राकेश कायस्थ-
अगर आप सोच रहे हैं कि सांप्रदायिक विभाजन ही मोदी युग की सबसे बड़ी उपलब्धि है तो आप गलत हैं। करदाताओं के पैसों की लूट के मामले में भी इस दौर में रोज नये रिकॉर्ड बन रहे हैं। उखड़ती सड़कें, गड्ढों वाले साल भर पुराने हाइवे और नदी में छलांग लगाते पुल चीख-चीखकर ये बता रहे हैं, लूट दोनों हाथों से मची है।
लूट के मामले में बीजेपी शासित राज्य सरकारें केंद्र के साथ कदमताल कर रही हैं। दो महीने की मेहनत के बाद तैयार की गई न्यूज़ लाउंड्री की रिपोर्ट एक ऐसी खबर लेकर आई है कि आपके दिमाग का फ्यूज उड़ जाएगा।
उत्तराखंड सरकार ने 100 करोड़ रुपये खर्च करके ग्लोबल इनवेस्टर्स समिट किया। इसके बाद ये दावा किया गया कि साढ़े तीन लाख करोड़ रुपये के MOU साइन हो चुके हैं और उनमें लगभग एक लाख करोड़ रुपये राज्य में आ भी चुके हैं। आरटीआई में आवेदन डालकर जब कंपनियों के डीटेल मांगे गये तो विकास की नई कहानी सामने आई।
देहरादून में चलने वाली कई आटा चक्की मालिकों और खाद बीज के छोटे दुकानदारों के नाम इनवेस्टर्स के रूप में दर्ज हैं। अनगित ऐसे छोटे धंधों के नाम भी लिखे हैं, जो किसी तरह घिसटकर चल रहे हैं या बंद हो चुके हैं। इनमें से ज्यादातर धंधा चलाने वालों को पता ही नहीं है कि उत्तराखंड सरकार की मेहरबानी सो वो रातो-रात ग्लोबल इनवेस्टर बन चुके हैं। साठ साल पुराने एक ऐसे एनजीओ का नाम है, जो CSR फंडिंग से अपनी नई इमारत बनवा रहा है। उस फंडिंग को भी इनवेस्टमेंट के तौर पर दिखाया गया है और एनजीओ को पता तक नहीं है।
जब ये पूछा गया कि हज़ारों करोड़ के एमओयू किन बड़ी कंपनियों के साथ हुए हैं, तो उत्तराखंड सरकार का जवाब है कि गोपनीयता जरूरी है, इसलिए हम नाम नहीं बता रहे हैं। नाम बताएंगे तो कोई और राज्य प्रोजेक्ट अपने यहां ले जाएगा। करदाताओं के सौ करोड़ रुपये के सदुपयोग पर न्यूज़ लाउंड्री की पूरी रिपोर्ट साझा कर रहा हूं। देखिये और तय कीजिये कि मोदी युग ने ज्यादा बड़ी लकीर कहां खीची है, समाज को विभाजित करने में या फिर करदाताओं के खून पसीने गाढ़ी कमाई लूटने में।
उत्तराखंड ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट के निवेश दावों पर सवाल, खोजी रिपोर्ट में ‘ग्राउंडेड इन्वेस्टमेंट’ के आंकड़ों पर उठे गंभीर प्रश्न
उत्तराखंड सरकार की बहुचर्चित ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट 2023 के निवेश दावों पर एक खोजी रिपोर्ट ने कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि सरकार द्वारा निवेश और ‘ग्राउंडेड इन्वेस्टमेंट’ के जो आंकड़े पेश किए गए, उनमें कई ऐसी प्रविष्टियां शामिल हैं जिन्हें निजी निवेश मानना विवादित हो सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 दिसंबर 2023 को ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट के उद्घाटन के दौरान उत्तराखंड को निवेश का नया केंद्र बनने की बात कही थी। इसके बाद राज्य सरकार ने दावा किया कि समिट में 3 लाख 56 हजार 889 करोड़ रुपये के 1779 एमओयू पर हस्ताक्षर हुए।
सरकार ने बाद में यह भी कहा कि इन एमओयू के आधार पर एक लाख करोड़ रुपये से अधिक का निवेश ‘ग्राउंड’ हो चुका है, यानी जिन परियोजनाओं पर निवेश का समझौता हुआ था, उनमें काम शुरू हो गया है।
हालांकि, खोजी रिपोर्ट में आरटीआई के जरिए प्राप्त दस्तावेजों का हवाला देते हुए दावा किया गया है कि ‘ग्राउंडेड इन्वेस्टमेंट’ की सूची में 3300 से अधिक संस्थाओं और व्यक्तियों के नाम दर्ज हैं, जबकि एमओयू की संख्या 1779 बताई गई थी। रिपोर्ट में इसे पहला बड़ा विरोधाभास बताया गया है।
रिपोर्ट में यह भी आरोप लगाया गया है कि सरकार ने निवेश की गणना के लिए ऐसा तरीका अपनाया, जिसमें आटा चक्कियों, खाद-बीज की दुकानों, गैर-सरकारी संस्थाओं और यहां तक कि सरकारी उपक्रमों को भी निवेश की सूची में शामिल कर लिया गया। रिपोर्ट के अनुसार, कई मामलों में सरकारी खर्च को भी निजी निवेश (प्राइवेट कैपिटल) के रूप में दर्शाया गया।
खोजी रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि कुछ ऐसे व्यवसायों को ‘ग्राउंडेड इन्वेस्टमेंट’ का हिस्सा दिखाया गया, जिन्हें स्वयं इसकी जानकारी नहीं थी। वहीं कुछ ऐसी परियोजनाएं भी सूची में शामिल बताई गईं जिन पर अभी काम शुरू ही नहीं हुआ।
रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि यह समूचे एक लाख करोड़ रुपये के निवेश दावे का ऑडिट नहीं है, बल्कि कुछ चुनिंदा मामलों की पड़ताल के आधार पर तैयार की गई खोजी रिपोर्ट है। रिपोर्ट के अनुसार, जांच में सामने आए तथ्यों से निवेश के सरकारी दावों की पारदर्शिता और सत्यापन प्रक्रिया पर सवाल खड़े होते हैं।



