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जो अर्णब की गिरफ्तारी को प्रेस पर हमला बता रहे, उन्हें पहचान लीजिए!

-रमेश चंद्र राय-

सुशांत ने न कोई सुसाइड नोट छोड़ा था न किसी का नाम लिया था फिर भी अर्णब ने रिया चक्रवर्ती समेत कई को जेल पहुंचा दिया। लेकिन एक इंटीरियर डिज़ाइनर ने अपनी मां के साथ खुदकुशी करने से पहले सुसाइड नोट में अर्णब को ज़िम्मेदार ठहराया तो उन्हें पूछताछ भी मंज़ूर नहीं! मरने के पहले डिज़ाइनर ने अर्णब पर उसके करीब पांच करोड़ रुपये हड़प लेने का आरोप लगाया था।

बीजेपी सरकार ने मामला दबा दिया था। इस सरकार ने खोला है तो जांच में सहयोग कीजिए।

जो पत्रकार अर्णब की हिरासत में लिए जाने को प्रेस पर हमला बता रहे हैं, उन्हें पहचान लीजिए। वे नफ़रती सेना के चिंटू-पिंटू हैं जो देश को खोखला कर रही है।

हैरानी तो यह कि उस सरकार के तमाम मंत्री इसे परदेस की आज़ादी पर हमला बता रहे हैं जो मौक़ा पाते ही आज़ाद पत्रकारों को कच्चा चबा जाते हैं। शर्मनाक है।


-सौमित्र रॉय-

अर्नब की गिरफ्तारी पर अमित शाह से लेकर नड्डा तक सब आंसू क्यों बहा रहे हैं। किसी इंटीरियर डिज़ाइनर से काम करवाओ और उसके 5.4 करोड़ न लौटाओ, क्योंकि तुम चैनल के एंकर हो?

तकनीकी रूप से अर्नब पत्रकार नहीं है। मैंने आज तक किसी भी सच्चे पत्रकार के साथ नाइंसाफ़ी होने पर सरकार को मरहम लगाते नहीं देखा।

कानून सबके लिए बराबर है। अर्नब को 53 साल के एक इंटीरियर डिजाइनर और उनकी मां की आत्महत्या के उस मामले में गिरफ्तार किया गया है, जिसे महाराष्ट्र की फडणवीस सरकार ने 2 माह में बंद कर दिया था।

मई 2018 में आत्महत्या से पहले लिखे एक खत में अन्वय नाइक ने आरोप लगाया था कि अर्नब गोस्वामी ने रिपब्लिक नेटवर्क के स्टूडियो का इंटीरियर डिजाइन कराने के बाद भुगतान नहीं किया था।

उद्धव ठाकरे सरकार ने अन्वय के परिवार के आग्रह पर इस मामले को दोबारा खोला है।

इसमें पत्रकारिता और प्रेस पर हमले की बात कहां से आ गई? ये कहिए कि हमारे चमचे को पकड़ा है, सो मिर्ची लग रही है। लग ही रही है तो बरनॉल लगाओ।


-राकेश कायस्थ-

अभिव्यक्ति की आज़ादी को लेकर आज सुबह से पूरे देश में इतने आँसू बहें है कि डर है कहीं बाढ़ ना आ जाये। राष्ट्र बहुत चिंतित है ऐसे में कुछ तथ्य याद दिला देना फर्ज है।
अमित शाह के बेटे जय शाह कंपनी की आमदनी रातो-रात सोलह ह़ज़ार गुना बढ़ने की खबर छापने के बाद से वेबसाइट द वायर के साथ अब तक क्या हुआ है? द वायर ने खबर सरकारी वेबसाइट पर उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर छापी थी। सिर्फ तथ्य बताये थे, कोई इल्जाम नहीं लगाया था।
इसके बावजूद द वायर के खिलाफ ना जाने कितने शहरों में मामले दर्ज हुए। संपादक सिद्धार्थ वरदराजन के मुताबिक ` अमित शाह ने हमें भारत दर्शन करवा दिया।’ सबसे बड़े मुकदमें सौ करोड़ रुपये के हर्जाने की मांग की गई थी।

