सुभाष सिंह सुमन-
निफ्टी ठीक 2 साल पहले मने अगस्त 2024 में 25 हजार पर एवरेज किया था। अगस्त 2024 शुरू हुआ था 25,010.90 पर और समाप्त हुआ था 25,235.90 पर। बीच में 24,000 से नीचे गिरा था। उसके अगले महीने सितंबर 2024 में पहली बार 26,000 को पार कर नया शिखर बनाया था। उसके बाद से जो ग्रहण शुरू हुआ, अभी तक लगा हुआ है। बहुत कम लोग तब यह सोच पा रहे थे कि निफ्टी अगले 2 साल नहीं चलने वाला है। लेकिन आज की स्थिति बता रही है कि बाजार ऑलमोस्ट वहीं पर है, या कुछ नीचे ही गिरा हुआ है। आज की क्लोजिंग निकली है 24,078.30 पर।
2 साल के इस अंतराल में 2 ही चीजें अप्रत्याशित हुई हैं। पहला ट्रंप टैरिफ। दूसरा ईरान युद्ध। ट्रंप टैरिफ का अकेला शिकार भारत नहीं हुआ। सबने झेला। ईरान युद्ध ने अकेले भारत के लिए तेल महँगा नहीं किया। सबके लिए तेल महँगा हुआ। एशिया में तो तुलना योग्य सारी अर्थव्यवस्थाएँ तेल के लिए आयात पर निर्भर हैं। मतलब अकेले भारत के लिए कुछ भी अनोखा नहीं हुआ। लेकिन फिर भी इन 2 सालों में जापान, कोरिया, ताईवान जैसे बाजारों ने कई ऑलटाइम हाई बनाये।
फिर भारत क्यों पिछड़ा? इसका एक ही कारण है एफपीआई। एफपीआई ने अक्टूबर 2024 से भारत में बेचना शुरू किया। उसके बाद से अबतक कुछेक महीने अपवाद वाले ही आये हैं, जब एफपीआई ने भारतीय बाजार में डॉलर डाला है। अक्टूबर 2024 से अभी तक एफपीआई 5 लाख करोड़ रुपये के लगभग भारत से निकाल चुके हैं। अब एफपीआई भारत से क्यों भाग रहे हैं, इसके भी 2 कारण हैं। पहला कारण एआई, जिसकी सब चर्चा करते हैं। भारत में एआई पर नया काम जीरो है। दूसरा कारण, जिसकी खुलकर चर्चा कम होती है, वो है ट्रस्ट डेफिसिट। हिन्दी में भरोसे की कमी।
पहले कई एक्सपर्ट जब यह बात पॉइंट आउट करते थे कि भारत सरकार आर्थिक आँकड़ों में घोटाला कर रही है, मैं विश्वास नहीं करता था। मुझे लगता था यह नीच काम है। लेकिन अब मैं मानता हूँ कि वास्तव में आर्थिक आँकड़े बहुत बढ़ा-चढ़ाकर दिखाये जा रहे हैं। ग्रोथ रेट का जो फिगर सरकार दे रही है, एक्चुअल आँकड़े उसके आधे के आस-पास हैं। सरकार ने अर्थव्यवस्था बनाने के ऊपर आँकड़े मैन्युफैक्चर करने को तरजीह दे दी है।
ब्लूमबर्ग ने कुछ समय पहले एक स्टोरी की थी। उसका कहना था कि रिजर्व बैंक ने सोना बेचा। रिजर्व बैंक ने उसका फैक्टचेक किया। उस फैक्टचेक में जो सबसे मजेदार बात थी, वो यह थी कि ब्लूमबर्ग जिस टाइम-फ्रेम में सोना बेचे जाने की बात कर रहा था, रिजर्व बैंक उससे 2 हफ्ते पहले का डेटा देकर उसकी स्टोरी को गलत बता रहा था। आगे अंदरखाने जो भी हुआ, ब्लूमबर्ग की स्टोरी विड्रॉ हो गयी।
