तरुण तेजपाल का राजनीति का शिकार होना भी आज सबसे बड़ी खबर हो सकती थी। दैनिक भास्कर का आज का विवरण उस समय की फंसाने वाली खबरों के मुकाबले काफी हल्का और कमजोर लगता है। कोर्ट ने पहले तो बरी कर ही दिया था। एडिटर्स गिल्ड क्या कर रहा है उसका क्या पक्ष है? एडिटर्स गिल्ड को फंसाने और परेशान करने की कहानी अलग है।
संजय कुमार सिंह
आज हिन्दी के मेरे चार अखबारों में दो की लीड बाकी दो अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है। अंग्रेजी में यह खबर हिन्दुस्तान टाइम्स और द टेलीग्राफ में क्रम से लीड और सेकेंड लीड है। इंडियन एक्सप्रेस में यह पहले पन्ने पर दो कॉलम की खबर है। कुल मिलाकर, हुआ यह है कि राज्यसभा के सभापति सीपी राधाकृष्णन ने केंद्रीय संसदीय मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू से कहा कि वे विपक्ष की भावनाएं केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह तक पहुंचा दें। यह एक ऐसी टिप्पणी है जो पहले कभी नहीं सुनी गई और अगर की गई हो तो याद नहीं है। भविष्य में भी ऐसी कोई टिप्पणी की जाएगी इसकी संभावना नहीं लगती है। ऐसे में यह निश्चित रूप से आज की लीड होनी चाहिए। अगर किसी खास किस्म के संपादकीय विवेक या दूसरी किसी विशेष खबर के कारण इसे लीड नहीं बनाया गया तो भी यह पहले पन्ने की खबर तो है ही। हालांकि, देश में जब यह अपेक्षा की जा रही है कि प्रधानमंत्री को गाली नहीं दी जानी चाहिए और गाली देने वाली बच्ची के माफी मांग लेने से बहुतों को संतुष्टि मिली तब महात्मा गांधी से लेकर पूर्व प्रधानमंत्रियों और विपक्ष के नेता तक को गाली देना आम है। कहने की जरूरत नहीं है कि प्रधानमंत्री की गाली बाजी और गालीबाजों को संरक्षण देने तथा घोषित रूप से फॉलो करने के कारण बच्चों ने गाली सीखी हो तो उसका पता कभी नहीं चलेगा। फिर भी गाली देना अपराध है तो महात्मा गांधी को गाली देने वालों के खिलाफ देश, समाज और कानून का रुख क्यों अलग है। अगर ऐसा है तो यह खबरों के चयन में भी होगा और अक्सर दिखाई देता है। हालत यह है कि पश्चिम बंगाल की नई चुनी गई भाजपा सरकार ने हाल में गुंडा विरोधी ‘अधिनियम’ पास किया था। इस अधिनियम की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली दो याचिकाएं गए महीने हाईकोर्ट में पेश की गई थीं। अदालत ने राज्य सरकार से कहा था कि 6 अगस्त तक बताएं कि प्रस्तावित कानून की क्या स्थिति है। राज्य सरकार ने गुरुवार को हाईकोर्ट में कहा कि ये अधिनियम अभी राज्य में लागू नहीं हुए हैं। द टेलीग्राफ में आज यह खबर लीड है। सेकेंड लीड का शीर्षक है, अनुपस्थिति इतना कुछ कह रही थी कि राज्यसभा सभापति को भी कहना पड़ा (Absence so telling that it moves RS Chairman)। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर चार कॉलम की लीड है। शीर्षक है, विपक्ष की भावनाएँ अमित शाह तक पहुंचाएं : उपराष्ट्रपति (किरेन) रिजिजू से (Echo Oppn’s sentiments to Amit Shah: V-P to Rijiju)। इंडियन एक्सप्रेस में दो कॉलम की इस खबर का शीर्षक है, राज्यसभा के सभापति ने सरकार से कहा, सदन में अमतिशाह की उपस्थिति के लिए विपक्ष के आग्रह पर विचार करें।

