
नई दिल्ली के प्रतिष्ठित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में मंगलवार शाम एक ऐसी कहानी के नाम रही, जो सिर्फ एक किताब नहीं, बल्कि एक ज़िंदा अनुभव है। वेस्टलैंड बुक्स द्वारा आयोजित इस विशेष समारोह में ‘सम्पा: विश्वास, धैर्य और संकल्प की अनूठी दास्तान’ पुस्तक का भव्य लोकार्पण हुआ। यह एक ऐसी महिला की कहानी है, जो विश्वास, धैर्य और अटूट संकल्प की मिसाल पेश करती है।
कार्यक्रम में साहित्य, मीडिया और समाज के कई प्रमुख चेहरे शामिल हुए, जिन्होंने इस किताब को सिर्फ एक साहित्यिक कृति नहीं, बल्कि एक सामाजिक दस्तावेज़ के रूप में देखा। वक्ताओं ने एक स्वर में इस बात पर ज़ोर दिया कि ‘सम्पा’ आज के समय में महिला सशक्तिकरण की एक बेहद ज़रूरी और प्रासंगिक आवाज़ है।
आजतक एवं इंडिया टुडे टीवी के न्यूज़ डायरेक्टर सुप्रिय प्रसाद ने कहा,“संजीव पालीवाल ने क्राइम फिक्शन की दुनिया से निकलकर एक सच्ची ज़िंदगी की कहानी को शब्द दिए हैं। यह किताब हर लड़की और हर महिला को पढ़नी चाहिए। यह किताब सिर्फ पढ़ने के लिए नहीं है, बल्कि यह हिम्मत देने वाली किताब है—यह एहसास दिलाती है कि साधारण दिखने वाली एक लड़की भी असाधारण संघर्ष कर सकती है और अपने लिए रास्ता बना सकती है।”
इंडिया टुडे टीवी के कंसल्टिंग एडिटर राजदीप सरदेसाई ने बदलते मीडिया परिदृश्य का ज़िक्र करते हुए कहा, “एक समय था जब टेलीविजन पर इंसानी कहानियां प्रमुख होती थीं, लेकिन आज वो कम हो गई हैं। ‘सम्पा’ ऐसी ही एक कहानी है, जो हमें उस दौर की याद दिलाती है। यह सिर्फ किताब तक सीमित नहीं रहनी चाहिए.इसे ओटीटी और बड़े प्लेटफॉर्म पर भी आना चाहिए, ताकि यह प्रेरणा अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचे।”
कार्यक्रम का संचालन करते हुए चर्चित मॉडरेटर ऋचा अनिरुद्ध ने ‘सम्पा’ को एक भावनात्मक अनुभव बताया। उन्होंने कहा कि इस किताब को पढ़ते हुए वे कई बार भीतर तक हिल गईं, लेकिन अंत तक पहुँचते-पहुँचते उनके भीतर एक नई ऊर्जा और साहस का संचार हुआ। उन्होंने ‘सम्पा’ के साहस और लेखकद्वय मीनाक्षी चौधरी एवं संजीव पालीवाल को इस कहानी को सामने लाने के लिए बधाई दी।
लेखिका मीनाक्षी चौधरी ने अपने पहले लेखन अनुभव को साझा करते हुए कहा, “यह मेरी पहली पुस्तक है और इसे लिखना मेरे लिए एक भावनात्मक यात्रा रही। मैंने इसे अपने छात्रों को भी पढ़ने के लिए कहा है, क्योंकि यह उन्हें सिखाएगी कि परिस्थितियाँ चाहे जितनी कठिन हों, अगर साहस है तो रास्ता जरूर निकलता है।”
वहीं लेखक संजीव पालीवाल ने कहा, “क्राइम फिक्शन से बाहर निकलकर वास्तविक जीवन की इस कहानी को लिखना मेरे लिए एक अलग और गहरा अनुभव रहा। यह किताब हर उस महिला को समर्पित है, जो विपरीत परिस्थितियों से लड़ते हुए अपने लिए रास्ता बनाती है। इस कहानी को सामने लाना जरूरी था, क्योंकि यह सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि एक सोच है—एक प्रेरणा है।”