ऐसे प्रकरण ट्रस्ट डेफिसिट पैदा करते हैं। अब आईएमएफ हो या वर्ल्डबैंक, ब्लूमबर्ग हो या रॉयटर्स, एसऐंडपी हो या गोल्डमैन सैक्स, कोई किसी देश में खुद से आँकड़े नहीं जुटा सकता। सब संबंधित देश द्वारा जारी आधिकारिक आँकड़ों के आधार पर ही विश्लेषण करते हैं। अब जिसके आँकड़े हैं, वही सरकार आँकड़े बदल दे या उससे मुकर जाये, तब आपके सामने रिपोर्ट विड्रॉ करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। लेकिन जन्नत की हकीकत तो मालूम पड़ ही जाती है। जो कई दशकों से रोज यही काम कर रहा है, आप उसका मुँह तो बंद करा सकते हैं, लेकिन आप उससे जबरदस्ती निवेश नहीं ला सकते हैं।
और विदेशियों को छोड़ो। देश में ही देख लो। कोविड के बाद से इंडियन कॉरपोरेट मने भारतीय कंपनियों के पास कैश का अंबार लगते गया है। कैश के पहाड़ पर भारत की कंपनियाँ बैठी हुई हैं, लेकिन नया निवेश करने में हिचक रही हैं। क्या कारण हो सकता है इसका? सिवाय इसके कि उन्हें कुछ तो ऐसा मालूम है, जो बताया नहीं जा रहा है? वो भी उसके बारे में बोल नहीं सकते हैं। सबको करना है बिजनेस। बोलने पर क्या होता है, इसकी जानकारी वेदांता वाले अनिल अग्रवाल से ली जा सकती है। बेचारे 10 साल से डंकापति के डंका पीटते रहे, लेकिन एक बार मुँह खोल देने का पुरस्कार कॉमेडी टाइप एफआईआर में नाम डालकर दिया गया। उसके बाद वो भी चुप हो गये।
अंदरखाने जो चीजें चल रही हैं, अगर कहीं से सिरा खुलना शुरू हुआ, मार्केट में बवंडर फैल जायेगा। लेकिन बीमारी जितना दबाते जायेंगे, उतनी ज्यादा परेशानी बढ़ती जायेगी। वही बीमारी, जो भारत का बैंकिंग सेक्टर एकबार झेल चुका है और जिसे साफ करने में रघुराम राजन की जरूरत लगी। लेकिन अभी समस्या उससे गंभीर है। इलाज उससे कड़ा करना पड़ेगा। इसके लिए बड़ी हिम्मत लगेगी। इस सरकार में तो बीमारी और बढ़ने ही वाली है। इसके बाद जब भी दूसरी सरकार आयेगी, उसे ठोस जमीन तलाशने में कई साल लग जायेंगे।
अभी 2 साल में एफपीआई की इतनी तगड़ी बिकवाली के बाद भी बाजार लगभग टिका हुआ है, उसका सबसे बड़ा कारण हैं रिटेलर्स यानी छोटे निवेशक। सिप से रिकॉर्ड इनफ्लो आ रहा है। यही भारतीय बाजार में सबसे स्ट्रॉन्ग चीज बच रही है अभी। भारत में अब भी आबादी के 10% से कम लोग पैसा लगा रहे हैं। इसमें बहुत बढ़ने की गुँजाइश है। बाजार में रिटेलर्स ही लीस्ट इनफॉर्म्ड क्लास है। मतलब जिसे जन्नत की हकीकत न के बराबर मालूम होती है। लेकिन रिटेलर्स में धैर्य भी कम होता है।
रिटेलर्स कब तक कृष्ण बनकर गोवर्धन को कँधे पर थाम पायेंगे! अभी 2 साल से थामे हुए हैं, तब भी एशिया के बाजारों में इंडोनेशिया से भी नीचे गिरकर अब भारत सबसे कम तरजीह वाला बाजार बन चुका है।