इंडियन एक्सप्रेस के इस शीर्षक को पढ़कर यह बताना जरूरी लगता है कि हिन्दुस्तान टाइम्स ने उपराष्ट्रपति के कहे को इस तरह हाईलाइट किया है, “राज्यसभा के सभापति की सलाह – “मैं आपसे [किरेन रिजिजू] अनुरोध करता हूँ कि आप उनके [मल्लिकार्जुन खड़गे के] अनुरोध पर विचार करें। उन्होंने गृह मंत्री से सदन में आने का अनुरोध किया था… संसदीय कार्य मंत्री के तौर पर, आप विपक्ष की भावनाओं को गृह मंत्री तक पहुँचा सकते हैं” – सीपी राधाकृष्णन, राज्यसभा चेयरमैन। देशबन्धु की लीड का शीर्षक राज्य सभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे का यह बयान है, सदन में गतिरोध के लिए सत्तापक्ष जिम्मेदार। उपशीर्षक है, राज्यसभा में विपक्ष के नेता ने कहा प्रधानमंत्री व गृहमंत्री सदन में आकर बयान दें। अमर उजाला में भी यह खबर लीड है। हालांकि, राज्यसभा के सभापति की बात उपशीर्षक में है और शीर्षक जो है वह खबर कम, मन की बात (पता नहीं किसके) ज्यादा लगता है। खबर इस प्रकार है, मौजूदा मानसून सत्र में महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन बिल को पारित कराने के लिए केंद्र सरकार अपनी अंतिम कोशिशों में जुट गई है। संसद में जारी गतिरोध खत्म करने के लिए संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजिजू ने तीन दिन में तीसरी बार लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से बात कर मनाने का प्रयास किया। सूत्रों के अनुसार, नीट पेपर लीक आंदोलन में बल प्रयोग (बर्बरता लिखना चाहिए) पर गृह मंत्री अमित शाह संसद में बयान दे सकते हैं, जिसके बाद गतिरोध खत्म होने की उम्मीद है। हालांकि, राहुल ने पुरानी शर्तों को दोहराते हुए इस मसले पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की सलाह दी है। वहीं, राज्यसभा के सभापति ने भी रिजिजू से गतिरोध तोड़ने के लिए विपक्ष की भावनाएं शाह तक पहुंचाने को कहा है। इंडियन एक्सप्रेस और अमर उजाला की प्रस्तुति से आप समझ सकते हैं कि खबरों की धार कैसे कम की जाती है या की जा रही है। इस कोशिश में पूरा भाजपाई इकोसिस्टम यह हंगामा मचाता रहा कि राहुल गांधी रांची क्यों नहीं जा रहे हैं, झारखंड के छात्रों के लिए क्यों नहीं बोल रहे हैं आदि आदि।
आज द टेलीग्राफ की एक खबर का शीर्षक है, कांग्रेस ने सहयोगी के खिलाफ झारखंड में रोजगार के लिए विरोध प्रदर्शन का समर्थन किया। कुछ लोग यह भी पूछ रहे थे कि राहुल गांधी प्रयागराज क्यों जा रहे हैं, झारखंड क्यों नहीं जा रहे हैं। दि एशियन एज की एक खबर के अनुसार राहुल गांधी ने कहा है, सरकार मुझे छात्रों की आवाज उठाने से नहीं रोक सकती है। उपशीर्षक है, प्रयागराज का कल का आयोजन होगा। खबर के अनुसार, राहुल गांधी ने कहा है, … भाजपा सरकार चाहे जितनी कोशिश कर ले वह उन्हें छात्रों की आवाज उठाने से नहीं रोक सकती है। खबर है कि राहुल गांधी जहां कहीं भी छात्रों की गूंज कार्यक्रम आयोजित करना चाहते हैं वहां आयोजकों को परेशान किया जाता