नई दिल्ली। लेखक और पौराणिक कथाकार देवदत्त पटनायक ने हिंदू धार्मिक परंपरा में मांसाहार के इतिहास को लेकर एक विस्तृत टिप्पणी में दावा किया है कि वैदिक और उत्तरवैदिक साहित्य में मांसाहार तथा पशुबलि के अनेक स्पष्ट संदर्भ मौजूद हैं, लेकिन बाद के दौर में इन्हें नजरअंदाज या हटाने की कोशिश की गई।
पटनायक ने अपने लेख में वैदिक संहिताओं से लेकर ब्राह्मण ग्रंथों, धर्मसूत्रों, गृह्यसूत्रों, रामायण, महाभारत और पुराणों तक के 30 संदर्भ गिनाए हैं। उनका आरोप है कि ‘देशभक्त सनातनी’ और पुरोहित वर्ग वैदिक इतिहास के उन हिस्सों को स्वीकार नहीं करना चाहता जिनमें यज्ञ, श्राद्ध, अतिथि-सत्कार अथवा अन्य धार्मिक प्रसंगों में मांस के इस्तेमाल का उल्लेख मिलता है।
उन्होंने ऋग्वेद के कई सूक्तों का हवाला देते हुए कहा कि अश्वमेध जैसे यज्ञों में पशु के मांस को काटने, पकाने और बांटने का वर्णन मिलता है। इसी क्रम में उन्होंने अग्नि के लिए बैल और गाय के संदर्भ तथा यज्ञ में भेड़-बकरियों की मौजूदगी का उल्लेख किया है।
ब्राह्मण ग्रंथों के संदर्भ में पटनायक ने शतपथ ब्राह्मण में याज्ञवल्क्य के कथित कथन को प्रमुखता दी है। उनके अनुसार वहां गोमांस को लेकर निषेध की चर्चा के साथ याज्ञवल्क्य का यह जवाब मिलता है कि वे कोमल मांस खाते हैं। ऐतरेय ब्राह्मण, तैत्तिरीय ब्राह्मण और पंचविंश ब्राह्मण के उदाहरण देते हुए उन्होंने पशुबलि और मांस के धार्मिक इस्तेमाल के अन्य संदर्भ भी गिनाए हैं।
धर्मसूत्रों और धर्मशास्त्रों के संबंध में पटनायक ने आपस्तंब, गौतम और बौधायन धर्मसूत्रों के साथ मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति का उल्लेख किया। उनका कहना है कि इन ग्रंथों में परिस्थितियों और धार्मिक अनुष्ठानों के आधार पर मांस सेवन की अनुमति के प्रावधान मिलते हैं।
पटनायक ने गृह्यसूत्रों के हवाले से श्राद्ध और अन्य संस्कारों में मांसाहारी भोजन के इस्तेमाल की बात कही है। उन्होंने आश्वलायन गृह्यसूत्र में पितरों को विभिन्न पशुओं के मांस से तृप्त करने संबंधी वर्णन और कुछ गृह्यसूत्रों में गृहप्रवेश अथवा अन्य अनुष्ठानों में पशुबलि के संदर्भों का उल्लेख किया है।
रामायण को लेकर भी पटनायक ने महत्वपूर्ण दावा किया है। उनके अनुसार अयोध्याकांड के कुछ प्रसंगों में सीता द्वारा गंगा को मांस और मदिरा अर्पित करने का संकल्प लेने का वर्णन मिलता है। उन्होंने वनवास के दौरान राम, लक्ष्मण और सीता द्वारा शिकार किए जाने तथा मांस के इस्तेमाल के संदर्भ भी गिनाए हैं।
महाभारत के संदर्भ में उन्होंने वनपर्व में पांडवों के वनवास के दौरान शिकार किए गए मांस के सेवन, अनुशासनपर्व में यज्ञ और श्राद्ध में मांस के समर्थन तथा शांतिपर्व में व्याधगीता के प्रसंग का उल्लेख किया है। रंतिदेव की अतिथि-सत्कार परंपरा और नल से जुड़े प्रसंग को भी उन्होंने मांसाहार के ऐतिहासिक संदर्भों के रूप में पेश किया है।
पुराणों में भी मांसाहार से जुड़े संदर्भ होने का दावा करते हुए पटनायक ने विष्णु पुराण, भागवत पुराण और मार्कण्डेय पुराण का उल्लेख किया है। विशेष रूप से उन्होंने श्राद्ध में गैंडे के मांस से पितरों की दीर्घकालिक तृप्ति संबंधी वर्णन का हवाला दिया।
