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मोदी राज में पत्रकारों की विश्वसनीयता इतनी गिरा दी गई कि उन्हें ‘बिचौलिया’ तक कहा जाने लगा है!

संजय सिन्हा

संजय सिन्हा-

बात रफ़ू से आगे की है, अब पैबंद लगाना पड़ रहा है। अब अगर आपको कोई गंवार कहे तो बुरा मत मानिएगा। आपको गंवार कहा गया है और हमें बिचौलिया।

बात अभी प्रधान मंत्री जब न्यूजीलैंड गए थे, तब की है। वहां से आई एक खबर मन में शूल की तरह चुभी पड़ी है। आखिर ये मेरे पूर्व पेशे से जुड़ी बात है, जहां मैंने जीवन के 32 वर्ष खर्च किए हैं।

खबर न्यूज़ीलैंड से आई है। भेड़ों के उस देश से, जहां भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आधिकारिक यात्रा के दौरान एक विदेशी पत्रकार ने वह सवाल पूछ लिया, जिसे भारत के पत्रकार वर्षों से नहीं पूछ रहे हैं।

सवाल था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पत्रकारों के साथ प्रेस कॉन्फ़्रेंस क्यों नहीं करते हैं?

जवाब भारत सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने दिया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी एक विशुद्ध भारतीय राजनेता हैं। भारतीय राजनेता अपने मतदाताओं से सीधे संवाद करते हैं। और भारत का अधिकांश मतदाता ग्रामीण इलाकों में रहता है। उन्हें बिचौलियों के माध्यम से बात पहुंचाना पसंद नहीं है।

रुकिए। इस बयान का सबसे दिलचस्प हिस्सा क्या था?

‘बिचौलिया’।

अब यह शब्द किसके लिए इस्तेमाल हुआ, इसका निर्णय आप स्वयं कीजिए। लेकिन इतना तो तय है कि जब कहा जाता है कि प्रधानमंत्री बिचौलियों के माध्यम से जनता से बात नहीं करते, तो लोकतंत्र में वर्षों से संवाद का जो पारंपरिक माध्यम रहा है, उस पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा हो जाता है। और साथ ही प्रश्न खड़ा होता है एक पूरे पेशे पर, जिसे आज के मीडिया वालों ने पतन में जाने दिया है।

पत्रकारिता का पूरा दर्शन ही इस विचार पर टिका था कि पत्रकार सत्ता और जनता के बीच पुल होता है।

पत्रकार सवाल पूछता है, जवाब लेकर आता है और जनता तक पहुंचाता है। लेकिन अगर अब यह मान लिया गया है कि जनता तक पहुंचने के लिए पत्रकार की आवश्यकता ही नहीं रही, तो फिर पत्रकार की भूमिका क्या बची? मुर्गा लड़ाऊ खेल दिखाना?

सोचिए। सोशल मीडिया है। ‘मन की बात’ है। एक्स है। फेसबुक है। यूट्यूब है। लाइव प्रसारण है। करोड़ों लोगों तक बिना किसी संपादक और बिना किसी रिपोर्टर के पहुंचने की व्यवस्था है। ऐसे में सरकार यह मानती हो कि उसे किसी ‘बिचौलिए’ की आवश्यकता नहीं, तो यह उसकी संचार रणनीति हो सकती है।

आज सवाल पत्रकारों से है।

क्या उन्होंने अपनी विश्वसनीयता इस स्तर तक गिरने दी कि आज उन्हें लोकतांत्रिक संवाद का आवश्यक माध्यम नहीं, बल्कि ‘बिचौलिया’ मान लिया जाए?

बिचौलिया का अर्थ समझते हैं न आप?