है। फिर भी कार्यक्रम होता रहा है और परेशान करने का सिलसिला जारी है। इलाहाबाद में कार्यक्रम के लिए दी गई जगह का आवंटन बेहद लचर कारण बता कर रद्द कर दिया गया और फिर अनुमति बहाल कर दी गई है। इसपर राहुल गांधी ने कहा है, … मांग सुनने की बजाय प्रशासन उनके (छात्रों के) खिलाफ एफआईआर दर्ज कर रहा है। कहने की जरूरत नहीं है कि पत्रकारिता का मकसद सरकार और संघ का प्रचार करना ही नहीं होता तो इस पर भी एक खबर होनी चाहिए थी लेकिन दैनिक भास्कर, नवोदय टाइम्स के साथ अमर उजाला में भी आज सबसे ज्यादा महत्व भागवत बोले, जेन जी की शिकायतें जायज कहा, मुझे जेन-जी की ईमानदारी पर भरोसा है – खबर को दिया गया है। और भी ज्ञान की बातें हैं लेकिन मैं उनका प्रचार नहीं करके यह बताना चाहूंगा कि आरएसएस के सह-सरकार्यवाह अतुल लिमये ने एबीवीपी के कार्यक्रम में हाल के छात्र आंदोलन को केवल “एंटी-बीजेपी” आंदोलन न मानने, बल्कि “संविधान-विरोधी” और “राष्ट्र-विरोधी” आंदोलन के रूप में देखने की बात कही। उन्होंने आंदोलन को “डीकोड” करने की अपील करते हुए आरोप लगाया था कि इसे विभिन्न वैचारिक समूहों ने अपने राजनीतिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया। मोहन भागवत ने अब जो कहा है उससे पहले के सरकार के कारनामे गौर करने लायक हैं।

इस सरकार ने 2016 में जेएनयू के मामूली विरोध को कुचलने के लिए कन्हैया कुमार पर देशद्रोह का आरोप लगाया, संपादित वीडियो का उपयोग किया और पुलिस हिरासत में, अदालत परिसर में उस पर हमला हुआ। सीएए-एनआरसी विरोध के समय भी छात्र आंदोलनों को लेकर तीखी राजनीतिक भाषा थी। अपमानजनक टिप्पणियां भी की गईं। 2020–21 में किसान आंदोलन के समय भी किसानों को “भ्रमित”, “राजनीति प्रेरित” और खालिस्तानी तक कहा गया। 2024 के बाद से छात्रों और युवाओं के विरोध को भी किसी तरह कुचने की कोशिश होती रही है और उसी में बल प्रयोग करके सरकार फंस गई है। अब मोहन भागवत लीपा-पोती कर रहे हैं और मीडिया तथ्य बताने की बजाय उसका एकतरफा प्रचार कर रहा है। कन्हैया कुमार से लेकर उमर खालिद तक को फर्जी मामलों से परेशान किया जाता रहा है और मोहन भागवत अब जागे हैं। बता रहे हैं “आंदोलन लोकतांत्रिक संवाद है”, “जेनजी की शिकायतें वास्तविक हैं”, “प्रदर्शनकारी देशविरोधी नहीं हैं”, “सरकार में कमी रही होगी, तभी आंदोलन हुआ।” इस तरह के प्रचार से भरे हैं अखबार। टाइम्स ऑफ इंडिया की आज की लीड तहलका के संपादक तरुण तेजपाल को बलात्कार मामले में हाईकोर्ट से 10 साल की सजा होने की खबर है। दिलचस्प है कि हाईकोर्ट ने गोवा की अदालत के बरी करने के आदेश को खारिज कर दिया है। गोवा की अदालत के आदेश के खिलाफ सरकार ने हाईकोर्ट में अपील की। गोवा की अदालत की टिप्पणी भी खबर थी और अब हाईकोर्ट से सजा की खबर भी। अदालतों की इस कार्रवाई पर मुझे टिप्पणी करने की जरूरत नहीं है लेकिन खबर पढ़कर मुझे भी लग रहा है कि उन्हें फंसाया गया हो या नहीं, सरकार ने हाईकोर्ट में अपील करने का निर्णय किस आधार पर लिया या लेती। जिन मामलों में नहीं गई और जिन मामलों में निचली