गौतम अडानी और सुभाष चंद्रा जैसे सरकार समर्थित उद्योगपतियों के खिलाफ ऐसे ही मानहानि के मुकदमे जीत चुका द वायर ने जय शाह के मामले में भी घुटने नहीं टेके हैं। वायर के खिलाफ थाना-पुलिस कोर्ट-कचहरी की ख़बरें आये दिन आती रहती हैं।

एनडीटीवी के स्टूडियो में संबित पात्रा की एंकर से गर्मागर्म बहस हुई। बात इतनी बढ़ी कि एंकर ने पात्रा को कार्यक्रम छोड़कर निकल जाने को कहा। इसके 48 घंटे के भीतर प्रणय राय के घर पर छापा पड़ गया।

ऐसे ही छापे राघव बहल और सुजीत नायर जैसे दर्जनों सम्मानित संपादक और संचालकों के घर और दफ्तरों पर पड़ चुके हैं। विनोद दुआ जैसे व्यक्ति के खिलाफ एफआईआर दर्ज करके उन्हें अलग-अलग राज्यों के चक्कर कटवाये गये। योगी राज में कितने पत्रकारों को शारीरिक तौर पर प्रताड़ित किया गया है, इसका कोई हिसाब नहीं है।

शायद ही कोई ऐसी स्वतंत्र आवाज़ होगी जिसे दबाने की कोशिश ना की गई हो। आवाज़ दबाने की यह व्यवस्था इतनी सख्त है कि सरकारी निर्देश पर बहुत से वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषकों को न्यूज चैनलों में गेस्ट बनाने तक पर बैन है। इनमें कई ऐसे लोग भी हैं, जिनके जीविकोपार्जन का ज़रिया ही न्यूज़ चैनलों से मिलने वाली फीस हुआ करता था।

मैं गौरी लंकेश जैसे कई लेखक/बुद्धिजीवियों की हत्या की बात नहीं कर रहा हूँ। सिर्फ उन पत्रकारों को टारगेट किये जाने की बात कर रहा हूँ, जिन्होंने इस देश में सूचना संप्रेषण के मामले में मानक गढ़े हैं।

आज जो लोग आत्महत्या के एक पुराने केस में अर्णब गोस्वामी के साथ हो रही पुलिस कार्रवाई को अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला बता रहे हैं, क्या आपने उन्हें कभी उपर की किसी भी घटना पर एक लाइन भी बोलते सुना है?

हर धंधे में एक तरह की भाईबंदी होती है। अगर थोक बाज़ार में ब्लैक मार्केटिंग करने वाले किसी आदमी पर कार्रवाई होती है, तो दस और व्यापारी उसके समर्थन में चिल्लाते हैं। यह मामला इतना ही भर है। अर्णब गोस्वामी किसी भी लिहाज से पत्रकार नहीं है, वे एक सुपारी किलर हैं। जिन्होंने उन्हें किराये पर रखा है, उनकी प्रतिक्रियाओं से यह बात साफ है।

महाराष्ट्र पुलिस पर अर्णब गोस्वामी के साथ बदसलूकी का इल्जाम है। अगर वास्तव में पिटाई हुई है तो यह एक निंदनीय बात है। इसकी ना सिर्फ जांच होनी चाहिए बल्कि दोषी पुलिस वालों के खिलाफ कार्रवाई भी होनी चाहिए क्योंकि यह मानवाधिकार हनन का मामला है। वैसे यह भी याद दिलाना ज़रूरी है कि मानवाधिकार शब्द से उन्हीं लोगों को सबसे ज्यादा चिढ़ है, जो आज अर्णब गोस्वामी के लिए दुखी हैं।


