौक़े पर विदेश निकल जाते हैं। जैसे बिहार चुनाव के ठीक पहले उन्होंने किया था।
तो सवाल उठता है कि कहीं राहुल की यात्राएं विपक्षी मुहिम को नुक़सान तो नहीं पहुँचातीं? थोड़ी हलचल बनती है और वे विदेश कट लेते हैं। इस बार तो उन्हें लखनऊ, पटना और दिल्ली में रैलियाँ करनी थीं मगर वे उन्हें अधर में लटकाकर चले गए। यूपी के चुनाव के लिए भी बहुत कम समय रह गया है और अगर वे नवंबर में हुए तो फिर तो वक़्त बचा ही नहीं।
उधर कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन में आमरण अनशन कर रहे सोनम वांग्चुक की स्थिति नाज़ुक होती जा रही है। उद्धव ठाकरे अपील कर रहे हैं कि राहुल जाएँ और उनका अनशन तुड़वाएं, मगर राहुल होंगे तो जाएंगे….
ये सब जानते हैं कि मोदी-शाह 24X7 की राजनीति करते हैं और उनसे मुक़ाबले के लिए उसी लगन और समर्पण के साथ काम करना होगा। मगर राहुल गाँधी ऐसा करते नहीं दिखते। हालाँकि राहुल ही क्यों कोई भी विपक्षी नेता नहीं कर रहा, मगर राहुल को लेकर सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि वे विपक्ष के नेता हैं और ये बिल्कुल साफ़ है कि राष्ट्रीय स्तर पर उन्हें विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है।
फिर उनकी यात्राओं से पार्टी को भी नुक़सान हो रहा है। वे नई कांग्रेस बनाना चाहते हैं या बना रहे हैं, मगर जिस तरह के श्रम और समय की ज़रूरत है वह कहीं दिख नहीं रहा। और तो और प्रियंका गाँधी भी लापता हैं, अगर वे ही सक्रिय होतीं तो राहुल की कमी उतनी नहीं खटकती।
नफ़रती ज़हरीले “पत्तलकार” पूछ रहे हैं “राहुल गांधी 20 दिन से विदेश में कहाँ है?”
नफ़रत के दुकानदार उनका लोकेशन जान कर क्या करेंगे?
इंदिरा जी की शहादत हुई, राजीव जी की शहादत हुई। क्या अब राहुल जी के जान को खतरे में डालने की कोशिश हो रही ?
प्रधानमंत्री अपनी छुट्टी मनाने विदेश जाते हैं और करोड़ों उड़ाते हैं! वो जनता के पैसे से आता है। और तो और इनलोगों की ज़हर फैलाने की सैलरी भी जनता के पैसे से आती है!
इसलिए सवाल सरकार से होते है, विपक्ष से नहीं!
-प्रियंका भारती, आरजेडी प्रवक्ता


जनार्दन मिश्रा-
विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने UK से आइसलैंड और फिर जर्मनी तक का सफ़र किया है, जिसमें उन्होंने यूरोप में लगभग 1,900 km और फिर 2,400 km की दूरी तय की है।
वे पिछले करीब 16 दिनों से सार्वजनिक रूप से कहीं नज़र नहीं आए हैं।
वे किसी आधिकारिक दौरे पर भी नहीं हैं, यहाँ तक कि कांग्रेस भी उनके ठिकाने के बारे में कोई जानकारी नहीं दे रही है।
क्या वे यूरोप में देश को एक और अशांति में धकेलने की ट्रेनिंग ले रहे हैं?
मैं कोई बढ़ा-चढ़ाकर बात नहीं कह रहा हूँ, बस उनके विदेशी दौरों और उसके बाद हुई उथल-पुथल की टाइमलाइन पर एक नज़र डालिए।