अदालत का फैसला आने से पहले स्टे हो जाने की खबर थी वह सब क्या है और उसपर खबरें क्यों नहीं होती हैं। सरकार पक्षपात कर ही रही है मीडिया का पक्षपात साफ दिख रहा है और पता नहीं चल रहा है कि डर से हैं, लालच में है या सत्ता के दुरुपयोग के कारण। जो भी हो सरकार निष्पक्ष नहीं है। और यह खबर नहीं है। जो सरकार बलात्कार के आरोपियों को बरी करवा सकती है, जिसके लोगों ने इसका समर्थन किया, फूल माला पहनाए, मिठाई खाई खिलाई और सुप्रीम कोर्ट को वापस उन्हें जेल भेजना सुनिश्चित करने में परेशानी हुई, समय लगा उसी सरकार ने एक ऐसे संपादक के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की जिसकी पत्रकारिता सरकार के खिलाफ थी।
जाहिर है, सरकार, जनता के पैसे से अपनी राजनीति कर रही है। यह सत्ता का दुरुपयोग है कि वह पूर्व में खिलाफ खबर लेने वाले से बदला ले रही है। सजा बिल्कुल सही और उचित हो तब भी सरकार का हाईकोर्ट में अपील करना, सरकारी वकील का पेश होना तेजपाल परेशान करना है। इसका संदेश भी बहुत साफ है। यह देशहित में तो नहीं ही हो सकता है। पर हो रहा है। मुझे लगता है कि यह खबर अपने कारणों से सिंगल कॉलम से ज्यादा की नहीं होनी चाहिए थी। पर टाइम्स ऑफ इंडिया में लीड है। पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर निजी विश्वविद्यालयों को अनुमति देने के लिए दिल्ली सरकार के विधेयक की खबर लीड है। द हिन्दू में लीड का शीर्षक है, डीएमके (द्रमुक) ने परिसीमन बिल का समर्थन करने के लिए शर्तें रखीं। ये शर्तें ऐसे समय में सामने आई हैं जब केंद्र सरकार बिल के लिए ज़रूरी समर्थन जुटाने के मकसद से विपक्ष से संपर्क करने की नई कोशिशें कर रही है; हालांकि, डीएमके के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि सरकार ने अभी तक उनसे संपर्क नहीं किया है। जो भी हो, एक भ्रष्ट और बेशर्म लोगों का एक समूह सत्ता पर कब्जा किए बैठा है। इसके लिए वह विरोधियो को सिर भी नहीं उठाने देना चाहता है। नियंत्रण के तमाम अनुचित तरीकों का सहारा लिया जा रहा है। आरएसएस ने यह सब होने दिया और इसी आत्मविश्वास में जब सरकार फंस गई तो आरएसएस प्रमुख बचाव में कूद पड़े हैं और मीडिया ने उन्हें भरपूर प्रचार दे रहा है। द हिन्दू में आज एक और खबर है जो दूसरे अखबारों में नहीं और इस सरकार की कार्यशैली का खुलासा करती है। खबर का शीर्षक है, अनुच्छेद 370 खत्म करने की 7वीं बरसी पर पीडीपी के विरोध प्रदर्शनों को लेकर जम्मू और कश्मीर पुलिस ने एफआईआर दर्ज की। इस खबर के अनुसार, गुरुवार को जम्मू और कश्मीर पुलिस ने पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के नेताओं और कार्यकर्ताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज की। पार्टी ने श्रीनगर में कई जगहों पर विरोध प्रदर्शन किए थे, जो अनुच्छेद 370 खत्म करने की सातवीं बरसी के मौके पर थे। इस अनुच्छेद के जरिए राज्य को खास दर्जा हासिल था। पीडीपी ने इस एफआईआर को “सत्ता और अधिकार का खुला दुरुपयोग” कहा है।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