-विजय शंकर सिंह-

अर्नब की ही तरह कोई अन्य एंकर, अगर उतनी ही बदतमीजी, गुंडई और अभिनय के साथ, यह कहता कि, कहाँ हो मोदी, कहाँ हो शाह, सामने क्यों नहीं आते। हिम्मत है तो सामने आओ .. आदि आदि, तो क्या अर्नब के खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं हो जाता?
मुकदमा तो दर्ज होता ही, आयकर और ईडी के लोग भी धमक पड़ते।

अर्नब के पत्रकारिता का यह बदतमीजी भरा ललकार भाव, पत्रकारिता की स्वतंत्रता नही, बल्कि उद्दंड और सस्ती दादागिरी टाइप पत्रकारिता का प्रदर्शन है। ऐसी शब्दावली पर सुप्रीम कोर्ट से लेकर अधीनस्थ न्यायालयों ने भी आपत्ति जताई है। सीजेआई जस्टिस बोबडे ने जो कहा है उसे पढिये।

वैसे अर्नब गोस्वामी की गिरफ्तारी उद्धव ठाकरे या संजय राउत को ललकारने के आरोप में नहीं एक आत्महत्या के मामले में उकसाने के आरोप पर की गयी है।

पुलिस द्वारा की गयी गिरफ्तारी अगर विधिनुकूल नहीं है तो इस गिरफ्तारी को न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है। एक बात यह साफ तौर पर समझ लेनी चाहिए कि, आप कितने भी ऊपर हों, कानून आप के ऊपर है।

यह मीडिया की अभिव्यक्ति की आज़ादी पर राज्य का अतिक्रमण है या पुलिस द्वारा किसी आपराधिक मुकदमे में तफतीश के दौरान की जाने वाली एक सामान्य प्रक्रिया, इस पर बहस चलती रहनी चाहिए।


-चंचल-

ED यानी एडिटर्स गिल्ड की सदर सीमा मुस्तफा जी की तरफ़ से जारी एक प्रेस बयान में अर्णव गोस्वामी को मुंबई पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए जाने पर रोष व्यक्त किया गया है और इसे एक पत्रकार के साथ ज्यादती कहा है । किसी पत्रकार के साथ पत्रकारिता के चलते अगर कोई ज्यादती होती है तो इसकी निंदा और संघर्ष की जिम्मेवारी ED की तो होती ही है साथ ही साथ हर जिम्मेदार शहरी का भी यह फर्ज बनता है कि वह पत्रकार के साथ खड़ा हो । लेकिन इसका एक रुख और है जिसके चलते पत्रकार अर्णव गोस्वामी की गिरफ्तारी हुई है, उसे जान लेना जरूरी है।

पत्रकार नियम कानून के ऊपर नही है । 2018 में अर्णव गोस्वामी पर दो लोंगो की आत्म हत्या का मुख्य कारक बताया गया है । अर्णव गोस्वामी एक इंटीरियर डिजाइनर नायक को अपना स्टूडियो बनाने और सजाने का कांट्रेक्ट देते हैं जिसमे नाइक करोडों रुपये लगा कर अर्णव का स्टूडियो तैयार कराते हैं । भुगतान के समय अर्णव हिला हवेली करने लगते हैं और अंत मे सीधे तौर पर मना कर देते हैं । काफी भाग दौड़ के बाद नायक का भुगतान नही होता और अंत मे नायक और उनकी सास दोनो ने आत्महत्या कर ली । सुसाइट नोट में अपने हत्या के लिए अर्णव गोस्वामी और दो अन्य का जिक्र किया । इस आधार पर पुलिस थाने में नाम बनाम रपट दर्ज हुई लेकिन उस समय की सरकार और अर्णव का दबदबा इतना था कि जांच बन्द कर दी गई । सरकार बदलने के बाद नायक की पत्नी अक्षत नाइक ने फिर सरकार से गुहार लगाई की इसकी जांच शुरू हो , दोषी को सजा दी जाय ।
ED से कहना है , यह पत्रकार के खिलाफ उत्पीड़न नही है । यह एक अपराधी धंधेबाज के खिलाफ पुलिस की जांच है। पत्रकार नियम कानून के ऊपर नही है।

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