पटनायक का मूल तर्क यह है कि प्राचीन हिंदू साहित्य को आज की शाकाहारी धार्मिक धारणाओं के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। उनका कहना है कि अलग-अलग कालखंडों में हिंदू समाज और धार्मिक अनुष्ठानों में मांस की भूमिका रही है और इस इतिहास को मिटाने या उसके संदर्भों को बदलने की कोशिश नहीं होनी चाहिए।
लेख के अंत में पटनायक ने आरोप लगाया है कि बाद के वैष्णव संपादकों ने उन श्लोकों को हटा दिया जिनमें मांसाहार का उल्लेख था। उन्होंने इसे ‘पवित्रता का मुखौटा’ बताते हुए कहा है कि ऐसे बदलावों को विद्वत्ता नहीं माना जा सकता।
हालांकि, पटनायक द्वारा दिए गए इन 30 संदर्भों की मूल संस्कृत पाठ, विभिन्न संस्करणों और प्रामाणिक अनुवादों से स्वतंत्र रूप से जांच किए बिना उनके प्रत्येक दावे को ऐतिहासिक तथ्य मानना उचित नहीं होगा। प्राचीन ग्रंथों के पाठ में संस्करणों के अंतर, अनुवाद की व्याख्या और संदर्भ से अलग उद्धरण जैसे प्रश्न भी महत्वपूर्ण हैं। इसलिए यह लेख मुख्यतः देवदत्त पटनायक द्वारा किए गए दावों और उनके प्रस्तुत किए गए संदर्भों पर आधारित है।
पढ़िये पटनायक की मूल पोस्ट-
ब्राह्मण बनिया फ़ंडर्स के प्रति इतने वफ़ादार हैं कि वे वैदिक इतिहास को नकार रहे हैं और ‘निरुक्त’ (संस्कृत शब्द-व्युत्पत्ति) के रचनात्मक इस्तेमाल से ‘श्रुति’ साहित्य में मांस-भक्षण के सभी संदर्भों को हटा रहे हैं। नीचे ऐसे 30 उदाहरण दिए गए हैं जिन्हें ‘देश-भक्त’ सनातनियों द्वारा हिंदू इतिहास से मिटाया जा रहा है।
वैदिक संहिताएँ
- ऋग्वेद 10.85.13 — विवाह सूक्त में विवाह के अवसर पर बैल और गाय के वध का विधान है, जिसमें असंदिग्ध शब्द गोवृष प्रयुक्त हुआ है।
- ऋग्वेद 1.162 — अश्वमेध सूक्त में घोड़े के माँस को काटने, पकाने और अधिकार के अनुसार बाँटने का विस्तृत वर्णन है।
- ऋग्वेद 10.91.14 — अग्नि को “बैल और बाँझ गाय के भक्षक” कहा गया है, अर्थात देवता की अग्नि स्वयं यज्ञ-माँस का भक्षण करती है।
- ऋग्वेद 8.43.11 — भेड़ और बकरे यज्ञ की अग्नि में अर्पित पशुओं में गिनाए गए हैं।
ब्राह्मण ग्रंथ
- शतपथ ब्राह्मण 3.1.2.21 — गोमांस पर निषेध कहा गया है, किंतु उसी सांस में याज्ञवल्क्य का उत्तर आता है, “मैं तो खाता हूँ, बशर्ते वह कोमल हो।” यह उत्तर अखंडित रहता है।
- ऐतरेय ब्राह्मण 2.8 — मधुपर्क विधि में राजा या गुरु का सम्मान बैल या बाँझ गाय के माँस से किया जाता है।
- तैत्तिरीय ब्राह्मण 3.9 — विशिष्ट गायों को विशिष्ट देवताओं के लिए नियत किया गया है: बौना बैल विष्णु को, चमकते माथे वाला बैल इंद्र को, लाल गाय रुद्र को।
- तैत्तिरीय ब्राह्मण 1.6.8 और पंचविंश ब्राह्मण 25.15 — दोनों में ऋषि अगस्त्य द्वारा सौ बैलों के यज्ञ का उल्लेख है, जिसे प्रतिष्ठा माना गया है, कलंक नहीं।
- पंचविंश ब्राह्मण 21.1 — पशु-पंचक, पाँच यज्ञ-पशु: पुरुष, अश्व, बैल, भेड़, बकरा, प्रत्येक का अपना अनुष्ठानिक प्रयोजन।
- तैत्तिरीय संहिता 5.5.11 — बड़े सोम यज्ञों में इक्कीस यूपों पर इक्कीस बलि-पशुओं का विधान।
धर्मसूत्र और धर्मशास्त्र
- आपस्तंब धर्मसूत्र 1.17.18-19 — देवताओं या पितरों के लिए संस्कारित माँस की अनुमति देता है, केवल असंस्कारित माँस को निषिद्ध करता है।
- गौतम धर्मसूत्र 17.27-37 — बीमारी में, यज्ञ में, या ब्राह्मण मेज़बान द्वारा दिए जाने पर माँस की अनुमति देता है।
