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सुख-दुख

इस्लाम की हर आलोचना को इस्लामोफोबिया कहकर अपना पल्ला झाड़ लेना सही नहीं!

रंगनाथ सिंह-

भारत में हिन्दू दक्षिणपंथ के मौजूदा स्तर तक पहुँचने से बहुत पहले जावेद अख्तर ने किसी पत्रिका में कछ इस तरह की बात लिखी थी कि हिंदुस्तान में सेकुलरइज्म का सारा बोझ हिंदुओं पर है। आज पूरे देश में जिस तरह मुसलमानों को निशाना बनाया जा रहा है। उनके खिलाफ ज़हर उगला जा रहा है। उसे देखते हुए इस बिंदु को उठाना गलत जान पड़ता है लेकिन शायद इस बिंदु को उठाये बिना इस समस्या का समाधान सम्भव नहीं।

मूलतः सभी धर्मों का आधुनिकता से विरोध रहा है। आधुनिकता की पैदाइश ही ईश्वर के शव से गुजर कर हुई। इस्लाम की मैंने एक सब्जेक्ट के तौर पर पढ़ायी की है। फिर भी मैं इस्लाम पर कुछ कहने से बचता हूँ क्योंकि आइडेंटिटी पॉलिटिक्स के इस दौर में आदमी की बात से ज्यादा उसकी पहचान मायने रखती है। फिर भी जिस तरह मेरे कुछ दोस्त इस्लाम की हर आलोचना को इस्लामोफोबिया कहकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं वह समस्याप्रद है।

हाल ही में देखा कि एक मुसलमान युवा ने अपने ट्विटर बॉयो में लिख रखा है कि वो ‘हिन्दू डीरेडिकलाइजेशन सेंटर’ चलाएगा। ऐसे धर्मांध लोग समझ नहीं पाते कि दूसरे धर्मों को डीरेडिकलाइेज करने के बारे में ऐसे बेतुके बयान साम्प्रदायिकता की आधारशिला हैं। दुनिया भर के साम्प्रदायिक आंदोलनों को कमोबेश जानने की कोशिश के बाद मेरी राय यही बनी है कि धार्मिक सम्प्रदायिकता से उसी समुदाय को लड़ना होता है। दूसरा समुदाय दूसरे धर्म को जितना सुधारने की कोशिश करता है, उसका परिणाम उतना ही नकारात्मक होता जाता है। इसलिए सभी सहृदय मित्रों से अनुरोध है कि अगर दूसरों की आलोचना कीजिए लेकिन थोड़ा अपने अन्दर भी झाँक लिया कीजिए।

मैं इस विषय पर कोई वाद-विवाद नहीं चाहता। अगर आपको ये विचार पसन्द न आएँ तो अनदेखा कर दीजिए या मुझे माफ कर दीजिए।

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