इस मौक़े पर सम्पा आर्या ने बेहद भावुक शब्दों में अपनी बात रखी। उन्होंने कहा, “यह किताब मेरी ज़िंदगी के उन पलों का दस्तावेज़ है, जिन्हें मैंने जिया है। यह सिर्फ मेरी कहानी नहीं है, यह हर उस स्त्री की कहानी है, जो हर दिन संघर्ष करती है, गिरती है, फिर उठती है और आगे बढ़ती रहती है।”
वेस्टलैंड बुक्स की भाषाई इकाई, एकदा, की प्रकाशक मिनाक्षी ठाकुर ने कहा, “यह रोमांच और संघर्ष की गाथा की तरह लिखी यह सच्ची घटना है—एक स्त्री की कहानी, जिसने सरकारी तंत्र से टकराकर अपने पति को बचाने का संकल्प लिया, जब उसका जहाज़ सोमाली समुद्री डाकुओं द्वारा अपहृत कर लिया गया था। यह दर्शाता है कि आज भी हमारे बीच सावित्री जैसी महिलाएँ मौजूद हैं, जो अपने सत्यवान को मृत्यु के पंजों से वापस लाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती हैं।”
कार्यक्रम का संचालन पल्लवी सिंह ने किया। इस अवसर पर प्रो. संगीत रागी, शाज़ी ज़मा, अजीत अंजुम, आशुतोष, मिलिंद खांडेकर, गीता श्री, डॉ. सुनीता, वंदना वाजपेयी, रश्मि भारद्वाज, अमिताभ, नीरज गुप्ता, इकबाल रिज़वी, नीरज कुमार, अतुल अग्रवाल, पंकज भार्गव, अज़हर इकबाल, आलोक श्रीवास्तव, आलोक त्रिवेदी, आशुतोष अग्रिनहोत्री, राजीव कुमार और अकु श्रीवास्तव सहित साहित्य और पत्रकारिता जगत की अनेक हस्तियाँ उपस्थित रहीं।
यह आयोजन केवल एक पुस्तक विमोचन नहीं, बल्कि एक विचार, एक अनुभव और एक प्रेरणा का उत्सव बन गया—जहाँ ‘सम्पा’ सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि साहस का पर्याय बनकर उभरी।
पुस्तक का सार: हकीकत से जन्मी एक प्रेरक दास्तान
एक दिन ‘सम्पा’ का संसार थम गया।
हज़ारों किलोमीटर दूर समुद्र के बीच एक जहाज़ का अपहरण हो गया। उसके साथ बंधक बना लिया गया उसका अपना जीवन, उसकी उम्मीदें, उसका भविष्य।
- वह कोई नेता नहीं थी।
- कोई प्रभावशाली हस्ती नहीं थी।
- बस एक छोटे शहर की साधारण-सी महिला थी।
लेकिन जब पूरी दुनिया ने उसे असहाय समझा, उसने एक ऐसी लड़ाई शुरू की जिसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की थी।
समुद्री अपहरणकर्ताओं, सत्ता के गलियारों, अनगिनत बंद दरवाज़ों और टूटती उम्मीदों के बीच उसने हार मानने से इनकार कर दिया।
- यह कहानी है उस साहस की, जो डर से बड़ा था।
- उस विश्वास की, जो निराशा से मजबूत था।
- और उस संकल्प की, जिसने असंभव को चुनौती देने की हिम्मत की।
एक ऐसी सत्य घटना, जो किसी उपन्यास से अधिक रोमांचक, किसी फिल्म से अधिक भावनात्मक और किसी आंदोलन से अधिक प्रेरणादायक है।
कभी-कभी इतिहास बड़े लोगों द्वारा नहीं, बल्कि एक आम इंसान के असाधारण साहस द्वारा लिखा जाता है।