- बौधायन धर्मसूत्र 1.5.9 — निषिद्ध माँसों की सूची देता है, जो यह मान कर चलती है कि अनुमत माँसों की सूची कहीं अधिक लंबी है।
- वसिष्ठ धर्मसूत्र 11.34 — यज्ञ में दिया गया माँस अस्वीकार करने वाला तपस्वी उतने ही वर्षों तक पाप भोगता है जितने बाल उस पशु के शरीर पर थे।
- मनुस्मृति 5.30-31 — स्रष्टा ने स्वयं पशुओं को यज्ञ हेतु बनाया, और यज्ञ-सम्मत माँस भक्षण पाप नहीं।
- मनुस्मृति 5.35 — विधिवत श्राद्ध-निमंत्रण में माँस अस्वीकार करने वाला अगले जन्म में उसी पशु की योनि में गिरता है जिसे उसने अस्वीकार किया था।
- याज्ञवल्क्य स्मृति 1.179 — मंत्र से संस्कारित माँस की अनुमति देती है।
गृह्यसूत्र
- आश्वलायन गृह्यसूत्र 2.7 — पितरों को अर्पित खरगोश, सूअर या मोर का माँस अन्न से कहीं अधिक समय तक उन्हें तृप्त रखता है।
- खादिर और गोभिल गृह्यसूत्र — नए घर के निर्माण पर गृहदेवता को काली गाय की बलि का विधान।
- पारस्कर गृह्यसूत्र 1.3 — विशेष अनुष्ठानों के लिए मछली, हिरण और सूअर को स्वीकार्य भोजन में गिनाया गया है, किसी विशेष अनुमति के बिना।
रामायण
- अयोध्याकांड, सर्ग 52 / उत्तरकांड — सीता, राम के वनवास से लौटने पर, गंगा को माँस और मदिरा अर्पित करने का संकल्प लेती हैं, और वह संकल्प पूर्ण भी करती हैं। परंपरा की सबसे आदर्श पत्नी माँस को देवी के लिए भेंट बनाती है।
- अयोध्याकांड — राम, लक्ष्मण और सीता वनवास में मृगों का शिकार करते हैं, और वनवासी ऋषि राजकुमार को अतिथि-धर्म के रूप में माँस अर्पित करते हैं।
- किष्किंधाकांड — राम मारीच मृग का वध करते हैं और वनवास भर सूअर व अन्य वन्य पशुओं का शिकार करते हैं, जिसे सामान्य वन-जीवन माना गया है।
महाभारत
- वनपर्व — पांडव वनवास में मुख्यतः शिकार किए मृग-माँस पर जीवित रहते हैं, बिना किसी नैतिक असहजता के वर्णित।
- अनुशासनपर्व 88 — यज्ञ और श्राद्ध में माँस का विस्तृत समर्थन, यह तर्क देते हुए कि संस्कारित माँस देवताओं और पितरों दोनों को पोषण देता है।
- शांतिपर्व 262 — व्याधगीता, जिसमें एक कसाई एक ब्राह्मण को धर्म की शिक्षा देता है, माँस-विक्रय के व्यवसाय को धर्मसंगत आचरण के अनुकूल दर्शाता है।
- आदिपर्व — राजा रंतिदेव की रसोई में प्रतिदिन अतिथियों और ब्राह्मणों के लिए अनगिनत पशुओं का वध होता है, जिसे आदर्श उदारता का उदाहरण माना गया है।
- वनपर्व, नल-प्रसंग — निर्धन नल पक्षियों को पकाकर खाते हैं, माँस यहाँ भी सामान्य भोजन है, विशेष अनुष्ठानिक वस्तु नहीं।
पुराण
- विष्णु पुराण और भागवत पुराण — दोनों राजा रंतिदेव की माँस-आधारित आतिथ्य-परंपरा को बिना किसी संपादन के प्रशंसनीय दान बताते हैं।
- मार्कण्डेय पुराण — श्राद्ध-विधि में गैंडे का माँस चावल से कहीं अधिक समय तक पितरों को तृप्त रखता है, गृह्यसूत्रीय तर्क को पूर्ण पौराणिक सिद्धांत का रूप देता हुआ।
तीस उद्धरण, चार विधाएँ, एक लंबी स्मृति जिसे पुरोहित वर्ग ने जान-बूझकर खो दिया है। “सीता का संकल्प” अकेला ही इस बहस को समाप्त करने के लिए पर्याप्त है। बाद के वैष्णव संपादकों ने, जिनके पास इसका कोई उत्तर नहीं था, बस उस श्लोक को हटा दिया। यह विद्वत्ता नहीं है। यह पवित्रता का मुखौटा पहने लज्जा है।


