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आज के अखबार : अदाणी का मामला द टेलीग्राफ में बैनर, दि एशियन एज में सिर्फ तीन कॉलम 

संजय कुमार सिंह

आज के अखबारों में गौतम अदाणी पर अमेरिकी आरोप की खबर लीड होनी थी और सबों में यही खबर लीड है। अदाणी के बाचव में भाजपा दल-बल के साथ मैदान में थी। आज वह भी अखबारों में है जब अदाणी समूह के औपचारिक बयान को वो महत्व नहीं मिला है। भाजपा का बचाव इतना कमजोर और फूहड़ है कि नहीं के बराबर छपा है। द टेलीग्राफ का एक शीर्षक है, तलवारियों ने कहा अभी दोषी साबित नहीं हुए। भाजपा के बचाव को सबसे ज्यादा महत्व नवोदय टाइम्स ने दिया है। राहुल गांधी के साथ संबित पात्रा की फोटो लगी खबर का शीर्षक है, “राहुल बोले – मोदी और अदाणी ‘एक’, भाजपा ने कहा – 2002 से मोदी की छवि खराब कर रहे राहुल।” यह खबर और शीर्षक इसलिए भी रेखांकित करने योग्य है कि 2002 से कौन किसकी छवि खराब कर रहा है, क्यों कर रहा है और वास्तविकता क्या है इस पर खूब लिखा जा सकता था पर नहीं के बराबर लिखा गया है। खासकर मुख्य धारा की मीडिया में। जो फर्जी छवि गढ़ी गई है उसकी बात अलग है।

अब तो यह साफ हो चला है कि सारा खेल देश बेचने के लिए, कायदे कानूनों को खत्म करने के लिए किया गया, विज्ञापन के रूप में सबको हिस्सा मिला और जो फिर भी नहीं माना उसे छापों से डराकर, परेशान करके बेदखल कर दिया गया। यह सब करते हुए आरोप उसकी देशभक्ति पर लगता है जिसकी पिता और दादी देश के लिए शहीद हुए हैं। दूसरे शब्दों में देश जिनकी रक्षा नहीं कर सका।

इसके बावजूद बंटेंगे तो कटेंगे और एक हैं तो सेफ हैं जैसे चुनावी नारे लगते हैं पर अखबारों में वह मुद्दा नहीं बनता और अस्पताल में 10 शिशुओं की मौत हो जाती है तो उससे पहले भी अस्पताल में जिन बच्चों की मौत हुई थी वे बंटे हुए नहीं थे – यह याद भी नहीं दिलाया गया। फिर भी अदाणी पर आरोप हैं और सफाई भाजपा दे रही है। नवोदय टाइम्स के मुख्य शीर्षक में भारत में हंगामा भी जोड़ा गया है और इसके नीचे की खबरें तीन हिस्से में हैं। एक का जिक्र ऊपर कर चुका, दूसरा शीर्षक है – “निराधार हैं आरोप, कानूनी विकल्पों का इस्तेमाल करेंगे : अदाणी समूह।” ये दोनों खबरें दो कॉलम में हैं और मूल खबर, 2238.5 करोड़ की रिश्वत का आरोप – सिंगल कॉलम में है। अमर उजाला में उल्लेखनीय शीर्षक है, अदाणी भ्रष्ट हैं तो कांग्रेस सरकारें निवेश क्यों करने दे रही हैं : संबित। मुझे लगता है कि भाजपा प्रवक्ता के लिए अदाणी के बचाव का कोई मतलब नहीं है और अगर कर रहे हैं तो मामला उसी से स्पष्ट हो जाता है। फिर भी बात में दम हो, तर्क संगत लगते तो उसकी प्रशंसा भी की जायेगी लेकिन कोई कुछ भी बोल दे तो खबर तभी तक है जब तक यह बताना हो कि देखो, फलां क्या बोल रहा है या कैसी बातें कर रहा है। संबित पात्रा उस स्थिति से बहुत आगे निकल चुके हैं। उनके ऐसे बयान खूब पढ़े और पढ़ाये गये हैं। इसलिए मुझे लगता है कि शीर्षक के लिए यह कमजोर है कोई पढ़ेगा नहीं। वैसे भी राहुल गांधी ने हाल में इसका जवाब दिया था। उन्होंने कहा था कि नियम से कोई काम करे तो दिक्कत नहीं है और किसी का किसी व्यवसाय में एकाधिकार नहीं होना चाहिये।

जहां तक अदाणी के भ्रष्ट होने (रिश्वत देकर काम कराने) का मामला है, कांग्रेस सरकारें उनसे बगैर रिश्वत लिये-दिये काम करायें तो क्या गलत है? वैसे भी, कारोबार-व्यवसाय तो राज्य की जरूरत है। अगर विकल्प नहीं है या देश में बनने ही नहीं दिया गया है तो कांग्रेस सरकारें क्या करें? जवाब यह नहीं हो सकता है कि कांग्रेस अपना अदाणी विकसित करे। इस लिहाज से मुझे पात्रा का यह सवाल और शीर्षक कमजोर लग रहा है। कुछ और (अगर कहा हो) शीर्षक बनाया जाना चाहिये। भाजपा अगर यह साबित कर पाये कि कांग्रेस ने भी रिश्वत ली है तो बात अलग है हालांकि यह साबित करना उसके लिए जरूरी है क्योंकि नरेन्द्र मोदी ने न सिर्फ 2014 से पहले बल्कि बाद में भी कांग्रेस पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाये हैं। पुराने मामले साबित नहीं हुए और नये मामले तो केजरीवाल और सोरेन के खिलाफ बने। दुर्भाग्य से वो भी साबित नहीं हुए जबकि माधवी पुरी बुच और अदाणी के घोटालों में कुछ तो साबित होने जैसी स्थिति में हैं।  

