देहरादून। पत्रकारिता में लंबा सफर तय कर चुके विक्रम श्रीवास्तव ने दैनिक भास्कर को अलविदा कहकर अब अपना स्वतंत्र मंच खड़ा किया है। उन्होंने पहले साप्ताहिक अखबार ‘अंतिम दूत’ की शुरुआत की और अब इसी नाम से डिजिटल प्लेटफॉर्म और वीडियो पत्रकारिता की दिशा में भी आगे बढ़ रहे हैं।
एक दर्जन से अधिक रीजनल और नेशनल अखबारों तथा न्यूज चैनलों में काम कर चुके श्रीवास्तव की पहचान बेबाक सवाल पूछने वाले पत्रकार के रूप में रही है। उनके सहयोगियों के बीच यह चर्चा आम रही है कि सत्ता पक्ष की प्रेसवार्ताओं में उनके सवाल कई बार असहज स्थिति पैदा कर देते हैं। दावा यह भी किया जाता है कि बाबा रामदेव ने ईसी रोड, देहरादून में एक प्रेसवार्ता के बाद शहर में प्रेसवार्ताओं से दूरी बना ली थी। हालांकि यह प्रसंग पत्रकारिता जगत में श्रीवास्तव की सवाल पूछने की शैली से जुड़े किस्से के रूप में ही चर्चा में रहा है।
उनकी पत्रकारिता का एक पहलू यह भी है कि उन्होंने व्यक्तिगत स्तर पर भी आसान रास्ता चुनने के बजाय अपने पक्ष को कानूनी तरीके से रखने को प्राथमिकता दी। सरकारी कार्य में बाधा से जुड़े एक मुकदमे को उन्होंने करीब 14 साल तक लड़ा और अंततः बरी हुए। उनका कहना रहा कि प्रभाव और पहुंच का इस्तेमाल कर मामले को किसी दूसरी दिशा में ले जाने के बजाय उन्होंने अदालत में मुकदमा लड़ना उचित समझा। यह प्रसंग उनके करियर में आत्मसम्मान और अपने पक्ष के लिए कानूनी लड़ाई लड़ने के रवैये को भी रेखांकित करता है।
‘अंतिम दूत’ श्रीवास्तव के लिए महज एक नया अखबार नहीं, बल्कि वर्षों के पत्रकारिता अनुभव के बाद तैयार किया गया स्वतंत्र मंच है। साप्ताहिक प्रकाशन से शुरू हुआ यह सफर अब डिजिटल पोर्टल और वीडियो पत्रकारिता तक पहुंच रहा है।
श्रीवास्तव की पत्रकारिता की मूल सोच स्थानीय मुद्दों और आम लोगों की आवाज को प्रमुखता देने तथा सत्ता से सवाल पूछने की रही है। उनका मानना है कि पत्रकारिता का काम केवल घटनाओं को दर्ज करना नहीं, बल्कि उन सवालों को सामने लाना भी है जिन्हें अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
पत्रकारिता के मौजूदा दौर में जब खबरों का बड़ा हिस्सा तेज हेडलाइन, वायरल कंटेंट और शोर के बीच अपनी जगह बनाने की कोशिश करता है, श्रीवास्तव ने अनुभव के आधार पर अपना स्वतंत्र मंच खड़ा करने का रास्ता चुना है। ‘अंतिम दूत’ अब इसी सोच और पत्रकारिता के उनके लंबे अनुभव की परीक्षा का मंच है।


