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मैं अर्नब गोस्वामी की गिरफ़्तारी की निंदा करने वालों की निंदा करता हूँ!

-मुकेश कुमार-

मैं अर्नब गोस्वामी की गिरफ़्तारी की निंदा करने वालों की निंदा करता हूँ। एक संगीन मामले के अभियुक्त का बचाव करने का कोई आधार नहीं है, चाहे वह पत्रकार ही क्यों न हो।

ये अभिव्यक्ति की आज़ादी का मामला है ही नहीं। अपराधी अगर मीडिया को ढाल की तरह इस्तेमाल करने लगेंगे तो मीडिया और लोकतंत्र दोनों के लिए इससे बुरा कुछ नहीं होगा।


-अमिताभ श्रीवास्तव-

मुंबई पुलिस रिपब्लिक टीवी के प्रधान संपादक अर्णव गोस्वामी को पकड़ कर ले गई यह पत्रकारिता के लिए सचमुच बहुत दुखद और शर्मनाक है। लेकिन क्या अर्णव को मीडिया की अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए किसी संघर्ष में पकड़ा गया है? जी नहीं। अर्णव एक पुराने आपराधिक मामले में धरे गए हैं।


-कमल शुक्ला-

साढ़े पांच करोड़ किसी का खा गया, जिसका खाया उसे मजबूर होकर आत्महत्या करना पड़ा, इस मामले का पत्रकारिता से क्या सम्बन्ध ? पत्रकार होने के कारण उनके साथ खड़ा हो सकता हूँ, जिसकी पत्रकारिता की वजह से गिफ्तारी हुई हो तब, पर अब तक उनकी पत्रकारिता तो दिखी नही, पत्रकारिता को कलंकित करने वालों के साथ कैसी सहानुभूति ? पर मार-पीट निंदनीय है

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