मैं वर्षों तक पत्रकार रहा हूं। मैंने जीवन इस पेशा में बिताया है। हमें सिखाया गया कि पत्रकार किसी का एजेंट नहीं होता। सरकार का भी नहीं, विपक्ष का भी नहीं। उसका काम सिर्फ जनता के सवाल सत्ता तक पहुंचाना और सत्ता के जवाब जनता तक लाना होता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में तस्वीर ही बदल गई है।

किसी ने पत्रकारिता को विचारधारा बना दिया। किसी ने कारोबार बना दिया। किसी ने उसे सत्ता का विस्तार बना दिया। किसी ने विपक्ष का मंच बना दिया। और फिर नेता ने तय कर लिया कि अब बिचौलियों को हटा देगी।

स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि अब सरकारी अधिकारी कह रहे हैं कि पत्रकार तो बिचौलिए होते हैं। प्रधान मंत्री को ‘बिचौलिए’ नहीं चाहिए।

ये गंभीर समय है कि पत्रकारिता नामक पेशा अपने भीतर झांके। उसे पत्तलकार कहा गया। प्रेस्टीट्यूट कहा गया। दलाल कहा गया। अब बिचौलिया। और कहने वाला कौन? वो भी पीएम के नाम पर? दम तो देखिए। वो न्यूजीलैंड में एक विदेशी पत्रकार से भारतीय पत्रकारों को बिचौलिया कह रहा है।

पहले नेता मुंहफट होते थे। अब तो ब्ययूरोक्रेट आइना दिखला रहे हैं। देख लीजिए पत्रकार बिरादरी ने अपना क्या हाल बना लिया है।

मुझे इतनी खुशी होने लगी है कि समय रहते मेरी मुख्यधारा की पत्रकारिता छूट गई।

कई लोगों ने पूछते हैं कि संजय सिन्हा आप जिस पेशे में इतने साल रहे उससे इतनी दूरी क्यों?

मेरा जवाब आज इतना ही है कि मुझे अपने पेशे से प्रेम था, उसकी गिरती हुई साख से नहीं। कम से कम जब मैं उसे बचा नहीं सकता, तब तो बिल्कुल नहीं।

ऐसे में जब कोई पत्रकार प्रेस कॉन्फ़्रेंस न होने की शिकायत करता है, तो पहले उसे यह सोचना चाहिए कि क्या उसने अपने पेशे का वह सम्मान बचाकर रखा है? उसने ऐसा कुछ किया है जिसके कारण सत्ता उसे अनदेखा न कर सके?

लोकतंत्र में स्वतंत्र पत्रकारिता की जरूरत हमेशा रहेगी। राजतंत्र में नहीं।

स्वतंत्र पत्रकारिता और सत्ता के इर्द-गिर्द घूमती पत्रकारिता में बहुत अंतर होता है। आज सवाल मोदी का नहीं है। सवाल पत्रकारिता का है।

यदि चौथा स्तंभ स्वयं अपने भीतर इतनी दरारें पैदा कर ले कि लोग दीवार छोड़कर सीधे छत पर चढ़ने लगें, तो दोष केवल उन लोगों का नहीं होता जिन्होंने सीढ़ी बदल ली। जिम्मेदारी उस स्तंभ की भी होती है जिसने अपनी मजबूती खो दी।

पहले तो मीडिया अपनी बदनामी के फटे पर रफ़ू कर लेता था। लेकिन अब रफ़ू का समय निकल चुका है। अब तो पैबंद लगाने की नौबत आ गई है।

लोकतंत्र में किसी भी पेशे के लिए इससे बड़ी चेतावनी (गाली) शायद ही कोई हो सकती है। खुले में कहा गया कि भारत के प्रधान मंत्री बिचौलियों पर यकीन नहीं करते।

भारत के सभी बिचौलियों डूब मरो। यही दिन देखना रह गया था?

लो जोड़ लो अपनी तारीफ में एक नई गाली- बिचौलिया। बिचौलिया की क्या इज्जत होती है, ये कौन नहीं जानता?

सहो। जो बोए अब काटते रहो। मैं तो आजाद हूं उस गाली से।

नोट– वैसे विदेश मंत्रालय के फलाने अधिकारी ने लगे हाथ भारत की जनता को भी मूर्ख करार दे दिया है। भारत की जनता गंवार है और वो प्रेस का अर्थ नहीं समझती। उसे जरूरत ही नहीं है मीडिया मैन की। वो मन की बात सुन कर मन ही मन खुश हो लेती है।

नोट– बहुत पहले राजीव गांधी के समय कहा गया था कि भारत सांप और संपेरों का देश है। अब भारत गंवारों का देश है।

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