विकास मिश्रा-
तीस साल पुराना और आत्मीय साथी संजय दीक्षित अचानक ही इस दुनिया को अलविदा कह गया। जनवरी 1996 में लखनऊ में संजय दीक्षित से मुलाकात हुई थी। तब मैं विचार मीमांसा पत्रिका का उत्तर प्रदेश ब्यूरो चीफ था। पत्रकारिता में मैं भी नया था और संजय भी। उम्र में संजय मुझसे कुछ महीने बड़ा था। स्वभाव में एक अकड़ थी, जो मैं मानता था कि थोड़ा बहुत पत्रकारों में होनी भी चाहिए।
विचार मीमांसा पत्रिका के हर अंक में एक जनप्रतिनिधि के बारे में उसकी पूरी कुंडली खोल दी जाती थी। संजय दीक्षित और आलोक गुप्ता को मैंने उत्तराखंड भेजा था और रिपोर्ट तैयार हुई थी सतपाल महाराज पर। शीर्षक था- भगवान या शैतान। कवरेज इतनी डीप थी कि सतपाल महाराज के पिताजी ने अपना लोटा किसके यहां गिरवी रखा था, उसका भी इंटरव्यू छपा था। सतपाल महाराज के विरोधी भुवन चंद्र खंडूरी का इंटरव्यू भी था। महाराज जी के शिष्यों ने संजय दीक्षित और आलोक गुप्ता के खिलाफ 1 करोड़ 2 लाख रुपये की मानहानि का मुकदमा भी किया था।
सतपाल महाराज पर उस अंक का हाल यह था कि 15 रुपये की पत्रिका ब्लैक में 50 रुपये से लेकर 100 रुपये तक में बिकी। उस रिपोर्ट की फोटो कापियां खूब बंटीं। तब उत्तर प्रदेश का विभाजन नहीं हुआ था। 1996 के विधानसभा चुनाव में उत्तराखंड में बीजेपी ने एक तरह से क्लीन स्वीप किया था। जितने भी विधायक जीतकर आए थे, सभी विचार मीमांसा के कायल थे। संजय दीक्षित को सलाम करते थे। उसी समय जीतकर पहुंचे थे डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक भी। जो उत्तरांचल विकास मंत्री बने और बाद में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री भी। उनसे भी संजय के अच्छे संबंध थे।
1997 में विचार मीमांसा बंद हो गई थी। पत्रिका प्रकाशन की उम्मीद थी, लेकिन तनख्वाह बंद थी। फाकामस्ती के दिन थे। दिल्ली ब्यूरो में हम और संजय थे। वहां सतपाल महाराज वाले अंक की 300 प्रतियां पड़ी थीं, जो कहीं से वापसी में आई थीं। संजय ने भुवन चंद्र खंडूरी से पूछा- क्या आपको सतपाल महाराज वाले अंक की जरूरत है..? खंडूरी ने कहा- जितनी भी है, भेज दीजिए। उन्होंने कार भेजी और साढ़े चार हजार रुपये भी। इस तरह कुछ दिन का जुगाड़ हो गया।
विचार मीमांसा में हमारी टीम के चार मुख्य साथी थे। मैं, संजय दीक्षित, आलोक गुप्ता और फोटोग्राफर ज्ञान प्रकाश। लखनऊ में जब हम लोग 1997 में संघर्ष कर रहे थे, तब दिन भर काम में लगे रहते। रात में बढ़िया खाना बनता। राशन की चिंता थी नहीं, क्योंकि वह मेरे गांव से आता था। रात में हम लोग गाते- हम होंगे, कामयाब, हम होंगे कामयाब एक दिन..। फिर सो जाते और सुबह फिर संघर्ष की राह पर।
आखिरकार पत्रिका बंद हो गई। सभी लोगों ने अलग-अलग दिशा पकड़ी। आलोक गुप्ता सहारा समय में चला गया। मैं मेरठ अमर उजाला में चला गया, ज्ञान को भी मैंने अमर उजाला लखनऊ में सेट करवा दिया। संजय दीक्षित दैनिक जागरण की पत्रिका जागरण उदय में आ गया। करीब दो साल बाद संजय ने जागरण उदय भी छोड़ दिया।
संजय दीक्षित में प्रतिभा कूट कूटकर भरी थी। काम का जुनून था उसमें। न तो टैलेंट में कमी थी और न ही कमिटमेंट में। दिक्कत उसके व्यवहार में थी। एक अकड़ थी, जो समय के साथ बढ़ती ही गई। अक्सर उसकी किसी से ठन जाती। किसी भी संस्थान की नीतियों के खांचे में वह फिट नहीं बैठता था। कारपोरेट मीडिया हाउसेज में न तो वह जाना चाहता था और न ही वहां से बुलावा था। कई संस्थानों में नौकरी की और कुछ दिन बाद छोड़ दिया। बहुत दिनों तक हिंदुस्तान समाचार में रहा। खबरें उसके पास बहुत बड़ी- बड़ी रहती थीं, जिन्हें वह बाकी रिपोर्टर्स में बांटता रहता था। दिल्ली के रिपोर्टर्स में वह ‘गुरुजी’ के नाम से विख्यात था। पिछले कुछ बरसों से बीजेपी नेता डॉ. विजय सोनकर शास्त्री की पत्रिका दलित आंदोलन के संपादक के तौर पर जुड़ा था।