भाजपा का यह आरोप की कांग्रेस अर्थव्यवस्था को खराब कर रही है, इंडियन एक्सप्रेस में भी शीर्षक है। लेकिन अर्थव्यवस्था को खराब करने का काम नरेन्द्र मोदी की सरकार ने किया है और इसकी शुरुआत नोटबंदी के बाद जीएसटी से हुई थी। अब तो साबित हो चुका है। इसके अलावा, कोविड से हुए नुकसान की भरपाई के लिए कुछ खास नहीं किया गया। शेल कंपनियों को बंद कराने, गैर सरकारी संस्थाओं के लिए विदेशी चंदे लेने के नियम सख्त करने और इस कारण कइयों के लाइसेंस रद्द होने, बैंकों में आम और चालू खाता खोलने के लिये पैन कार्ड जरूरी होने और ऐसे दूसरे नियमों के कारण खाता खोलना मुश्किल हुआ है फिर भी नोटबंदी से पहले जनधन खाते खुलवाये गये अब दस साल बाद केवाईसी की मुश्कलों के कारण गरीबों के खातों में पैसे फंसने और दूसरी तरफ 4.5 लाख म्यूल अकाउंट बंद कर दिये जाने का असर यह हुआ है कि बैंक के बैंक बंद हो गये, एटीएम कम हो गये। बैंकों का विलय करना पड़ा और जो चल रहे हैं उनके शुल्क बढ़ गये। उसपर भारी जीएसटी ने अर्थव्यवस्था का बाजा बजा दिया है फिर भी गरीबों से न्यूनतम बैलेंस न होने के नाम पर करोड़ों की वसूली हुई है। लेकिन अर्थव्यवस्था को कमजोर करने का आरोप राहुल गांधी पर लगा है

इस सिलसिले में संबित पात्रा का आरोप यह है कि कल कांग्रेस समर्थकों ने अदाणी के खिलाफ अमेरिकी खबर को सुबह से ट्वीट करना शुरू कर दिया जिससे अदाणी के शेयरों के भाव कम हो गये और निवेशकों को नुकसान हुआ। सच्चाई यह है कि पूंजी बाजार में कमाई शेयरों को सही समय पर खरीदने और बेचने से होती है। सुबह-सवेरे ट्वीट करके शेयर बेचने का संकेत देना आम निवेशकों के हित में है। ट्वीट पढ़कर बेचने वाले निवेशक कल नुकसान उठाने से बच गये होंगे (या बच सकते थे)। अगर ट्वीट करने से लोगों ने भाव कम होने से पहले शेयर बेचे तो वे नुकसान उठाने से बच गये। खबर या सूचना सार्वजनिक होने पर शेयर मूल्य गिरने ही थे। पहले नहीं बेचा होता तो बाद में बेचने वाले घाटा उठाते या उनके अदाणी के शेयरों का मूल्य गिर जाता। जहां तक मूल्य गिरने की बात है, वह ट्वीट से नहीं खबर (असल में कारनामे) से गिरा है। संबित जो बोल रहे हैं उससे लगता है कि उन्हें पूंजी बाजार की जरा भी समझ नहीं है। राहुल गांधी को फंसाने के लिए जान बूझकर बोल रहे हों तब भी। समझ होती तो कुछ और बोलते। हिन्दुस्तान टाइम्स में मूल खबर के साथ राहुल ने प्रधानमंत्री पर हमला किया भाजपा ने विपक्षी दलों पर निशाना साधा जैसी खबर है। कायदे से एक खबर यह होनी चाहिये थी कि अदाणी पर आरोपों का भाजपा ने बचाव किया और आधिकारी तौर पर उसके प्रवक्ताओं ने ये बातें कहीं। अखबारों में अदाणी का पक्ष कम और भाजपा का आरोप ज्यादा है। फिर भी जैसे छपा है वह न्यूनतम है। अगर बयान हैं तो छपेंगे ही।

अदाणी के खिलाफ जो आरोप हैं उसमें खास बात यह है कि आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और अधिकारियों को अदाणी ने घूस दी है। भारत में घूस देना और लेना दोनों अपराध है और इसलिए दोनों की जांच होनी चाहिये। पूरी खबर में इस तथ्य को प्रमुखता द हिन्दू ने दी है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने शीर्षक में बताया है कि गिरफ्तारी वारंट जारी हुए हैं। आज यह खबर मेरे ज्यादातर अखबारों में पांच या छह कॉलम में है। सबसे कम तीन कॉलम में यह लीड दि एशियन एज में है। यहां एनएसयूआई के विरोध प्रदर्शन की फोटो है और पाठकों को लग सकता है कि भाजपा की भूमिका नहीं थी तो एनएसयूआई की क्यों होनी चाहिये और दि एशियन एज ने ही इसे छापा है। पर कांग्रेस का छात्र संगठन भारत के किसी व्यवसायी के भ्रष्टाचार का विरोध करे उसपर लगे आरोपों के आलोक में कार्रवाई की मांग करे यह तो सामान्य बात है और लोकतंत्र में जरूरी भी। इसीलिए कांग्रेस और राहुल गांधी ने भी ऐसी मांग की है। यह उनका काम है और कोई भी नागरिक ऐसी मांग या इसके लिए आंदोलन कर सकता है और वह कांग्रेस का समर्थन नहीं होगा ना ही भाजपा का विरोध। इस लिहाज से एनएसयूआई का विरोध खास नहीं है। भाजपा का बचाव जरूर है।

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