संजय जीवन में कुछ बड़ा करना चाहता था। अपना हेलिकॉप्टर का सपना वह लखनऊ में देखता था, जब उसकी तनख्वाह ढाई हजार रुपये थी। जब भी मिलता था, बोलता- स्वामी हेलिकॉप्टर तो अपना आना ही है। असलियत यह होती थी कि जेब में 500 रुपये हैं भी या नहीं, इसका भी ठिकाना नहीं। इसी नाते परिचितों के बीच संजय का नाम पड़ा- भौकाली। विचार मीमांसा बंद होने के बाद संजय ने एक कंपनी बनाई थी-एवीएस इंडिया प्राइवेट लिमिटेड। ए फॉर आलोक, वी फॉर विकास और एस फॉर संजय। हालांकि बिना कुछ काम किए ही कंपनी बंद कर दी गई।
संजय ने दिल्ली के मयूर बिहार फेज-2 में एक कमरा लिया था। उसका किराया सन 2000 में भी 1500 रुपये था और 2026 में भी। मकान मालिक भी दिलदार था। क्योंकि मैं जानता हूं कि 26 साल में संजय ने 15 साल से ज्यादा का किराया दिया भी नहीं होगा।
वह अभाव में रहता था, लेकिन उसकी अकड़ कम नहीं होती थी। उसके चेले भी कभी कम नहीं रहे। उसके कमरे पर बड़े पत्रकार, नेता, व्यवसायी आते थे तो रिक्शेवाले, चाय वाले, पान वाले, धोबी भी बेखटके आते थे। समझौता उसके शब्दकोश में नहीं था। एक खास ब्रांड का जूता पहनता था। जूता भले ही फट जाए, सोल टूट जाए, लेकिन जब तक उसी ब्रांड का जूता खरीदने का पैसा नहीं हो जाता था, वह नये जूते नहीं खरीदता था।
संजय जीवन में बहुत बड़ा करना चाहता था, लेकिन उसका पहला कदम क्या हो, इसका ख्याल उसे कभी नहीं था। वह रातोंरात कामयाबी के आसमान पर पहुंचना चाहता था। उसके कई केंद्रीय मंत्रियों, कुछ मुख्यमंत्रियों से बहुत अच्छे रिश्ते थे, लेकिन कभी कुछ अपने लिए कह नहीं पाता था। वह परम राष्ट्रवादी था। आरएसएस के कई नेताओं से भी उसके अच्छे संबंध हैं।
मैं जानता हूं ऐसे कई मंत्रियों को, जिनके एक फोन से किसी बड़े मीडिया हाउस में एंट्री मिल सकती है, लेकिन संजय ने किसी से कहा नहीं। इसके पीछे उसका स्वाभिमान नहीं था, बस वही अकड़ थी। उसके इसी स्वभाव के चलते उसके करीबी मित्र हमेशा दबाव में रहते थे, क्योंकि संजय दीक्षित अगर अभाव में हुए तो दवाब उनके साथियों पर ही पड़ता था। संजय अगर किसी से उधार के नाम पर पैसा मांगता था, तो उसमें कहीं मजबूरी भाव नहीं होता था, मुझे तो सीधा कहता था- स्वामी जरा अकाउंट में इतने पैसे भेज दो..। इसके बाद फोन कट। उसके इस स्वभाव के चलते उसके कई साथी उसको फोन मिलाने से हिचकते थे।
55 पार की उम्र में करियर का डांवाडोल रहना संजय को पीड़ित करता था। वह हार मानने वालों में से नहीं था। लगा था कुछ बड़ा करने में। शादी भी उसकी देर में हुई थी, एक बेटी भी है। जो अभी 13 साल की होगी। पत्नी का स्वभाव भी बहुत अच्छा है, वरना संजय दीक्षित जैसे पति को झेल पाना आसान बात नहीं है।
संजय दीक्षित का वर्तमान उसके सपनों से हमेशा बहुत दूर रहा। कुछ व्यसनों ने भी इसकी वजह से उसकी जिंदगी में जगह बना ली। वह दिखता तो हट्टा कट्ठा था, लेकिन अंदर कुछ गड़बड़ चल रही थी। लखनऊ में अचानक उसे खून की उल्टियां होने लगी थीं। कल भी यही हुआ। खून की उल्टी हुई, सिविल अस्पताल लाया गया, लेकिन बीच रास्ते में ही संजय की सांसें टूट गईं।
1997 में जब हम और संजय दिल्ली में थे तो मोटरसाइकिल से कहीं जा रहे थे। एक जगह रुके। कुछ देर बाद फिर बाइक स्टार्ट हुई और आगे बढ़े। पीछे से कोई आवाज नहीं आ रही थी, मैंने सोचा कि भौकाली इतने देर से चुप कैसे है। देखा तो वह था ही नहीं। मोबाइल का जमाना नहीं था कि फोन करके वह बता पाता कि पीछे छूट गया है। खैर मैंने फिर बाइक पीछे की तरफ घुमाई। संजय मिला। देखते ही हंसने लगा-स्वामी आप तो मुझे छोड़ ही गए।
29 साल बाद फिर मंजर वैसा ही है। संजय हम सबको छोड़कर चला गया है। हमेशा के लिए। ईश्वर उसकी आत्मा को शांति दें। परिवार को दुखों का यह भाव वहन करने की क्षमता भी दें।



